उन्नाव रेप केस में पूर्व बीजेपी विधायक कुलदीप सिंह सेंगर की आजीवन कारावास की सजा को निलंबित करने के दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले पर बवाल मचा है। हालांकि, कोर्ट ऑर्डर पढ़ने से पता चलता है कि केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) ने भी मामले की जांच के दौरान पीड़िता को निराश किया है। CBI ने हाई कोर्ट में माना कि सुप्रीम कोर्ट ने एक पुराने मामले में फैसला दिया था कि विधायक IPC की धारा 21 के तहत लोक सेवक नहीं है।
हाई कोर्ट ने सेंगर के खिलाफ POCSO की धारा 5(C) और 6 रद्द कर दी, क्योंकि विधायक लोक सेवक नहीं है, इसलिए इन धाराओं से उम्रकैद की सजा नहीं हो सकती। CBI ने हाई कोर्ट से कानून को उसके उद्देश्य के अनुसार समझने को कहा था, लेकिन कोर्ट ने ऐसा नहीं किया।
हाई कोर्ट ने यह भी कहा कि जब पीड़िता के परिवार ने 2019 में सेंगर पर IPC की ज्यादा गंभीर धाराओं के तहत मुकदमा चलाने की मांग की थी, यह कहते हुए कि वह एक लोक सेवक था, जिसने बलात्कार किया था, तब CBI ने याचिका में पीड़िता का समर्थन नहीं किया था।
तब एजेंसी ने कहा था कि पीड़िता की तरफ से लगाए नए आरोप "पूरी तरह से लागू नहीं होते"। निचली अदालत ने 2019 में याचिका खारिज कर दी थी।
दिल्ली हाई कोर्ट ने अब अपने फैसले में कहा है, "पीड़िता ने निचली अदालत की ओर से 20.08.2019 को पारित आदेश को चुनौती नहीं दी थी और न ही CBI ने इसका समर्थन किया था।"
पीड़ित के परिवार ने चाहा कि सेंगर को IPC की धारा 376(2)(F) और (K) के तहत दोषी ठहराया जाए, न कि IPC की धारा 376(2) और POCSO की धारा 5 और 6 के तहत। लेकिन ऐसा नहीं हो सका।
अदालत ने सेंगर को पीओसीएसओ की धारा 5 और 6 के तहत लगे आरोपों से बरी कर दिया है। हाई कोर्ट ने कहा कि सेंगर पर केवल POCSO की धारा 3 के तहत मुकदमा चलाया जा सकता है, जिसमें अधिकतम सात साल की सजा का प्रावधान है, जो अवधि सेंगर पहले ही जेल में बिता चुके हैं।
हाई कोर्ट के फैसले में ट्रायल कोर्ट की यह टिप्पणी भी शामिल है कि यह साफ है कि सीबीआई के जांच अधिकारी ने मामले की निष्पक्ष जांच नहीं की। इससे पीड़िता और उसके परिवार के केस को नुकसान हुआ।
दरअसल, पीड़िता के परिवार ने हाई कोर्ट को बताया कि जांच CBI को सौंपे जाने के बाद भी निष्पक्ष और ईमानदार तरीक से नहीं हुई। हालांकि, इसके बावजूद ट्रायल कोर्ट में सीबीआई का मामला दोषसिद्धि पर खत्म हुआ और निचली अदालत ने दोषी को सजा सुनाई।
पीड़िता के परिवार ने इस मामले में हाई को बताया, "सीबीआई के जांच अधिकारी ने सेंगर के साथ मिलीभगत करके यही चाहा कि पीड़िता की उम्र से जुड़ी प्रासंगिक सबूत कभी सामने न आएं और इसके बजाय, सेंगर की तरफ से तैयार किए गए झूठे और मनगढ़ंत दस्तावेज पेश किए जाएं।"