OPINION: नेहरू के 'आइडिया ऑफ इंडिया' पर क्यों भारी पड़ रहा है मोदी का 'भारत'

प्रधानमंत्री मोदी के नए दौर ने भारत को एक सभ्यता के रूप में फिर से परिभाषित किया है। यह दौर 'नेहरूवादी भारत' के उस सांस्कृतिक मॉडल को बदलने वाला साबित हुआ है, जिसने नेहरू के पहले प्रधानमंत्री बनने के बाद दशकों तक भारत की राजनीति की दशा और दिशा तय की थी। मनी कंट्रोल के मैनेजिंग एडिटर नलिन मेहता ने अपने इस लेख में ये समझाने की कोशिश की है कि कैसे मोदी की राजनीति सत्तर साल पुरानी नेहरू की राजनीति का बिल्कुल उलटा रूप (उलटी परछाई) है। इसमें ये बताया गया है कि 'नमो के भारत' का देश की राजनीति, समाज और संस्कृति पर कितना गहरा असर पड़ा है। इसमें ऐसा क्या है जिसने भारतीय राजनीति को हमेशा के लिए बदल दिया है। नलिन मेहता का तर्क है कि प्रधानमंत्री मोदी ने भारत के ताने-बाने को जिस तरह से नए रंग और रूप में ढाला है, वह मौजूदा राजनीति से कहीं अधिक लंबे समय तक कायम रह सकता है

अपडेटेड Jun 10, 2026 पर 5:51 PM
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नेहरू के 'आइडिया ऑफ इंडिया' पर क्यों भारी पड़ रहा है मोदी का 'भारत'

नलिन मेहता

नरेंद्र मोदी अब जवाहरलाल नेहरू को पीछे छोड़ते हुए भारत के सबसे लंबे समय तक लगातार लोकतांत्रिक तरीके से निर्वाचित प्रधानमंत्री बन चुके हैं। नेहरू ने 1952 से 1964 के बीच 4398 दिन प्रधानमंत्री के रूप में बिताए थे जबकि मोदी 4399 दिन पूरे कर चुके हैं और उनका कार्यकाल जारी है। ऐसे में स्वाभाविक सवाल उठता है कि इन दोनों नेताओं में से किसका देश पर अधिक प्रभाव पड़ा और उनकी विरासतों की तुलना कैसे की जाए?

चाहे आप राजनीतिक विचारधारा के किसी भी पक्ष में हों और भले ही एक पक्ष अपने नेता को नायक और दूसरे को खलनायक साबित करने पर उतारु हो लेकिन असल जरूरत तो यही है कि वैचारिक चश्मों और तात्कालिक राजनीति से परे जाकर इन दोनों नेताओं की गहराई से तुलना की जाए।

नेहरू अधिकतर जिन मूल्यों और विचारों का प्रतिनिधित्व करते थे, मोदी करीब-करीब उसके उलट हैं। लेकिन असर की बात करें तो उन्होंने देश की बुनियादी चेतना में जो बड़ा असर पैदा किया है, उसका पैमाना नेहरू के बरअक्स ही है। आंकड़ों से आगे बढ़कर देखें तो 'मोदित्व' का सामाजिक प्रभाव इतना व्यापक है कि 1947 के बाद भारत के 14 प्रधानमंत्रियों में उनकी तुलना सिर्फ नेहरू से ही की भी जा सकती है। या यूं कहें कि मोदित्व का सामाजिक, राजनीतिक और सभ्यतागत प्रभाव शायद और भी अधिक दूरगामी और स्थायी साबित हो सकता है।


व्यक्तिगत स्तर पर दोनों नेताओं में जमीन-आसमान का अंतर है। नेहरू सक्षम और प्रभावशाली परिवार में पैदा हुए, हैरो और कैम्ब्रिज में शिक्षित हुए, स्वतंत्रता आंदोलन के ताप में तपे और उन्होंने करीब नौ साल ब्रिटिश जेलों में बिताए। स्वतंत्र भारत की दहलीज पर महात्मा गांधी ने उन्हें अपना राजनीतिक उत्तराधिकारी चुना।

वहीं, मोदी स्वतंत्र भारत में जन्म लेने वाले पहले प्रधानमंत्री हैं। उनका जन्म आर्थिक रूप से समाज के निचले तबके में हुआ। ऐसे तबके में जिसे कार्ल मार्क्स ने 'प्रोलेटेरियेट' कहा था। वह ऐसे संगठनात्मक परिवेश में तैयार किए गए जो भले ही राष्ट्रवादी विचारधारा का समर्थक था, लेकिन जिसे अधिकतर भारतीय मतदाता अखिल भारतीय मानते ही नहीं थे। उन्होंने अपने तरीके से पहले गुजरात और फिर लुटियंस दिल्ली के अभिजात्य वर्ग की राय के उलट जाकर अपनी राजनीतिक ताकत स्थापित की।

