NCERT 8th Book: नेशनल काउंसिल ऑफ एजुकेशनल रिसर्च एंड ट्रेनिंग (NCERT) ने कक्षा 8 की सामाजिक विज्ञान की पाठ्यपुस्तक में कई बदलाव किए है। किताबों में अब छात्र न केवल न्यायपालिका की कार्यप्रणाली के बारे में पढ़ेंगे, बल्कि सिस्टम के सामने खड़ी चुनौतियों जैसे 'न्यायपालिका में भ्रष्टाचार' और 'मुकदमों के भारी बोझ' के बारे में भी जानेंगे। पिछली किताब के मुकाबले यह बदलाव काफी बड़ा है, क्योंकि पहले का संस्करण मुख्य रूप से अदालतों की संरचना और नागरिकों की पहुंच तक ही सीमित था।
भ्रष्टाचार और मुकदमों की पेंडेंसी है एक कड़वी हकीकत
नई किताब में न्यायपालिका के सामने मौजूद बड़ी समस्याओं को खुलकर सूचीबद्ध किया गया है। नई किताब में 'विभिन्न स्तरों पर होने वाले भ्रष्टाचार' को एक गंभीर चुनौती बताया गया है। इसमें पूर्व मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई के जुलाई 2025 के बयान का भी हवाला दिया गया है, जिसमें उन्होंने माना था कि भ्रष्टाचार की घटनाओं से जनता का न्याय प्रणाली पर भरोसा कम होता है। इसके साथ ही कोर्ट में पेंडिंग मामलों के आंकड़े भी दिए गए है। सुप्रीम कोर्ट में लगभग 81,000, हाई कोर्ट्स में 62.4 लाख और निचली अदालतों में करीब 4.7 करोड़ मामले लंबित हैं। देरी के कारणों में जजों की कमी, जटिल कानूनी प्रक्रिया और खराब बुनियादी ढांचे को जिम्मेदार ठहराया गया है।
जजों की जवाबदेही और महाभियोग
किताब में यह भी समझाया गया है कि न्यायपालिका में जवाबदेही तय करने के लिए कौन-कौन से तंत्र मौजूद हैं। छात्र अब CPGRAMS (सेंट्रलाइज्ड पब्लिक ग्रीवेंस रिड्रेस एंड मॉनिटरिंग सिस्टम) के बारे में पढ़ेंगे। किताब के अनुसार, 2017 से 2021 के बीच इस सिस्टम के जरिए 1,600 से ज्यादा शिकायतें मिलीं।
इसके साथ ही गंभीर आरोपों के मामले में संसद द्वारा जज को हटाने की प्रक्रिया महाभियोग का भी जिक्र है। इसमें बताया गया है कि पूरी जांच और जज को अपना पक्ष रखने का मौका देने के बाद ही संसद ऐसा कदम उठा सकती है।
इलेक्टोरल बॉन्ड का दिया गया है उदाहरण
न्यायपालिका की स्वतंत्रता और उसकी भूमिका को समझाने के लिए किताब में 'इलेक्टोरल बॉन्ड' का उदाहरण दिया गया है। किताब बताती है कि 2018 में सरकार ने राजनीतिक दलों को चंदा देने के लिए इलेक्टोरल बॉन्ड शुरू किए थे, जिसमें दानदाता की पहचान गुप्त रहती थी। नई किताब में छात्रों को पढ़ाया जाएगा कि सुप्रीम कोर्ट ने इस योजना को 'असंवैधानिक' करार देते हुए रद्द कर दिया। कोर्ट ने माना कि मतदाताओं को यह जानने का पूरा अधिकार है कि राजनीतिक दलों को फंडिंग कौन कर रहा है। यह उदाहरण लोकतांत्रिक जवाबदेही तय करने में न्यायपालिका की शक्ति को दर्शाता है।