Allahabad High Court News: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा है कि पश्चिमी विचारों से प्रभावित होकर युवा 'लिव-इन-रिलेशनशिप' में रह रहे हैं। साथ ही अदालत ने कहा कि इस तरह के संबंध खराब होने पर दुष्कर्म के आरोप लगाते हुए FIR दर्ज करा दी जाती है। अदालत ने यह टिप्पणी करते हुए एक युवक को सुनाई गई आजीवन कारावास की सजा रद्द कर दी। युवक पर कथित तौर पर एक नाबालिग लड़की का अपहरण करके यौन शोषण करने का आरोप था।
अदालत ने पाया कि घटना के समय लड़की बालिग थी। वह अपनी इच्छा से आरोपी युवक के साथ घर छोड़कर गई थी। जस्टिस सिद्धार्थ और जस्टिस प्रशांत मिश्र की खंडपीठ ने चंद्रेश नामक युवक की अपील स्वीकार करते हुए कहा कि पश्चिमी विचारों से प्रभावित होकर युवाओं के बीच बिना शादी के लिव-इन-रिलेशनशिप में रहने का चलन बढ़ गया है। पीठ ने यह भी कहा कि जब ऐसे संबंध खराब हो जाते हैं तो FIR दर्ज करा दी जाती है।
पीठ ने यह भी कहा कि चूंकि कानून महिलाओं के पक्ष में हैं। इसलिए पुरुष इन कानूनों के आधार पर दोषी ठहराए जाते हैं। जबकि ये कानून तब बनाए गए थे जब लिव-इन-रिलेशनशिप की अवधारणा अस्तित्व में नहीं थी। मुकदमे के अनुसार, एक व्यक्ति ने आरोप लगाया कि याचिकाकर्ता शादी के बहाने उसकी बेटी को घर से ले गया।
बाद में उसे बेंगलुरु ले जाकर उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए। निचली अदालत ने अपीलकर्ता को भारतीय दंड सहिंता (IPC) की संबंधित धाराओं के तहत दोषी ठहराया था। इसके खिलाफ उसने हाई कोर्ट में अपील की थी। रिकॉर्ड पर गौर करने के बाद अदालत ने पाया कि पीड़िता बालिग थी।
हाई कोर्ट ने कहा कि निचली अदालत ने ‘ऑसिफिकेशन टेस्ट’ रिपोर्ट पर उचित ढंग से विचार नहीं किया था जिसमें पीड़िता की आयु करीब 20 वर्ष सिद्ध हुई थी। अदालत ने पाया कि लड़की युवक के साथ बेंगलुरु में घनी आबादी वाले क्षेत्र में छह महीने तक रही और सहमति से शारीरिक संबंध बनाए।
अदालत ने पाया कि जब छह अगस्त, 2021 को युवक ने उसे शिकारपुर चौराहे पर वापस छोड़ दिया तब उसने अपने परिवार से संपर्क किया। अदालत ने कहा कि IPC की धारा 363 और 366 के तहत दोषीसिद्धि पूरी तरह अवांछित थी क्योंकि पीड़िता बालिग थी और वह अपनी इच्छा से घर छोड़कर गई थी।
अभियोजन पक्ष के अनुसार, चंद्रेश ने मुखबिर की नाबालिग बेटी को शादी के बहाने बहला-फुसलाकर बेंगलुरु ले गया। फिर उसके साथ शारीरिक संबंध स्थापित किए। ट्रायल कोर्ट ने उसे आईपीसी की धारा 363 (अपहरण), 366 (शादी के लिए अपहरण) और 323 (जानबूझकर चोट पहुंचाना), POCSO अधिनियम की धारा 6 और SC/ST अधिनियम की धारा 3(2)(V) के तहत दोषी ठहराया था।
इसके बाद दोषसिद्धि को चुनौती देते हुए अपीलकर्ता ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। अदालत ने रिकॉर्ड की जांच के बाद पाया कि घटना के समय महिला बालिग थी। पीठ ने बताया कि ट्रायल कोर्ट ओस्सिफिकेशन टेस्ट रिपोर्ट पर ठीक से विचार करने में विफल रही, जिससे पता चला कि उसकी उम्र लगभग 20 साल थी।