भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) संजीव खन्ना ने- सोमवार (5 मई) को कहा कि वक्फ (संशोधन) अधिनियम 2024 को चुनौती देने वाली याचिकाओं को जस्टिस बीआर गवई की अध्यक्षता वाली बेंच के सामने सुनवाई के लिए रखा जाएगा, क्योंकि उनके पास रिटायरमेंट से पहले कुछ ही दिन बचे हैं। वक्फ संशोधन कानून के खिलाफ दायर याकिकाओं पर आज सुप्रीम कोर्ट में चीफ जिस्टिस संजीव खन्ना, जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस केवी विश्वनाथन की बेंच के सामने सुनवाई होनी थी।
Live Law की रिपोर्ट के मुताबिक, जैसे ही मामला सुनवाई के लिए आया, मुख्य न्यायाधीश खन्ना ने कहा कि उन्होंने केंद्र के जवाबी हलफनामे और याचिकाकर्ताओं के प्रत्युत्तर हलफनामों को पढ़ा है, लेकिन विस्तार से नहीं।
'अंतरिम चरण में कोई आदेश सुरक्षित नहीं रखना चाहते'
उन्होंने कहा कि वे अंतरिम चरण में कोई निर्णय/आदेश सुरक्षित नहीं रखना चाहते। साथ ही, उन्होंने इस बात पर सहमति जताई कि मामले की जल्द सुनवाई की जरूरत है। इसलिए, उन्होंने प्रस्ताव दिया कि मामले को जस्टिस बीआर गवई की अध्यक्षता वाली बेंच के सामने सुनवाई के लिए रखा जाए।
उन्होंने कहा, "मुझे अंतरिम चरण में कोई निर्णय या आदेश सुरक्षित रखने की जरूरत नहीं है। इस मामले की सुनवाई जल्द ही करनी होगी और यह मेरे सामने नहीं होगा। अगर आप सभी सहमत हैं, तो हम इसे जस्टिस गवई की बेंच के समक्ष रखते हैं।"
दोनों पक्षों ने CJI से जताई सहमति
याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश हुए वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल और वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंघवी और भारत के सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने CJI के सुझाव को स्वीकार कर लिया।
पिछली सुनवाई में बेंच की ओर से कुछ चिंताएं जताए जाने के बाद केंद्र ने कुछ विवादित प्रावधानों को हटाने का वचन दिया था।
केंद्र ने 17 अप्रैल को अदालत को बताया था कि वह मामले की सुनवाई की अगली तारीख 5 मई तक ‘‘वक्फ बाय यूजर’’ सहित दूसरे वक्फ संपत्तियों को गैर-अधिसूचित नहीं करेगा, न ही केंद्रीय वक्फ परिषद और बोर्ड में कोई नियुक्तियां करेगा।
वक्फ कानून पर SC में केंद्र का पक्ष
केंद्र की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने प्रधान न्यायाधीश संजीव खन्ना, न्यायमूर्ति संजय कुमार और न्यायमूर्ति के वी विश्वनाथन की पीठ से कहा था कि संसद की ओर से उचित विचार-विमर्श के बाद पारित कानून पर सरकार का पक्ष सुने बिना रोक नहीं लगाई जानी चाहिए।
सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने कहा कि पहले से रजिस्टर्ड या नोटिफिकेशन के जरिए घोषित वक्फ संपत्तियों, जिनमें ‘वक्फ बाय यूजर’ भी शामिल है, को अगली सुनवाई की तारीख तक न तो छेड़ा जाएगा और न ही गैर अधिसूचित किया जाएगा।
इसके बाद बेंच ने केंद्र को कानून की वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर शुरुआती जवाब दाखिल करने के लिए एक हफ्ते का समय दिया और मामले की अगली सुनवाई पांच मई के लिए तय की।
पांच अप्रैल को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू की मंजूरी मिलने के बाद केंद्र ने वक्फ (संशोधन) अधिनियम, 2025 को पिछले महीने अधिसूचित किया था।
वक्फ कानून के खिलाफ कौन-कौन पहुंचा सुप्रीम कोर्ट?
वक्फ (संशोधन) विधेयक को लोकसभा ने 288 सदस्यों के समर्थन से पारित किया, जबकि 232 सांसद इसके खिलाफ थे। राज्यसभा में इसके पक्ष में 128 और इसके खिलाफ 95 सदस्यों ने मतदान किया।
कई राजनीतिक दलों, मुस्लिम संगठनों और एनजीओ ने अधिनियम की वैधता को चुनौती देते हुए शीर्ष अदालत का रुख किया है।
पांच बीजेपी शासित राज्यों असम, राजस्थान, छत्तीसगढ़, उत्तराखंड, हरियाणा और महाराष्ट्र ने विधेयक का समर्थन करते हुए हस्तक्षेप आवेदन दायर किए हैं। AIMIM सांसद असदुद्दीन ओवैसी, दिल्ली के AAP विधायक अमानतुल्लाह खान, एसोसिएशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ सिविल राइट्स, जमीयत उलेमा-ए-हिंद के अध्यक्ष अरशद मदनी, ऑल केरल जमीयतुल उलेमा, अंजुम कादरी, तैय्यब खान सलमानी, मोहम्मद शफी, टीएमसी सांसद महुआ मोइत्रा, इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग, ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड, RJD सांसद मनोज कुमार झा, SP सांसद जिया उर रहमान, कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया, DMK आदि याचिकाकर्ताओं में शामिल हैं।