11 साल की बच्ची के साथ हुई घटना पर आए एक फैसले ने देशभर में सवाल खड़े कर दिए थे। अब सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा है- ऐसे मामलों को सिर्फ कानूनी तकनीकी शब्दों से नहीं, बल्कि संवेदनशील नजरिए से भी देखना होगा। सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें कहा गया था कि पायजामा का नाड़ा खोलना, “रेप या रेप की कोशिश” नहीं मानी जाएंगी।
प्रॉसिक्यूशन के मुताबिक, दो आरोपियों- पवन और आकाश ने 11 साल की बच्ची के साथ छेड़छाड़ की। आरोप है कि उन्होंने उसके कपड़े खींचे, पायजामे की डोरी तोड़ी और उसे पुलिया के नीचे घसीटने की कोशिश की।
लोगों के पहुंचने पर आरोपी मौके से भाग गए।
ट्रायल कोर्ट ने इस घटना को रेप की कोशिश और बच्चों के खिलाफ यौन अपराध मानते हुए IPC की धारा 376 और POCSO कानून के तहत मामला चलाने का आदेश दिया था।
लेकिन हाईकोर्ट ने आरोपों में बदलाव करते हुए कहा कि पायजामा का नाड़ा खोलने का मामला रेप की कोशिश का नहीं, बल्कि कपड़े उतारने की नीयत से हमला और गंभीर यौन उत्पीड़न का बनता है।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
10 फरवरी को दिए अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने कहा कि वह हाईकोर्ट की इस बात से सहमत नहीं है कि यह सिर्फ “तैयारी” थी, “कोशिश” नहीं।
कोर्ट ने जोर देकर कहा कि यौन अपराध से जुड़े मामलों में फैसला करते समय पीड़ित की स्थिति और उसकी असुरक्षा को समझना जरूरी है।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर अदालतें पीड़ितों की संवेदनशीलता को नजरअंदाज करेंगी, तो न्याय अधूरा रह जाएगा।
शीर्ष अदालत खुद लिया संज्ञान
मार्च 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने इस आदेश पर खुद संज्ञान लिया और हाईकोर्ट के फैसले पर रोक लगा दी।
सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि “तैयारी” और “कोशिश” के बीच का फर्क इस मामले में सही ढंग से लागू नहीं किया गया था।
वरिष्ठ वकीलों ने भी दलील दी कि अदालत की भाषा ऐसी नहीं होनी चाहिए जो यौन अपराध झेल चुके लोगों के अनुभव को कम करके दिखाए।
अंतिम फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि न्याय व्यवस्था में संवेदनशीलता बढ़ाने की जरूरत है। हालांकि कोर्ट ने खुद कोई गाइडलाइन जारी नहीं की, लेकिन उसने नेशनल ज्यूडिशियल एकेडमी भोपाल को विशेषज्ञ समिति बनाने का निर्देश दिया है।
यह समिति यौन अपराध और अन्य कमजोर वर्गों से जुड़े मामलों में अदालतों के लिए संवेदनशीलता बढ़ाने वाली गाइडलाइन तैयार करेगी और तीन महीने में रिपोर्ट देगी।
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला सिर्फ एक केस तक सीमित नहीं है। यह साफ संदेश देता है कि यौन अपराध से जुड़े मामलों में कानून के साथ-साथ इंसानियत और संवेदना भी उतनी ही जरूरी है।