कर्नाटक का हर नया CM घर की तलाश में क्यों जुट जाता है? डीके शिवकुमार ने 160 साल पुराना जो बंगला चुना वो बेहद खास!
इसका जवाब ना में है। कर्नाटक में कभी भी किसी सरकारी बंगले को मुख्यमंत्री के स्थायी निवास के रूप में औपचारिक रूप से अधिसूचित नहीं किया गया है। पिछले कई दशकों से अलग-अलग मुख्यमंत्री अपनी सुविधा के अनुसार विभिन्न सरकारी संपत्तियों में रहते आए हैं। वैसे 1980 के दशक से कुमार कृपा रोड पर स्थित दो आस-पास के बंगले कृष्णा और कावेरी सीएम आवास से ज्यादा करीब से जुड़े माने जा सकते हैं। कृष्णा बंगले का इस्तेमाल आधिकारिक बैठकों और प्रशासनिक कार्यों के लिए किया जाता है जबकि कावेरी सीएम आवास के रूप में इस्तेमाल होता है
कर्नाटक में हर नए मुख्यमंत्री के सामने आखिर आवास की यह पहेली क्यों खड़ी हो जाती है?
भारत के कुछ ही राज्य ऐसे हैं जहां मुख्यमंत्री के स्थायी निवास के लिए कोई आधिकारिक सरकारी बंगला तय नहीं है और कर्नाटक उन्हीं राज्यों में से एक है। यही वजह है कि राज्य में जब भी सत्ता परिवर्तन होता है या नया नेतृत्व आता है तो उनके लिए घर की तलाश शुरू हो जाती है। बंगलों की ये तलाश कई बार जरूरत से ज्यादा वास्तु के मापदंडों की कसौटी पर भी कसी जाने लगती है। आप एक तरह से कह सकते हैं कि बेंगलुरु में एक घर ढूंढना किसी के लिए आसान नहीं है, यहां तक कि कर्नाटक के मुख्यमंत्री के लिए भी नहीं। ये मामला इस वक्त चर्चा में इसलिए है क्योंकि मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार ने अपने रहने और कार्यालय के लिए लगभग 160 साल पुराने कुमार कृपा (Kumara Krupa) बंगले को चुना है। लोक निर्माण विभाग (PWD) इस हेरिटेज प्रॉपर्टी को रिनोवेट करने में जुटा है। यह नौबत इसलिए आई क्योंकि पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने कावेरी बंगले में ही रहने का फैसला किया है। यह बंगला आमतौर पर कर्नाटक के मुख्यमंत्रियों से सबसे करीब से जुड़ा रहा है।
आइए विस्तार से समझते हैं कि कर्नाटक में हर नए मुख्यमंत्री के सामने आखिर आवास की यह पहेली क्यों खड़ी हो जाती है और इसके पीछे क्या सियासी व ऐतिहासिक कारण हैं।
क्या कर्नाटक में मुख्यमंत्री का कोई आधिकारिक स्थायी निवास है?
इसका जवाब ना में है। कर्नाटक में कभी भी किसी सरकारी बंगले को मुख्यमंत्री के स्थायी निवास के रूप में औपचारिक रूप से अधिसूचित नहीं किया गया है। पिछले कई दशकों से अलग-अलग मुख्यमंत्री अपनी सुविधा के अनुसार विभिन्न सरकारी संपत्तियों में रहते आए हैं। वैसे 1980 के दशक से कुमार कृपा रोड पर स्थित दो आस-पास के बंगले कृष्णा और कावेरी सीएम आवास से ज्यादा करीब से जुड़े माने जा सकते हैं। कृष्णा बंगले का इस्तेमाल आधिकारिक बैठकों और प्रशासनिक कार्यों के लिए किया जाता है जबकि कावेरी सीएम आवास के रूप में इस्तेमाल होता है।
कावेरी बंगले का इतिहास और सिद्धारमैया का जुड़ाव
पूर्व मुख्यमंत्री आर गुंडू राव 1980 में कावेरी बंगले में रहने वाले पहले मुख्यमंत्री थे। उनके बाद सिद्धारमैया, बीएस येदियुरप्पा, जगदीश शेट्टार, जेएच पटेल, एस बंगारप्पा और वीरेंद्र पाटिल जैसे कई दिग्गज मुख्यमंत्री अपने कार्यकाल के दौरान इस बंगले में रहे। दिलचस्प बात यह है कि कावेरी में रहने वाले मुख्यमंत्रियों में से सिद्धारमैया एकमात्र ऐसे मुख्यमंत्री हैं जिन्होंने अपना पांच साल का पूरा कार्यकाल पूरा किया है। चूंकि सिद्धारमैया इस बार भी कावेरी को छोड़ने के मूड में नहीं हैं इसलिए नए नेतृत्व के लिए नया घर ढूंढने का एक टास्क सामने आ गया।
हर नए सीएम के सामने क्यों खड़ी होती है आवास की पहेली?
