‘उत्तर भारतीय सिर्फ हिंदी जानते हैं, यहां आकर पानी पूरी बेचते हैं’, तमिलनाडु के मंत्री ने भाषा को लेकर फिर दे दिया विवादित बयान
तमिलनाडु के कृषि मंत्री एमआरके पनीरसेल्वम ने कहा कि उत्तर भारत के लोग, जिन्होंने “सिर्फ हिंदी सीखी है”, उन्हें तमिलनाडु में अच्छे रोजगार नहीं मिलते और इसलिए वे छोटे-मोटे काम करने आते हैं। वहीं, उन्होंने दावा किया कि तमिलनाडु की दो-भाषा नीति की वजह से यहां के लोग अंग्रेजी सीखते हैं और विदेशों में अच्छी नौकरियां पाते हैं
तमिलनाडु के कृषि मंत्री एमआरके पनीरसेल्वम ने भाषा को लेकर दे दिया विवादित बयान
राज्य विधानसभा चुनाव में अब सिर्फ कुछ ही महीने बचे हैं। ऐसे में तमिलनाडु के कृषि मंत्री एमआरके पनीरसेल्वम ने उत्तर भारत से आने वाले प्रवासी मजदूरों पर विवादित बयान देकर एक बार फिर राज्य बनाम केंद्र और दो-भाषा बनाम तीन-भाषा नीति की बहस को तेज कर दिया है।
उन्होंने कहा कि उत्तर भारत के लोग, जिन्होंने “सिर्फ हिंदी सीखी है”, उन्हें तमिलनाडु में अच्छे रोजगार नहीं मिलते और इसलिए वे छोटे-मोटे काम करने आते हैं। वहीं, उन्होंने दावा किया कि तमिलनाडु की दो-भाषा नीति की वजह से यहां के लोग अंग्रेजी सीखते हैं और विदेशों में अच्छी नौकरियां पाते हैं।
पनीरसेल्वम ने कहा, “उत्तर भारत से लोग यहां टेबल साफ करने, कंस्ट्रक्शन मजदूर, पानीपुरी बेचने जैसे काम करने आते हैं, क्योंकि उन्होंने सिर्फ हिंदी सीखी है।”
उन्होंने आगे कहा, “हमारे बच्चे विदेश चले गए हैं। हमने दो-भाषा नीति अपनाई और अंग्रेजी अच्छी तरह सीखी। इसलिए वे अमेरिका और लंदन जैसे देशों में जाकर करोड़ों कमाने के मौके पा रहे हैं।”
हालांकि, इस मुद्दे पर बयान देने वाले पनीरसेल्वम अकेले मंत्री नहीं थे।
इससे पहले उद्योग मंत्री टीआरबी राजा ने एक न्यूज चैनल को दिए इंटरव्यू में ज्यादा संतुलित राय रखी। उन्होंने कहा कि सरकार किसी को भी हिंदी बोलने से नहीं रोकती और उन्होंने राज्य में रह रहे जर्मन और जापानी समुदायों का उदाहरण दिया।
उन्होंने कहा, “ये सभी विदेशी तमिलनाडु में खुशी से रह सकते हैं। फिर मेरे हिंदी बोलने वाले दोस्त ऐसा क्यों नहीं कर सकते?” साथ ही उन्होंने कहा कि राज्य की जिम्मेदारी तमिल भाषा की रक्षा करना भी है।
चुनावी मुद्दा बनी भाषा
ये बयान विधानसभा चुनाव से कुछ हफ्ते पहले आए हैं। सत्तारूढ़ DMK, जो कांग्रेस के साथ गठबंधन में है (हालांकि सीट बंटवारे को लेकर मतभेद हैं), लगातार दूसरी बार सत्ता में लौटने की कोशिश कर रही है। वहीं, उसकी प्रतिद्वंद्वी AIADMK ने भारतीय जनता पार्टी के साथ हाथ मिलाया है।
तमिलनाडु में भाषा हमेशा से भावनात्मक मुद्दा रही है और इस बार भी यह चुनाव प्रचार का बड़ा मुद्दा बनने की उम्मीद है। इस बहस के केंद्र में एक बार फिर राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) है।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति पर विवाद
2019 में लागू हुई राष्ट्रीय शिक्षा नीति को लेकर बड़ा विवाद हुआ था। पिछले साल फरवरी में यह मुद्दा फिर गरमा गया, जब केंद्र सरकार ने तीन-भाषा नीति को आगे बढ़ाया। इसके तहत छात्रों को अंग्रेजी और राज्य की भाषा के अलावा एक तीसरी भाषा भी पढ़नी होती है।
तमिलनाडु सरकार ने इसे गैर-हिंदी भाषी राज्यों पर हिंदी थोपने की कोशिश बताया।
दो-भाषा नीति
इतिहास में दक्षिण भारत के राज्यों ने केंद्र की ओर से हिंदी थोपे जाने की कोशिशों का विरोध किया है। तमिलनाडु में तो 1930 और 1960 के दशक में भाषा को लेकर दंगे तक हुए थे।
राज्य में सरकारी स्कूलों में तमिल और अंग्रेजी पढ़ाई जाती है।
शिक्षा मंत्री अंबिल महेश पोय्यामोझी ने कहा कि इससे छात्र अपनी भाषा और संस्कृति से जुड़े रहते हैं और अंग्रेजी सीखकर दुनिया से जुड़ पाते हैं।
केंद्र का जवाब
तमिलनाडु के विरोध पर केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने कहा, “किसी भी भाषा को थोपने का कोई सवाल ही नहीं है।”
उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति का मकसद विदेशी भाषाओं पर जरूरत से ज्यादा निर्भरता को कम करना है, ताकि छात्रों का अपनी भाषाई जड़ों से जुड़ाव बना रहे।