Supreme Court on Mahila Khatna: देश की सर्वोच्च अदालत मुस्लिम महिलाओं की खतना प्रथा पर रोक लगाने की याचिका पर सुनवाई करने के लिए तैयार है। अदालत ने इस संबंध में सभी पक्षों को नोटिस जारी कर उनसे जवाब मांगा है। सुप्रीम कोर्ट अब केंद्र सरकार और अन्य पक्षों की दलीलें सुनने के बाद इस मामले पर आगे फैसला लगा। बता दें, न्यायमूर्ति बी. वी. नागरत्ना और न्यायमूर्ति आर. महादेवन की पीठ ने शुक्रवार को एक गैर-सरकारी संगठन द्वारा दायर याचिका पर सभी जरूरी पक्षों को नोटिस जारी किया है।
गैर सरकारी संगठन ‘चेतना वेलफेयर सोसाइटी’ ने मुस्लिम महिलाओं के खतना पर रोक के लिए याचिका दायर की है। यह याचिका खासतौर से दाउदी बोहरा समुदाय में प्रचलित प्रथा पर रोक लगाने के संबंधित है। संगठन ने अपनी याचिका में इस प्रथा को बच्चों के अधिकारों का उल्लंघन बताते हुए दावा किया कि ये इस्लाम का जरूरी हिस्सा नहीं है। याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता शशि किरण और अधिवक्ता साधना संधू ने दलील दी कि महिला खतना न तो इस्लाम का अनिवार्य हिस्सा है और न ही किसी धार्मिक ग्रंथ में इसका स्पष्ट उल्लेख है। इसके बावजूद बच्चियों पर जबरन यह प्रक्रिया की जाती है। इससे उन्हें गंभीर शारीरिक और मानसिक नुकसान झेलना पड़ता है।
डब्ल्यूएचओ बता चुका है महिला मानवाधिकारों का उल्लंघन
याचिका में कहा गया है, ‘पॉक्सो (यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण) अधिनियम के तहत किसी नाबालिग के जननांगों को गैर-चिकित्सकीय कारणों से छूना कानून का उल्लंघन है।’ याचिका में यह भी उल्लेख किया गया है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने महिला खतना को लड़कियों और महिलाओं के मानवाधिकारों का गंभीर उल्लंघन करार दिया है।
एफजीएफ से गंभीर स्वास्थ्य संकट पैदा होने का डर
कई देश लगा चुके हैं प्रतिबंध
याचिका में बताया गया है कि अमेरिका, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया और कई अफ्रीकी देशों में एफजीएम पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाया जा चुका है। हालांकि भारत में आज भी इस पर रोक लगाने वाला कोई विशिष्ट कानून नहीं है।
भारत में इस पर नहीं है कोई स्वतंत्र कानून
याचिका में बताया गया कि इस पर कोई स्वतंत्र कानून मौजूद नहीं है, लेकिन यह बचे को चोट पहुंचाने से संबंधित कई धाराओं (113, 118(1), 118(2), 118(3)) के तहत आता है। याचिका में बताया गया है कि पॉक्सो एक्ट के तहत भी किसी नाबालिग के जननांग को गैर-चिकित्सीय कारणों से छूना अपराध माना गया है।
दाउदी बोहरा समुदाय में प्रचलित है महिला खतना
एनजीओ ने दावा किया है कि दाउदी बोहरा समुदाय की लगभग 75% महिलाएं अपनी बेटियों पर यह अमानवीय प्रथा लागू करवाती हैं। याचिका में कोर्ट से तत्काल हस्तक्षेप कर इस परंपरा को समाप्त करने का निर्देश दे गुहार लगाई।
दाऊदी बोहरा समुदाय शिया इस्लाम का एक संप्रदाय है, और भारत में यह समुदाय महिला जनांग विकृति (एफजीएम) को ‘खतना’ नाम से अपनाता है। याचिका के अनुसार कुरान में इस प्रथा का कोई उल्लेख नहीं है, लेकिन समुदाय के विशेष ग्रंथ दैम-उल-इस्लाम में इसका समर्थन किया गया है।
2018 में भी आ चुका है ऐसा मामला
इससे पहले 2018 में, दाऊदी बोहरा मुस्लिम समुदाय की नाबालिग लड़कियों के खतना की प्रथा को चुनौती देने वाली याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट के समक्ष आई थीं। केंद्र सरकार ने इस मामले पर सुप्रीम कोर्ट में खतना को जुर्म कहते हुए इस पर रोक का समर्थन करने की बात कही थी। साथ ही, कहा था कि इसके लिए दंड विधान में सात साल तक कैद की सजा का प्रावधान भी है। यह याचिका सुप्रीम कोर्ट में वकील सुनीता तिहाड़ ने दायर की थी।