इसकी सीधी सी वजह यह है कि मुख्यमंत्री पद के लिए कोई भी आवास स्थायी रूप से आरक्षित नहीं है। जब कोई नया मुख्यमंत्री पद संभालता है तो उनका पसंदीदा बंगला पहले से ही किसी पूर्व मुख्यमंत्री या किसी अन्य संवैधानिक पद पर बैठे अधिकारी के पास हो सकता है। कई मामलों में नए रहने वाले के आने से पहले बंगले में बड़े पैमाने पर रिनोवेशन की जरूरत होती है। इसके अलावा कुछ मुख्यमंत्री सरकारी बंगले में जाने के बजाय अपने निजी घरों में ही रहना पसंद करते हैं। परिणाम यह होता है कि हर बार इस बात को लेकर होड़ मचती है कि कौन सी संपत्ति मुख्यमंत्री का आधिकारिक निवास बनेगी।
डीके शिवकुमार ने क्यों चुना 160 साल पुराना कुमार कृपा बंगला?
चूंकि सिद्धारमैया कावेरी में ही रहेंगे, इसलिए शिवकुमार ने 'कुमार कृपा' को अपना आधिकारिक निवास और 'कृष्णा' को अपना ऑफिस चुना है। कुमार कृपा बंगला 12 कमरों का है और एक सरकारी गेस्ट हाउस के रूप में इस्तेमाल हो रहा था। अब इसका रिनोवेशन किया जा रहा है।
विपक्ष कर रहा आलोचना, जानिए इस बंगले का ऐतिहासिक महत्व
शिवकुमार के इस फैसले की जेडीएस ने कड़ी आलोचना की है। जेडीएस का तर्क है कि इस ऐतिहासिक धरोहर को उसके मौजूदा स्वरूप में ही संरक्षित किया जाना चाहिए। इस बंगले का एक बड़ा ऐतिहासिक महत्व है। यह बंगला मूल रूप से 1883 से 1901 तक मैसूर के दीवान रहे के शेषाद्रि अय्यर का निवास स्थान था। साल 1927 में बेंगलुरु यात्रा के दौरान महात्मा गांधी भी इसी कुमार कृपा बंगले में रुके थे।
अनुग्रह बंगला: आखिर इसे क्यों माना जाता है अशुभ?
राजनीतिक गलियारों में अनुग्रह बंगले को जिंक्सड यानी मनहूस या अशुभ माना जाता है। कहते हैं कि जो भी मुख्यमंत्री इस बंगले में रहने गया वो अपना 5 साल का कार्यकाल पूरा नहीं कर सका। इस बंगले में रहने वाले पूर्व मुख्यमंत्रियों में एचडी देवेगौड़ा, धरम सिंह और डीवी सदानंद गौड़ा शामिल हैं। इन सभी का कार्यकाल समय से पहले खत्म हो गया। पूर्व सीएम एसएम कृष्णा ने भी भी अपना कार्यकाल पूरा होने से पहले ही विधानसभा भंग कर दी थी। पिछले सालों से इस बंगले में कई बार वास्तु बदलाव भी किए गए लेकिन नेताओं के मन से इसका डर पूरी तरह खत्म नहीं हुआ।
राजनीतिक सलाहकार वेंकटेश थोगरीघट्टा बताते हैं कि यह कहना मुश्किल है कि अनुग्रह खराब वास्तु से पीड़ित है या केवल दुर्भाग्य का शिकार है। लेकिन पिछले तीन दशकों में इस बंगले को चुनने वाले कम से कम चार मुख्यमंत्रियों का कार्यकाल बहुत छोटा रहा है। यह बात स्वाभाविक रूप से नए मुख्यमंत्रियों के दिमाग में घर चुनते समय असर डालती है। यही कारण है कि कई मुख्यमंत्री ताज वेस्ट एंड के पास स्थित रेस व्यू कॉटेज जैसे अन्य सरकारी आवासों को प्राथमिकता देते रहे हैं।
क्या वास्तु की मान्यताएं निर्णय को प्रभावित करती हैं?
कुछ मुख्यमंत्रियों ने अपने आवासों और कार्यालयों का चयन या उनमें बदलाव करते समय सार्वजनिक रूप से वास्तु पर विचार करने की बात स्वीकार की है। कुछ अन्य मुख्यमंत्रियों ने ऐसी चिंताओं को खारिज करते हुए प्रशासनिक सुविधा को प्राथमिकता दी है। कार्मिक और प्रशासनिक सुधार विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक चूंकि कोई भी बंगला आधिकारिक तौर पर सीएम निवास के रूप में अधिसूचित नहीं है इसलिए मुख्यमंत्री उपलब्ध सरकारी संपत्तियों में से कोई भी चुनने के लिए स्वतंत्र हैं।
क्या कर्नाटक में एक स्थायी सीएम आवास होना चाहिए?
पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता वीरप्पा मोइली का मानना है कि राज्य में एक स्थायी मुख्यमंत्री आवास होना बेहद जरूरी है। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री के लिए एक निश्चित और नामित आवास होना चाहिए। ऐसा न होने से, हर बार जब कोई नया मुख्यमंत्री आता है तो सरकार एक अलग घर तैयार करने में पैसा खर्च करती है। एक स्थायी आवास होने से बार-बार होने वाले इस रिनोवेशन के खर्च से बचा जा सकता है।