पश्चिम बंगाल प्रदेश अध्यक्ष पद पर समिक भट्टाचार्य की नियुक्ति के बाद भाजपा का हौसला बुलंद है। इस नियुक्ति से लगता है कि ऐसी कई कमियां दूर हो गई हैं, जो 2021 के विधानसभा चुनावों में भाजपा की हार का कारण बनी थीं। सवाल है कि क्या अगले साल पश्चिम बंगाल में खेला होने जा रहा है? इस चुनाव की तैयारियों को लेकर बीजेपी काफी गंभीर दिख रहा है। 2021 में भी बीजेपी ने बंगाल विधानसभा चुनावों में अपनी पूरी ताकत लगा दी थी। इससे पार्टी का वोट शेयर तो बढ़ा था, लेकिन वह ममता बनर्जी को मुख्यमंत्री पद से बेदखल करने में नाकाम रही थी।
यह मार्च 2021 की बात है। राज्य में विधानसभा चुनावों का प्रचार अभियान अपने चरम पर था। झारग्राम जिले के नक्सल प्रभावित लालगढ़ इलाके में BJP ने एक बड़ी रैली का आयोजन किया था। उत्तर प्रदेश के डिप्टी मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य को सुनने और देखने के लिए भारी भीड़ जुटी थी। इसमें ज्यादातर संथाल जनजाति के लोग थे। मौर्य का नाम स्टार प्रचारकों में शामिल था। उन्होंने 30 मिनट तक भाषण दिया। उन्होंने भाषण का अंत 'जय श्रीराम' के नारे के साथ किया। लेकिन, जनता की वाहवाही सुनने को नहीं मिली।
चुनावी मैदान के हिसाब से बदलते हैं दांव
ऐसा नहीं है कि लोगों को मौर्य का भाषण पसंद नहीं आया। दरअसल, संथाल लोग बंगाली को छोड़ दूसरी भाषा न तो जानते हैं और न ही समझते हैं। लोगों से जुड़ने के लिए हिन्दी का इस्तेमाल करने वाली BJP से 2021 के विधानसभा चुनावों में एक बड़ी भूल हुई थी। पार्टी का नेतृत्व यह नहीं समझ पाया कि चुनाव का मैदान बदलने के साथ मैदान में इस्तेमाल होने वाले दांव भी बदल जाते हैं। उत्तर भारत में इस्तेमाल होने वाले दांव का इस्तेमाल कर दक्षिण भारत में चुनाव नहीं जीते जा सकते। पूर्वी भारत में इस्तेमाल होने वाले दांव पश्चिम भारत में नाकाम साबित हो सकते हैं।
मध्यम वर्गीय मतदाताों तक सीधी पहुंच
समिक भट्टाचार्य के अध्यक्ष बनने से भाजपा न सिर्फ शहरी मध्यमवर्ग बल्कि ग्रामीण इलाकों के मतदाताओं को भी साध सकती है। भट्टाचार्य कोलकाता के साल्ट लेक सिटी के रहने वाले हैं। बंगाली बहुत अच्छा बोलते हैं। साथ ही हिंदी और अंग्रेजी पर उनकी अच्छी पकड़ है। वह कुर्ता और पायजामा की जगह पैंट और शर्ट पहनना पसंद करते हैं। यह पहनावा व्यक्ति को सीधे उस मध्यम वर्ग से जोड़ता है, जिसका आज चुनाव जीताने में बड़ी भूमिका हो गई है।
'जय महाकाली' के नारे पर भरोसा
बीजेपी ने यह भी समझ लिया है कि पश्चिम बंगाल में 'जय श्रीराम' की जगह 'जय मां काली' का नारा ज्यादा कारगर होगा। पश्चिम बंगाल में भगवान श्रीराम में लोगों की आस्था कम नहीं है। लेकिन, कभी इसका इस्तेमाल राजनीतिक हथियार के रूप में नहीं हुआ है। उधर,मां काली और जगन्नाथ महाप्रभु आम लोगों के जीवन के अभिन्न हिस्सा हैं। ऐसा लगता है कि बीजेपी ने इस बात को समझ लिया है, क्योंकि भट्टाचार्य के सम्मान में आयोजित कार्यक्रम में एक तरफ श्यामा प्रसाद मुखर्जी की फोटो थी तो दूसरी तरफ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की फोटो थी। बीच में महाकाली की बहुत बड़ी फोटो थी।
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देश की सबसे बड़ी पार्टी जिस तरह 2026 के विधानसभा चुनावों को लेकर गंभीर दिख रही है, उससे लगता है कि अगले साल के चुनाव 2021 के मुकाबले ज्यादा मजेदार होंगे। पिछले चुनावों में ममता बनर्जी ने कहा था कि 'खेला होबे'। चुनाव के नतीजें आने के बाद सही में खेला हुआ था। अगले साल भी प्रांत में खेला होने की संभावना दिख रही है। यह खेला किस तरह से होगा, यह जानने के लिए थोड़ा इंतजार करना होगा।