देश में बनेंगे स्वदेशी ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट, इसके लिए बनाई जाने वाली SPV के लिए 12511 करोड़ रुपये का हो सकता है आवंटन

Indigenous transport aircraft project : सरकार स्वदेशी ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट के विकास के लिए बनाई जाने वाली SPV के लिए 12511 करोड़ रुपये का आवंटन कर सकती है। इसमें सबसे ज़्यादा खर्च सर्टिफिकेशन, टेस्टिंग और इंफ्रास्ट्रक्चर पर होगा। इस प्रपोज़ल में डिज़ाइन और फ्लाइट टेस्टिंग के लिए इंटरनेशनल पार्टनर का प्रावधान शामिल है

अपडेटेड Jan 21, 2026 पर 2:03 PM
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प्रस्ताव में सिस्टम के स्वदेशीकरण के लिए 1,000 करोड़ रुपये भी रखे गए हैं, जो एयरक्राफ्ट कंपोनेंट में घरेलू क्षमता विकसित करने पर ज़ोर देता है। प्लान में लगभग 480 करोड़ रुपये, या प्रोजेक्ट कॉस्ट का लगभग 5 प्रतिशत, इमरजेंसी फंड भी रखा गया है

सरकारी सूत्रों के हवाले से मनीकंट्रोल को मिली जानकारी के मुताबिक सरकार एक रीजनल ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट बनाने के लिए एक स्पेशल पर्पस व्हीकल (SPV) बनाने के लिए करीब 12,511 करोड़ रुपये देने वाली है। इसमें से ज़्यादातर पैसा सिर्फ़ डिज़ाइन के बजाय सर्टिफ़िकेशन, टेस्टिंग और इंफ़्रास्ट्रक्चर के लिए रखा गया है। प्रपोजल के कॉस्ट स्ट्रक्चर से पता चलता है कि रेगुलेटरी अप्रूवल और टेक्निकल वैलिडेशन में कुल खर्च का एक बड़ा हिस्सा लगेगा, जो एक सिविल एयरक्राफ्ट बनाने की जटिलता प्रदर्शित करता है। मनीकंट्रोल ने प्रपोज़ल डॉक्यूमेंट्स की एक कॉपी देखी है।

सूत्रों के मुताबिक SPV प्रस्ताव की अब विस्तार से जांच की जा रही है और मोटे तौर पर इसकी फाइनेंशियल रूपरेखा तैयार है। इस रूपरेखा का मकसद एक ऐसा खास सिस्टम बनाना है जो एयरक्राफ्ट को डिज़ाइन से लेकर सर्टिफिकेशन और आखिर में प्रोडक्शन के स्तर तक ले जा सके। बता दें कि रीजनल ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट छोटी से मध्यम दूरी का पैसेंजर प्लेन होता है जिसका इस्तेमाल आमतौर पर डोमेस्टिक और रीजनल रूटों पर किया जाता है।

SPV क्या करेगा?


SPV को एक डेडिकेटेड कंपनी या एंटिटी के तौर पर प्रपोज़ किया गया है जो रीजनल ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट प्रोजेक्ट को आगे बढ़ाने के लिए सरकारी सपोर्ट, टेक्निकल पार्टनर्स और इंडस्ट्री के लोगों को एक प्लेटफॉर्म पर लाएगी। हालांकि सरकार ने कहा है कि वह SPV को स्थापित करने की "प्रक्रिया में है", लेकिन इसे अभी तक औपचारिक रूप से लॉन्च नहीं किया गया है।

सूत्रों के मुताबिक SPV वह प्लेटफॉर्म होगा जिसके ज़रिए फंडिंग, पार्टनरशिप और दूसरे कामों को कोऑर्डिनेट किया जाएगा। इसका मकसद यह है कि ज़िम्मेदारी कई एजेंसियों में न बंटे। इस प्रोजेक्ट में एक इंटरनेशनल पार्टनर को भी शामिल करने की योजना है।

विदेशी एक्सपर्ट्स की भूमिका

प्रस्ताव का एक अहम हिस्सा डिज़ाइन, सर्टिफिकेशन और फ़्लाइट टेस्टिंग कंसल्टेंसी के लिए एक इंटरनेशनल नॉलेज पार्टनर को शामिल करना है। इसके लिए लगभग 750 करोड़ रुपये रखे गए हैं। इससे पता चलता है कि सरकार अपने इस प्लान में सेफ्टी अप्रूवल और टेस्टिंग से जुड़े बाहरी टेक्निकल सपोर्ट के साथ स्वदेशी डेवलपमेंट को आगे बढ़ाना चाहती है।