ये दोनों नेता वैचारिक रूप से एक-दूसरे के विपरीत ध्रुवों पर खड़े हैं। फिर भी मोदी और नेहरू के बीच कुछ अप्रत्याशित समानताएं भी हैं।

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सबसे पहली बात, जिस तरह नेहरू ने उस विचार को जन्म दिया जिसे बाद में सुनील खिलनानी ने 'आइडिया ऑफ इंडिया' कहा, उसी तरह मोदी उस नए दौर का प्रतिनिधित्व करते हैं जिसे 'भारत का युग' कहा जा सकता है। अगर नेहरूवादी व्यवस्था भारत को एक आधुनिक, सुधारवादी समाज के रूप में देखती थी और यही भारतीय होने की प्रमुख पहचान बन गई थी, तो मोदी का भारत राष्ट्र की एक वैकल्पिक अवधारणा प्रस्तुत करता है। दृढ़ राष्ट्रवाद से ओतप्रोत, हिंदू सभ्यतागत विरासत को अपनी आत्मा मानने वाला और एक अधिक प्रभावी कल्याणकारी राज्य की भाषा में नई हिंदू पहचान को स्वीकार करने वाला राष्ट्र।

दोनों ने भारत की प्राचीन सभ्यता की ओर देखा, लेकिन बिल्कुल अलग दृष्टिकोण से।

नेहरू ने अपनी पुस्तक 'डिस्कवरी ऑफ इंडिया' में लिखा है कि शुरुआत में उन्होंने अतीत को, 'एक बाहरी आलोचक की तरह देखा, जिसे मौजूदा और अतीत की कई निशानियों से कुछ हद तक असंतोष था।' उन्होंने लिखा, 'मैं भारत तक पश्चिम के रास्ते पहुंचा और उसे वैसे ही देखा जैसा कोई सहानुभूति से भरा पश्चिम का शख्स देख सकता था। मैं उसकी सोच और स्वरूप को बदलकर उसे आधुनिकता का पहनावा पहनाना चाहता था।'

दूसरी ओर मोदी प्राचीन भारत को आधुनिकता का वस्त्र पहनाने की कोशिश नहीं करते बल्कि भारतीय आधुनिकता को ही एक प्राचीन सभ्यतागत निरंतरता का हिस्सा मानकर पुनर्परिभाषित करना चाहते हैं।

अगर नेहरूवादी सोच के मुताबिक नए-नए आजाद हुए मुल्क में आधुनिकता और परंपरा एक-दूसरे के विरोधी ध्रुव थे तो मोदी का दृष्टिकोण इस विचार को उलट देता है।

प्राचीन हिंदू अतीत को गौरवशाली और आधुनिक बताकर मोदी एक गहरी सभ्यतागत परियोजना को आगे बढ़ाते हैं, जिसमें परंपरा को नई भारतीय आधुनिकता के केंद्र में स्थापित किया जाता है।

जैसा कि खुद पीएम मोदी ने 2025 में कहा था कि "आधुनिक राष्ट्रवाद की अवधारणाओं से अलग भारत की अपनी विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान, अपनी चेतना और अपनी आत्मा है। भारत की प्राचीन पांडुलिपियां इस सभ्यतागत यात्रा की निरंतरता को दर्शाती हैं।"

चाहे बख्शाली पांडुलिपि में शून्य की खोज का उल्लेख हो या यशोमित्र की बॉवर पांडुलिपि, चरक संहिता और सुश्रुत संहिता में चिकित्सा विज्ञान की उपलब्धियां, यह ऐसा भारत है जो प्रगति के लिए पश्चिमी मानकों से मान्यता हासिल करना नहीं चाहता बल्कि उसकी जड़ें अपने अतीत में खोजता है। आप भले इससे सहमत हों या न हों मोदी का दौर राष्ट्र के नैतिक पुनर्संयोजन का एक बिल्कुल अलग अध्याय है।

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दूसरी समानता यह है कि नेहरू की तरह पीएम मोदी विचारधारा और आदर्शों के मामले में स्पष्ट और अडिग हैं।

2019 की जीत के बाद मोदी ने कहा था कि, 'उनकी पार्टी की यात्रा दो से दोबारा, इसलिए खास है क्योंकि हम कभी अपने रास्ते से पीछे नहीं हटे, अपने आदर्शों को धूमिल नहीं होने दिया। हम न रुके, न थके और न झुके। हम अपने आदर्शों और संस्कारों को कभी नहीं छोड़ेंगे।'

