पानी नहीं जहर पी रहे हैं मध्य प्रदेश के ग्रामीण इलाकों के लोग! हर तीसरा गिलास है गंदा

MP Water Crisis: केंद्र सरकार के जल जीवन मिशन की नई रिपोर्ट ने ही राज्य की जल-व्यवस्था की सच्चाई को नंगा कर दिया है- जो बताती है कि लगभग एक-तिहाई से ज्यादा ग्रामीण इलाकों का पीने का पानी इंसान के इस्तेमाल लायक ही नहीं बचा। लाखों लोग हर दिन अदृश्य जहर पीने को मजबूर हैं

अपडेटेड Jan 07, 2026 पर 3:49 PM
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MP Water Crisis: इंदौर के भागीरथपुरा में दूषित जल संकट के बीच एक व्यक्ति टैंकर से पानी पीते हुआ (PHOTO- PTI)

मध्य प्रदेश का इंदौर, जिसके माथे पर सालों से देश के सबसे साफ शहर का तिलक सजता आया है, वहां गंदा पानी पीने से करीब 18 लोगों की जान चली गई। हालात अब भी खराब हैं और करीब 100 से ज्यादा लोग अस्पताल में भर्ती। इस बीच MP के ग्रामीण इलाकों में पीने के पानी की क्वालिटी के बारे में जो पता चला है वो काफी खौफनाक है। राज्य के गांवों में पीने का पानी अब जीवन नहीं, बल्कि मौन मौत का साधन बन चुका है।

दरअसल केंद्र सरकार के जल जीवन मिशन की नई रिपोर्ट ने ही राज्य की जल-व्यवस्था की सच्चाई को नंगा कर दिया है- जो बताती है कि लगभग एक-तिहाई से ज्यादा ग्रामीण इलाकों का पीने का पानी इंसान के इस्तेमाल लायक ही नहीं बचा। लाखों लोग हर दिन अदृश्य जहर पीने को मजबूर हैं।

63.3% पानी ही पास, बाकी में मौत छिपी!


4 जनवरी 2026 को जारी फंक्शनलिटी असेसमेंट रिपोर्ट के मुताबिक, मध्य प्रदेश के सिर्फ 63.3% पानी के सैंपल क्वालिटी टेस्ट में पास हुए। यानी 36.7% ग्रामीण इलाकों का पानी किसी न किसी तरह के जीवाणु या केमिकल इंफेक्शन से दूषित पाया गया।

यह अध्ययन सितंबर-अक्टूबर 2024 में राज्य के 15,000 से ज्यादा ग्रामीण घरों से लिए गए पानी के सैंपल पर आधारित है।

जहां इलाज होना चाहिए, वहां फैल रही बीमारी

NDTV के मुताबिक, सबसे भयावह तस्वीर सरकारी अस्पतालों की है, जहां महज 12% पानी के नमूने ही सूक्ष्मजीव-मानकों पर खरे उतर पाए, जबकि राष्ट्रीय औसत 83.1% है। यानी राज्य के 88% सरकारी अस्पतालों में मरीजों को मिल रहा पानी भी बीमारियों का कारण बन रहा है।

स्कूलों में भी सुरक्षित नहीं बच्चों का पानी

स्कूलों से लिए गए पानी के 26.7% सैंपल माइक्रोबायोलॉजिकल टेस्ट में फेल हुए। जिस पानी से बच्चे अपनी प्यास बुझाते हैं, वही उनकी सेहत के लिए खतरा बन गया है।

आदिवासी जिलों में हालात सबसे बदतर

अनूपपुर और डिंडोरी जैसे आदिवासी बहुल इलाकों में तो एक भी पानी का सैंपल सुरक्षित नहीं निकला। बालाघाट, बैतूल और छिंदवाड़ा में आधे से ज्यादा सैंपल में खतरनाक लेवल का संक्रमण पाया गया।

नल तो हैं, पर पानी नहीं

मध्य प्रदेश के महज 31.5% घरों में ही पाइप से पानी की सुविधा है, जबकि राष्ट्रीय औसत 70.9% है। ग्रामीण इलाकों में 99.1% गांवों तक पाइपलाइन तो है, लेकिन सिर्फ 76.6% घरों में पानी पहुंच रहा है। यानी हर चौथे घर का नल सूख चुका है।

पर नल आने का मतलब सुरक्षित पानी नहीं

इंदौर जिले को सरकार ने “100% कनेक्टेड” घोषित किया है, फिर भी वहां केवल 33% घरों तक ही सुरक्षित पीने का पानी पहुंच रहा है।

राज्यभर में 33% पानी के सैंपल क्वालिटी टेस्ट में फेल हुए, जो साफ बताता है कि संकट केवल पहुंच का नहीं, जहर की डिलीवरी का भी है।

केंद्र सरकार ने इस स्थिति को “सिस्टम से पैदा हुई आपदा” कहा है और चेतावनी दी है कि अगर पानी की गुणवत्ता में सुधार नहीं हुआ, तो इस साल वित्तीय सहायता घटाई जा सकती है।

भयावह त्रासदी: इंदौर में 18 मौतें

यह चेतावनी एक त्रासदी के बाद आई। इंदौर के भागीरथपुरा में दूषित पानी पीने से 18 लोगों की मौत हो गई, 429 लोग अस्पतालों में भर्ती हुए। इनमें से 16 मरीज ICU में हैं, जबकि तीन वेंटिलेटर पर हैं।

मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने इस मुद्दे को “पब्लिक हेल्थ इमरजेंसी” घोषित किया है। अदालत ने अपने आदेश में कहा, “संविधान के अनुच्छेद 21 में जीवन के अधिकार में स्वच्छ पीने के पानी का अधिकार शामिल है, और वर्तमान स्थिति इस अधिकार का घोर उल्लंघन है।”

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