सूत्रों के मुताबिक इस प्रोजेक्ट में खासकर ग्लोबल स्टैंडर्ड के तहत सर्टिफिकेशन के लिए खास एक्सपर्टाइज की ज़रूरत होगी। इसको ध्यान में रखते हुए इस प्रोपोजल में एक इंटरनेशनल नॉलेज पार्टनर का प्रावधान किया गया है। उम्मीद है कि कंसल्टेंसी में FAR-25 डिज़ाइन सपोर्ट और फ़्लाइट टेस्टिंग जैसे एरिया शामिल होंगे, जो कमर्शियल एयरक्राफ्ट सर्टिफिकेशन के लिए ज़रूरी होते हैं।

FAR-25 का मतलब US फेडरल एविएशन रेगुलेशन है जो बड़े ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट के लिए सेफ्टी स्टैंडर्ड तय करते हैं। अगर किसी एयरक्राफ्ट को इंटरनेशनल लेवल पर रेगुलेटर और एयरलाइंस द्वारा स्वीकार किया जाना है, तो इन स्टैंडर्ड को पूरा करना ज़रूरी होता है।

सर्टिफिकेशन इतना महंगा क्यों?

एयरक्रॉफ्ट के सिर्फ सर्टिफिकेशन पर ही 2,500 करोड़ रुपये से ज़्यादा का खर्च आता है। यह एयरक्रॉफ्ट के विकास का सबसे बड़ा खर्च होता है। सर्टिफिकेशन में एविएशन रेगुलेटर को यह साबित करना होता है कि विमान कई तरह की स्थितियों में उड़ने के लिए सुरक्षित है, जिसके लिए हजारों घंटों की टेस्टिंग, डिटेल डॉक्यूमेंटेशन सिमुलेशन और रियल-वर्ल्ड ट्रायल की ज़रूरत होती है।

ग्राउंड टेस्टिंग में स्ट्रक्चरल टेस्ट, फटीग टेस्ट और सिस्टम इंटीग्रेशन चेक शामिल होते हैं। जबकि, फ्लाइट टेस्टिंग में परफॉर्मेंस, सेफ्टी और रिलायबिलिटी टेस्ट करने के लिए प्रोटोटाइप को हवा में उड़ाया जाता है। सूत्रों के मुताबिक ये दोनों स्टेज मिलकर बताते हैं कि टेस्टिंग और सर्टिफिकेशन में बजट का इतना बड़ा हिस्सा क्यों खर्च होता है।

कैसे खर्च होगा पैसा?

प्रस्ताव के कॉस्ट ब्रेक-अप से पता चलता है कि सबसे बड़ा खर्च एयरक्राफ्ट के सर्टिफिकेशन पर होगा। इसके लिए 2,507 करोड़ रुपये खर्च होंगे। इसके आलवा इंफ्रास्ट्रक्चर सुविधाओं के लिए 1,981 करोड़ रुपये का प्लान किया गया है। ग्राउंड टेस्टिंग प्रोटोटाइप पर 1,873 करोड़ रुपये और खर्च होंगे, जबकि प्रोटोटाइप की फ्लाइट टेस्टिंग पर 291 करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान है।

मटीरियल, खरीदे गए आइटम (BOIs), लाइन-रिप्लेसेबल यूनिट (LRUs) और सिस्टम पर 240 करोड़ रुपये का खर्च तय किया गया है। प्रोटोटाइप टूलिंग और असेंबली जिग्स पर लगभग 133 करोड़ रुपये खर्च होंगे, जबकि डॉक्यूमेंटेशन और पब्लिकेशन पर 465 करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान है।

BOIs, या खरीदे गए आइटम, वे पार्ट्स होते हैं जो बाहर के सप्लायर से खरीदे जाते हैं। LRUs, या लाइन-रिप्लेसेबल यूनिट, ऐसे कंपोनेंट होते हैं जिन्हें मेंटेनेंस के दौरान एयरक्राफ्ट में जल्दी से बदला जा सकता है।

प्रस्ताव में सिस्टम के स्वदेशीकरण के लिए 1,000 करोड़ रुपये भी रखे गए हैं, जो एयरक्राफ्ट कंपोनेंट में घरेलू क्षमता विकसित करने पर ज़ोर देता है। प्लान में लगभग 480 करोड़ रुपये, या प्रोजेक्ट कॉस्ट का लगभग 5 प्रतिशत, इमरजेंसी फंड भी रखा गया है। एडमिनिस्ट्रेटिव और एस्टैब्लिशमेंट खर्च का अनुमान 680 करोड़ रुपये है, जो कंटीजेंसी और कुछ कंसल्टेंसी मदों को छोड़कर लागत का लगभग 6 प्रतिशत है।

 

 

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