कड़े मुकाबले वाले चुनावों में असली फैसला हमेशा जोर से खुलकर बोलने वाले वोटर नहीं करते, बल्कि वो लोग करते हैं जो चुप रहते हैं। इन्हें ही “साइलेंट वोटर” कहा जाता है। ये वोटर न तो सर्वे में अपनी राय बताते हैं और न ही एग्जिट पोल में खुलकर जवाब देते हैं, लेकिन नतीजों पर इनका बड़ा असर पड़ सकता है।
बुधवार को आए एग्जिट पोल में तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में कड़ी टक्कर दिखाई दे रही है। ऐसे में एक्सपर्ट फिर से इस बात पर चर्चा कर रहे हैं कि क्या सर्वे और एग्जिट पोल सच में सभी वोटरों की सोच को सही तरीके से पकड़ पा रहे हैं या नहीं।
साइलेंट वोटर कौन होते हैं?
साइलेंट वोटर वो लोग होते हैं, जो या तो अपनी पसंद बताने से मना कर देते हैं या जानबूझकर छुपाते हैं। खासकर जब चुनाव कांटे का हो, तब इनकी भूमिका बहुत अहम हो जाती है क्योंकि थोड़ी सी भी गलत गणना नतीजों को बदल सकती है।
कई एक्सपर्ट मानते हैं कि बड़ी संख्या में लोग अपनी वोटिंग पसंद नहीं बताते। इसके पीछे डर, निजी कारण या राजनीतिक माहौल की संवेदनशीलता हो सकती है।
एग्जिट पोल इन्हें क्यों नहीं पकड़ पाते?
एग्जिट पोल इस बात पर निर्भर करता है कि लोग वोट डालने के बाद सही जवाब दें। लेकिन अगर लोग जवाब ही न दें या गलत जानकारी दें, तो नतीजे गड़बड़ा सकते हैं।
इसे “नॉन-रिस्पॉन्स बायस” कहा जाता है, यानी जो लोग जवाब नहीं देते, वही असल तस्वीर को बदल सकते हैं।
इसके कई कारण हो सकते हैं:
इसका असर कितना बड़ा हो सकता है?
करीबी मुकाबले में अगर थोड़े से भी साइलेंट वोटर की सही जानकारी न मिले, तो कई सीटों का नतीजा बदल सकता है। इसलिए इन्हें “साइलेंट गेम चेंजर” भी कहा जाता है।
पश्चिम बंगाल में बीजेपी और टीएमसी के बीच कड़ा मुकाबला बताया जा रहा है। लेकिन यहां भी साइलेंट वोटर असली तस्वीर को बदल सकते हैं।
ज्यादा मतदान और तेज राजनीतिक माहौल में लोग अपनी पसंद छुपाने लगते हैं, जिससे एग्जिट पोल पूरी तरह सटीक नहीं रह जाते।
आज के चुनावों में साइलेंट वोटर बहुत अहम बन गए हैं। एग्जिट पोल सिर्फ वही दिखाते हैं जो लोग बताते हैं, लेकिन जो लोग चुप रहते हैं, वही असली खेल बदल सकते हैं।
इसलिए 4 मई को जब असली नतीजे आएंगे, तो यह देखना दिलचस्प होगा कि चुप रहने वाले वोटरों ने किस तरफ बाजी पलटी।