Delimitation exercise: तिरुवनंतपुरम से कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने आगामी परिसीमन (Delimitation) प्रक्रिया के तहत लोकसभा की सीटों की संख्या बढ़ाकर 824 से 850 किए जाने की कथित योजना पर गंभीर चिंता जताई है। थरूर का कहना है कि इतनी बड़ी लोकसभा न केवल संसदीय व्यवस्था को कमजोर करेगी। बल्कि सांसदों की भूमिका भी सीमित हो जाएगी। साथ ही कार्यपालिका (Executive) का प्रभाव पहले से अधिक बढ़ जाएगा।
'द इंडियन एक्सप्रेस' में लिखे अपने एक आर्टिकल में थरूर ने कहा कि केंद्र सरकार यह तर्क दे रही है कि देश की बढ़ती आबादी के अनुरूप लोकसभा का आकार बढ़ाया जाना चाहिए। लेकिन यह केवल जनसंख्या का सवाल नहीं है। बल्कि संसद के प्रभावी संचालन और लोकतांत्रिक जवाबदेही का भी मुद्दा है। उन्होंने लिखा, "लोकसभा को 850 सीटों तक ले जाने का फैसला भारत को एक असामान्य और लोकतंत्र के लिए खतरनाक दिशा में ले जाएगा।"
दक्षिणी राज्यों के साथ हो सकता है अन्याय
शशि थरूर ने परिसीमन के राजनीतिक और संघीय (Federal) प्रभावों पर भी चिंता जताई। उन्होंने कहा कि दक्षिण भारत के राज्यों ने वर्षों से जनसंख्या नियंत्रण में सफलता हासिल की है। उन्हें इस प्रक्रिया में नुकसान उठाना पड़ सकता है। वहीं, अधिक जनसंख्या वाले उत्तरी राज्यों को सीटों में अपेक्षाकृत अधिक बढ़ोतरी का लाभ मिल सकता है। उनके मुताबिक, यह व्यवस्था उन राज्यों के साथ अन्याय होगी जिन्होंने जनसंख्या नियंत्रण की नीतियों को सफलतापूर्वक लागू किया।
थरूर ने अपने तर्क को मजबूत करने के लिए अमेरिका की संसद का उदाहरण दिया। उन्होंने बताया कि अमेरिकी प्रतिनिधि सभा (US House of Representatives) में वर्ष 1929 से 435 सदस्य ही हैं। जबकि इस दौरान अमेरिका की आबादी लगभग तीन गुना बढ़ चुकी है। उन्होंने कहा कि आधुनिक संचार तकनीक, मजबूत संसदीय समितियों और संस्थागत सहयोग के जरिए सांसद बड़े निर्वाचन क्षेत्रों का भी प्रभावी ढंग से प्रतिनिधित्व कर सकते हैं। इसलिए केवल आबादी बढ़ने के आधार पर संसद का आकार बढ़ाना आवश्यक नहीं है।
सांसदों की भूमिका हो जाएगी सीमित
थरूर का कहना है कि यदि लोकसभा में लगभग 850 सांसद होंगे तो संसद के सीमित समय में हर सांसद को अपनी बात रखने का पर्याप्त अवसर नहीं मिल पाएगा। उन्होंने कहा कि ऐसे में प्रश्नकाल (Question Hour), विधेयकों पर बहस, निजी सदस्य विधेयक (Private Members Bills) और अन्य संसदीय गतिविधियों में बड़ी संख्या में सांसद प्रभावी भागीदारी नहीं कर पाएंगे। उनका मानना है कि इससे कई सांसद केवल नाममात्र के सदस्य बनकर रह जाएंगे और संसद में उनकी भूमिका बेहद सीमित हो जाएगी।
संसद बन जाएगी 'रबर स्टांप'
शशि थरूर ने चेतावनी देते हुए कहा कि यदि संसद का आकार बढ़ाने के साथ उसकी कार्यप्रणाली में सुधार नहीं किया गया, तो लोकतांत्रिक संस्थाएं और कमजोर होंगी। उन्होंने कहा, "व्यक्तिगत सांसदों का प्रभाव कम हो जाएगा और लोकसभा केवल एक नोटिस बोर्ड तथा सरकार के फैसलों पर मुहर लगाने वाली संस्था बनकर रह जाएगी।"
उन्होंने यह भी कहा कि पिछले कुछ वर्षों में संसद की बैठकों की संख्या घटी है। संसदीय समितियों की समीक्षा कमजोर हुई है। कई विधेयक बेहद कम चर्चा के साथ पारित किए गए हैं। ऐसे में केवल सांसदों की संख्या बढ़ाने से समस्या का समाधान नहीं होगा, बल्कि संसदीय निगरानी और कमजोर हो सकती है।
स्थानीय निकायों को मजबूत करने की वकालत
थरूर ने सुझाव दिया कि लोकसभा का आकार बढ़ाने के बजाय राज्य विधानसभाओं, नगर निकायों और पंचायतों को अधिक सशक्त बनाया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि सांसदों का मुख्य दायित्व राष्ट्रीय कानून बनाना, विदेश नीति, व्यापक आर्थिक नीतियों पर काम करना और केंद्र सरकार को जवाबदेह बनाना है। जबकि स्थानीय समस्याओं का समाधान विधायक, नगरपालिकाएं और पंचायतें बेहतर तरीके से कर सकती हैं।
अपने आर्टिकल के अंत में थरूर ने कहा कि सच्चा प्रतिनिधित्व सांसदों की संख्या बढ़ाने में नहीं, बल्कि संसद में होने वाली बहस की गुणवत्ता, संसदीय समितियों की प्रभावी समीक्षा और स्थानीय शासन संस्थाओं को मजबूत बनाने में है। उनके अनुसार, 850 सदस्यों वाली विशाल लोकसभा लोकतंत्र को मजबूत करने के बजाय उसे कमजोर कर सकती है।