TMC सांसदों का NCPI में मर्जर! क्या ऐसा करके दल बदल कानून से बच जाएंगे बागी MP? जानें- क्या कहता है नियम
TMC Crisis: दलबदल कानून (Anti-Defection Law) से बचने के लिए तृणमूल कांग्रेस (TMC) के बागी सांसदों ने नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया (NCPI) में कर लिया है। सिर्फ NCPI में विलय की घोषणा कर देने से दल-बदल कानून से अपने-आप बचाव नहीं हो जाता। असली कानूनी सवाल यह होगा कि क्या यह संविधान में दिए गए मर्जर के प्रावधान की शर्तें पूरी करता है या नहीं।
TMC Crisis: टीएमसी के 20 सांसदों ने NCPI में विलय किया है
TMC Crisis: तृणमूल कांग्रेस (TMC) के लगभग 20 बागी लोकसभा सांसदों ने अपने गुट का विलय 'नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया' (NCPI) में कर लिया है। ममता बनर्जी के बागी सांसदों ने केंद्र में सत्ताधारी एनडीए (NDA) को समर्थन देने का ऐलान किया है। दलबदल कानून (Anti-Defection Law) से बचने के लिए यह कदम उठाया गया है। बता दें कि सिर्फ NCPI में विलय की घोषणा कर देने से दल-बदल कानून (Tenth Schedule) से अपने-आप बचाव नहीं हो जाता। असली कानूनी सवाल यह होगा कि क्या यह संविधान में दिए गए मर्जर (विलय) के प्रावधान की शर्तें पूरी करता है या नहीं।
हालिया घटनाक्रम के अनुसार, TMC के बागी सांसदों ने दावा किया है कि वे NCPI में विलय कर चुके हैं और लोकसभा में अलग ब्लॉक के रूप में मान्यता चाहते हैं। उनका कहना है कि उनके साथ TMC के दो-तिहाई से अधिक सांसद हैं।
दल-बदल कानून क्या कहता है?
10वीं अनुसूची के तहत सामान्य नियम यह है कि यदि कोई सांसद अपनी पार्टी छोड़ता है या दूसरी पार्टी से जुड़ता है, तो उसकी सदस्यता जा सकती है। हालांकि मर्जर के मामले में एक अपवाद है, जहां दो-तिहाई विधायक/सांसद किसी विलय का समर्थन करें तो अयोग्यता से बचाव मिल सकता है।
फिर विवाद कहां है?
यही सबसे बड़ा कानूनी विवाद है। TMC नेतृत्व और कुछ संवैधानिक विशेषज्ञों का तर्क है कि:-
सिर्फ सांसदों का समूह दूसरी पार्टी में नहीं मिल सकता।
कानून "मूल राजनीतिक दल" (original political party) के विलय की बात करता है।
केवल संसदीय दल (legislature party) का अलग होकर दूसरी पार्टी में जाना पर्याप्त नहीं हो सकता।
पूर्व लोकसभा महासचिव पी.डी.टी. आचार्य ने भी कहा है कि जब तक सांसद TMC के सदस्य हैं, पार्टी का विलय होना चाहिए। केवल सांसदों का नहीं; इसलिए वे स्वतः दल-बदल कानून से नहीं बच सकते। तृणमूल कांग्रेस लोकसभा संसदीय दल के नेता अभिषेक बनर्जी द्वारा लिखा गया एक पत्र लोकसभा स्पीकर को सौंपा गया है, जिसमें उनसे किसी भी कथित अलग गुट को मान्यता न देने का आग्रह किया गया है। इस पत्र में तर्क दिया गया है कि संविधान किसी मौजूदा राजनीतिक दल के भीतर एक अलग समूह बनाने की अनुमति नहीं देता है।
सुप्रीम कोर्ट का क्या रुख रहा है?
TMC ने लोकसभा स्पीकर को लिखे पत्र में 2023 के शिवसेना मामले (Subhash Desai judgment) का हवाला देते हुए कहा है कि "split" (अलग गुट) की पुरानी दलील अब उपलब्ध नहीं है और राजनीतिक दल ही सर्वोपरि है, न कि उसका विधायी दल।
आखिर फैसला कौन करेगा?
अब इस बारे में फाइनल फैसला लोकसभा स्पीकर के सामने आएगा। यदि TMC दल-बदल की याचिका देती है, तो स्पीकर को यह तय करना होगा कि:-
क्या यह वैध मर्जर है,
क्या संवैधानिक शर्तें पूरी हुई हैं
या फिर यह दल-बदल माना जाएगा।
इसके बाद मामला अदालत तक भी जा सकता है।
NCPI में विलय की रणनीति बागी सांसदों द्वारा दल-बदल कानून से बचने की कोशिश मानी जा रही है। लेकिन कई संवैधानिक विशेषज्ञों के अनुसार यह कानूनी रूप से स्वतः सुरक्षा नहीं देती। उनकी सदस्यता बचेगी या नहीं, इसका फैसला अंततः लोकसभा स्पीकर और संभवतः अदालतों को करना होगा।
भारत में दल-बदल विरोधी कानून (Anti-Defection Law) संविधान की दसवीं अनुसूची (Tenth Schedule) में है। इसे 1985 में 52nd Constitutional Amendment के जरिए जोड़ा गया था ताकि सांसद और विधायक व्यक्तिगत लाभ या राजनीतिक दबाव में बार-बार पार्टी न बदलें।
कब अयोग्यता होती है?
