मीनाक्षी नटराजन को सुप्रीम कोर्ट से भी नहीं मिली राहत, राज्यसभा नामांकन रद्द के खिलाफ याचिका नामंजूर

कांग्रेस की वरिष्ठ नेता मीनाक्षी नटराजन ने मध्यप्रदेश से राज्यसभा चुनाव के लिए नामांकन दाखिल किया था। लेकिन उनका नामांकन रद्द कर दिया गया। BJP की आपत्ति के बाद उनका नामांकन रद्द किया गया और कारण दिया गया कि उन्होंने अपने दस्तावेजों में अपने खिलाफ चल रहे एक मुकदमे की पूरी जानकारी नहीं दी

अपडेटेड Jun 12, 2026 पर 2:09 PM
कांग्रेस को बड़ा झटका! मीनाक्षी नटराजन के राज्यसभा नामांकन रद्द के खिलाफ याचिका सुप्रीम कोर्ट ने ठुकराई

कांग्रेस नेता मीनाक्षी नटराजन ने मध्यप्रदेश से अपना राज्यसभा नामांकन रद्द होने को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी, लेकिन कोर्ट ने दोनों तरफ के तर्क सुनने के बाद उनकी याचिका पर आगे सुनवाई करने से साफ मना कर दिया। शीर्ष अदालत ने कहा, "एक उम्मीदवार के लिए अपवाद नहीं बनाया जा सकता।" सुप्रीम कोर्ट ने नटराजन की रिट याचिका को खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि वो चाहें तो चुनाव याचिका (Election Petition) दायर कर सकती हैं।

कांग्रेस की वरिष्ठ नेता मीनाक्षी नटराजन ने मध्यप्रदेश से राज्यसभा चुनाव के लिए नामांकन दाखिल किया था। लेकिन उनका नामांकन रद्द कर दिया गया। BJP की आपत्ति के बाद उनका नामांकन रद्द किया गया और कारण दिया गया कि उन्होंने अपने दस्तावेजों में अपने खिलाफ चल रहे एक मुकदमे की पूरी जानकारी नहीं दी। नटराजन को यह फैसला गलत लगा, तो उन्होंने सीधे सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

उनकी दलील थी कि नामांकन रद्द करने में "साफ और स्पष्ट गलती" हुई है, क्योंकि इस मामले में उन पर अभी कोई आरोप नहीं लगाए गए हैं, इसलिए सुप्रीम कोर्ट को संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत दखल देना चाहिए।


सुप्रीम कोर्ट ने क्यों नहीं सुनी बात?

जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस ए.एस. चांदुरकर की पीठ ने याचिका सुनने से यह कहकर मना किया कि संविधान का अनुच्छेद 329 इस रास्ते पर रोक लगाता है।

चुनाव से जुड़े मामलों में अदालत का सीधा दखल संविधान में वर्जित है। नामांकन रद्द होने को सिर्फ चुनाव याचिका के जरिये चुनौती दी जा सकती है।

कोर्ट ने कहा, "हम किसी एक उम्मीदवार के लिए अपवाद नहीं बना सकते।" अगर कोर्ट कुछ मामलों में दखल दे और कुछ में न दे, तो यह संविधान की मूल भावना के खिलाफ होगा।

सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने कहा, "अगर हम यह तय करने लगें कि कौन से मामले 'इतने गंभीर' हैं कि हमें दखल देना चाहिए और कौन से नहीं — तो हम संविधान में वो नियम जोड़ रहे होंगे जो अनुच्छेद 329 में है ही नहीं। ऐसी किसी भी व्याख्या को हम बढ़ावा नहीं दे सकते।"

कोर्ट ने यह भी साफ किया कि आज के फैसले में जो भी टिप्पणियां की गई हैं, वे सिर्फ इस याचिका को समझने के लिए थीं। अगर नटराजन चुनाव याचिका दायर करती हैं, तो उस मामले पर इन टिप्पणियों का कोई असर नहीं पड़ेगा, चुनाव याचिका पूरी तरह अलग और स्वतंत्र रूप से सुनी जाएगी।

नटराजन की तरफ से क्या दलील दी गई?

याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने अदालत में दलील दी कि उम्मीदवार नटराजन का नामांकन गलत तरीके से रद्द किया गया है।

दरअसल, रिटर्निंग ऑफिसर अरविंद शर्मा ने 9 जून को नटराजन का नामांकन यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि उन्होंने अपने शपथपत्र (फॉर्म-26) में तेलंगाना की एक अदालत में उनके खिलाफ दायर निजी शिकायत (प्राइवेट कंप्लेंट) की जानकारी नहीं दी थी, जबकि उन्हें उस मामले में समन/नोटिस मिल चुका था।

सिंघवी ने कोर्ट से कहा कि जन प्रतिनिधित्व कानून (Representation of the People Act) की धारा 33A के मुताबिक उम्मीदवार को केवल उन्हीं आपराधिक मामलों की जानकारी देनी होती है, जिनमें ट्रायल कोर्ट आरोप (Charges) तय कर चुकी हो।

उन्होंने यह भी कहा कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 223 के तहत किसी निजी शिकायत पर अदालत संज्ञान (Cognizance) लेने से पहले संभावित आरोपी को नोटिस भेजती है और उसका पक्ष सुनती है।

वकील के मुताबिक, नटराजन को अभी सिर्फ धारा 223 के तहत नोटिस मिला है। अदालत ने अभी तक शिकायत पर आधिकारिक रूप से संज्ञान नहीं लिया है। यानी मामला अभी शुरुआती चरण में है।

इस पर जस्टिस मिश्रा ने कहा कि कोई भी अदालत बिना सोच-विचार किए समन जारी नहीं करती, समन जारी करने से पहले अदालत मामले को देखती और समझती है।

हालांकि सिंघवी ने फिर दोहराया कि कानून के अनुसार उम्मीदवार को केवल उन्हीं मामलों की जानकारी देनी होती है, जिनमें आरोप तय हो चुके हों। उन्होंने कहा कि नए कानून के तहत आरोपी को पहले सुनना जरूरी है और फिलहाल यह निजी शिकायत अभी संज्ञान लिए जाने से पहले की अवस्था (Pre-Cognizance Stage) में है।

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