नोएडा : सॉफ्टवेयर इंजीनियर मौत केस में हाईकोर्ट का बड़ा आदेश, बिल्डर की रिहाई का दिया निर्देश

हाई कोर्ट ने पाया कि पुलिस ने अरेस्ट मेमो के नियमों का सही तरह से पालन नहीं किया। नियम के मुताबिक, आरोपी को गिरफ्तारी का कारण बताया जाना चाहिए और हिरासत में लेने से पहले अरेस्ट मेमो की कॉपी देना जरूरी होता है। कोर्ट ने कहा कि इस मामले में न सिर्फ़ यह शर्त तोड़ी गई, बल्कि हाई कोर्ट के पहले के आदेश का भी उल्लंघन हुआ है

अपडेटेड Feb 06, 2026 पर 8:04 PM
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सॉफ्टवेयर इंजीनियर युवराज मेहता की मौत के मामले में इलाहबाद हाई कोर्ट ने बड़ा आदेश दिया है

उत्तर प्रदेश के नोएडा में सेक्टर-150 क सॉफ्टवेयर इंजीनियर युवराज मेहता की मौत के मामले में इलाहबाद हाई कोर्ट ने गिरफ्तार बिल्डर अभय कुमार को बड़ी राहत दी है। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने अभय कुमार को तुरंत रिहा करने का आदेश दिया है। अभय कुमार, MZ विज़टाउन प्लानर्स के डायरेक्टर हैं। कोर्ट ने कहा कि नोएडा में एक टेक्नीशियन की मौत के मामले में उनकी गिरफ्तारी तय नियमों का पालन किए बिना की गई थी। यह आदेश जस्टिस सिद्धार्थ और जस्टिस जय कृष्ण उपाध्याय की डिवीजन बेंच ने गुरुवार को दिया। कोर्ट ने अभय कुमार की तरफ से दाखिल बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर सुनवाई के बाद यह फैसला सुनाया।

हाई कोर्ट ने दिया बड़ा आदेश

हाई कोर्ट ने पाया कि पुलिस ने अरेस्ट मेमो के नियमों का सही तरह से पालन नहीं किया। नियम के मुताबिक, आरोपी को गिरफ्तारी का कारण बताया जाना चाहिए और हिरासत में लेने से पहले अरेस्ट मेमो की कॉपी देना जरूरी होता है। कोर्ट ने कहा कि इस मामले में न सिर्फ यह शर्त तोड़ी गई, बल्कि हाई कोर्ट के पहले के आदेश का भी उल्लंघन हुआ है। इसी आधार पर कोर्ट ने अभय कुमार की गिरफ्तारी को गलत ठहराते हुए उनकी तुरंत रिहाई का आदेश दिया।


याचिका में मांग की गई थी कि प्रतिवादियों को आदेश दिया जाए कि वे कुमार को कोर्ट के सामने पेश करें और जिसे अवैध हिरासत बताया गया है, उससे उन्हें तुरंत रिहा किया जाए। इसके साथ ही याचिका में यह भी कहा गया था कि कुमार की गिरफ्तारी, हिरासत और रिमांड को अवैध, अमान्य और बेअसर घोषित किया जाए। याचिका का तर्क था कि यह सब सुप्रीम कोर्ट के एक पुराने फैसले में दिए गए निर्देशों का पालन किए बिना किया गया, इसलिए पूरी कार्रवाई कानून के खिलाफ है।

याचिका में की गई थी मांग

याचिका की दूसरी मांग में कहा गया था कि कोर्ट सर्टियोरारी रिट जारी करे और चीफ ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट, गौतम बुद्ध नगर द्वारा 20 जनवरी और 21 जनवरी को दिए गए रिमांड आदेशों को रद्द किया जाए। इसके साथ ही बाद में दिए गए सभी रिमांड आदेशों को भी खत्म करने की मांग की गई थी। याचिका में यह भी मांग की गई थी कि इस मामले में लापरवाही बरतने वाले पुलिस अधिकारियों के खिलाफ विभागीय जांच शुरू करने के आदेश दिए जाएं। कुमार की ओर से पेश हुए सीनियर वकील ने उमंग रस्तोगी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य मामले में हाई कोर्ट के फैसले का हवाला दिया। उन्होंने कहा कि इस केस में भी अरेस्ट मेमो के क्लॉज़ 13 का पालन नहीं किया गया था, जो कानून के खिलाफ है।

दलीलों से सहमत होते हुए इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा कि इस मामले के तथ्य उसके पहले दिए गए फैसलों से मेल खाते हैं। कोर्ट ने साफ तौर पर माना कि कुमार की गिरफ्तारी अवैध थी। हाई कोर्ट ने चीफ ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट (CJM) द्वारा 20 और 21 जनवरी को जारी किए गए न्यायिक रिमांड आदेशों को रद्द कर दिया और निर्देश दिया कि कुमार को तुरंत रिहा किया जाए। बेंच ने यह भी कहा कि उसके आदेश की जानकारी संबंधित अधिकारियों को तुरंत दी जाए, ताकि फैसले पर बिना देर किए अमल हो सके। इसके लिए आदेश की प्रमाणित प्रति जारी होने का इंतजार करने की जरूरत नहीं होगी।

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