किसी सांसद (MP) या विधायक (MLA) को अयोग्य ठहराया जा सकता है यदि:
1. स्वेच्छा से पार्टी की सदस्यता छोड़ दे
2. यह जरूरी नहीं कि वह लिखित इस्तीफा दे।
3. यदि किसी सदस्य का आचरण यह दिखाता है कि उसने पार्टी छोड़ दी है, तो भी उसे अयोग्य ठहराया जा सकता है।
उदाहरण
दूसरी पार्टी की सदस्यता लेना।
सार्वजनिक रूप से दूसरी पार्टी के लिए काम करना।
अपनी पार्टी के खिलाफ राजनीतिक गतिविधियां करना।
पार्टी व्हिप के खिलाफ वोट दे
यदि कोई सांसद/विधायक पार्टी के निर्देश (Whip) के खिलाफ वोट देता है, या मतदान से अनुपस्थित रहता है, और पार्टी उसे माफ नहीं करती, तो उसकी सदस्यता जा सकती है।
निर्दलीय (Independent) सदस्य
यदि कोई निर्दलीय उम्मीदवार जीतने के बाद किसी राजनीतिक दल में शामिल हो जाता है, तो उसकी सदस्यता समाप्त हो सकती है।
मनोनीत (Nominated) सदस्य
यदि मनोनीत सदस्य नामांकन के छह महीने बाद किसी पार्टी में शामिल होता है, तो वह अयोग्य हो सकता है।
विलय (Merger) का अपवाद
यही वह प्रावधान है जो अक्सर विवाद का विषय बनता है।
यदि किसी राजनीतिक दल का दूसरे दल में विलय हो जाए, और उस दल के कम से कम दो-तिहाई (2/3) विधायक या सांसद विलय का समर्थन करें। तो उन्हें दल-बदल कानून के तहत अयोग्य नहीं ठहराया जाएगा।
यहीं सबसे बड़ा कानूनी सवाल उठता है कि क्या केवल विधायक/सांसदों का समूह दूसरी पार्टी में जा सकता है? या मूल राजनीतिक दल का भी वास्तविक विलय होना चाहिए?
1985 के कानून में यदि एक-तिहाई सदस्य अलग गुट बना लेते थे तो उन्हें राहत मिल सकती थी। लेकिन 2003 में 91st Constitutional Amendment द्वारा यह प्रावधान हटा दिया गया क्योंकि इसका बड़े पैमाने पर दुरुपयोग हो रहा था। पहले इनका फैसला लगभग अंतिम माना जाता था। लेकिन बाद में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि स्पीकर के निर्णय की न्यायिक समीक्षा हो सकती है।
प्रमुख न्यायिक फैसले
Kihoto Hollohan v. Zachillhu
सुप्रीम कोर्ट ने दल-बदल कानून को संवैधानिक माना। लेकिन स्पीकर के फैसलों को न्यायिक समीक्षा के दायरे में रखा।
Subhash Desai v. Principal Secretary
शिवसेना विवाद में अदालत ने कहा कि राजनीतिक दल का महत्व केवल विधायी दल से ऊपर है और दल-बदल मामलों में मूल पार्टी की भूमिका महत्वपूर्ण है।
कानून की आलोचना
कई विशेषज्ञ मानते हैं कि यह सांसदों/विधायकों की स्वतंत्र राय सीमित करता है।
पार्टी नेतृत्व की शक्ति बहुत बढ़ जाती है।
व्हिप का दायरा बहुत व्यापक है।
स्पीकर कभी-कभी निर्णय लेने में लंबा समय लेते हैं।
एक आसान उदाहरण
मान लीजिए किसी पार्टी के 90 विधायक हैं। जबकि 20 विधायक अलग होकर नई पार्टी बनाते हैं तो दल-बदल माना जा सकता है। 60 विधायक (यानी 2/3 से अधिक) किसी दूसरी पार्टी में विलय का दावा करते हैं वे मर्जर अपवाद का लाभ लेने की कोशिश कर सकते हैं। लेकिन यह भी देखना होगा कि संविधान की शर्तों के अनुसार वह विलय वास्तव में वैध है या नहीं। यही वह मुद्दा है जो अक्सर अदालतों तक पहुंचता है।