यह दृढ़ता 1952 के चुनावी अभियान में नेहरू के उस रुख की याद दिलाती है जब उन्होंने अपनी ही पार्टी के रूढ़िवादी नेताओं की आपत्तियों के बावजूद 'सांप्रदायिकता के खिलाफ आर-पार की लड़ाई' का आह्वान किया था। उन्होंने चेतावनी दी थी कि 'सांप्रदायिक ताकतें देश को विनाश और मृत्यु की ओर ले जाएंगी।' उन्होंने उस चुनाव को इसी मुद्दे पर जनमत संग्रह बना दिया था।

इसी तरह मोदी धर्मनिरपेक्षता और उसके राजनीतिक इस्तेमाल के मुद्दे पर भी स्पष्ट रहे हैं। 2019 में उन्होंने कहा था कि, 'पिछले 30 वर्षों में एक ऐसा लेबल चल पड़ा था जिसे ओढ़कर कुछ भी किया जा सकता था। उसे गंगा स्नान की तरह पवित्र माना जाता था। वह लेबल पूरी तरह झूठा था और उसका नाम था सेक्युलरिज्म।' बाद में उन्होंने अपने एनडीए सहयोगियों से कहा कि वोट बैंक की राजनीति ने अल्पसंख्यकों को भय में जीने पर मजबूर किया और इस राजनीति का अंत'सबका साथ, सबका विकास' को 'सबका विश्वास' तक बढ़ाकर करना होगा।

दूसरी ओर देखें तो नेहरू भी अपने मुद्दे पर इतने अडिग थे कि अगस्त 1950 में पीएम रहते हुए ही उन्होंने अपनी ही पार्टी की केंद्रीय कार्यसमिति से इस्तीफा दे दिया था। नेहरू-लियाकत समझौते के विरोध और श्यामा प्रसाद मुखर्जी के इस्तीफे के बाद उन्होंने कांग्रेस के भीतर अपने खुद के नजरिए से 'सांप्रदायिक और प्रतिक्रियावादी शक्ति' समझने वाले तत्वों को चुनौती दी और अंततः पार्टी संगठन पर अपनी पकड़ मजबूत की।

तीसरी समानता यह है कि जिस तरह नेहरू ने 'नियति से साक्षात्कार' और लंबे अंधकार के बाद जागे भारत का सपना पेश किया था, उसी तरह मोदी अपने समर्थकों के सामने अतीत से निर्णायक विच्छेद और 'नए भारत' का दीर्घकालिक सभ्यतागत विजन रखते हैं। विकसित भारत@2047 उसी सोच का विस्तार है।

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मोदी अक्सर कहते हैं कि 'आपको 20वीं सदी की सोच छोड़नी होगी। यह 21वीं सदी है, यह नया भारत है।'

अगर नेहरू के विकास मॉडल का प्रतीक वे बड़े बांध थे जिन्हें उन्होंने 'आधुनिक भारत के मंदिर' कहा था, तो मोदी के भारत का प्रतीक यूपीआई, डिजिटल इंडिया और शौचालय हैं जो सामाजिक उन्नति और विकास को सुनिश्चित करने के नए तरीके बनकर सामने आए हैं।

यह विकास का कठोर मॉडल है, लेकिन वीएस नायपॉल के शब्दों का इस्तेमाल करते हुए कहें तो इसमें 'घायल सभ्यता' के मानसिक और भावनात्मक घावों को भरने का वादा भी शामिल है।

चौथी समानता यह है कि जिस तरह नेहरू अर्थव्यवस्था को गरीबी उन्मूलन और विकास का साधन मानते थे, मोदी भी आर्थिक नीतियों को उसी नजरिए से देखते हैं। उनका यह कहना कि अब भारत में केवल दो जातियां हैं, एक गरीबों की और दूसरी गरीबी दूर करने वालों की, कल्याणकारी राज्य और निजी पूंजी को राष्ट्रीय लक्ष्यों के लिए इस्तेमाल (जिसे बॉम्बे प्लान भी कहा गया) करने वाली नेहरूवादी सोच से बहुत अलग नहीं है।

पांचवीं बात यह है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ जनाक्रोश और 'अच्छे दिन' के वादे के बीच सत्ता में आए मोदी के नेतृत्व में आज भारत का लगभग पांचवां हिस्सा ऐसे मतदाताओं का है जिन्होंने ऐसा भारत देखा ही नहीं है जहां मोदी प्रधानमंत्री न हों। जिस तरह नेहरू एक पीढ़ी के लिए 'चाचा नेहरू' थे उसी तरह मोदी ने भी युवाओं, नई महिला मतदाता शक्ति और जाति, वर्ग, लिंग और भूगोल की सीमाओं से परे जाकर अपना समर्थन और जनाधार बढ़ाया है।

'एग्जाम वॉरियर्स' और नमो ऐप जैसे माध्यमों से युवा मतदाताओं तक उनकी पहुंच को भले ही उदारवादी अभिजात्य वर्ग कमतर आंकता हो, लेकिन यह उनकी राजनीतिक रणनीति का बेहद महत्वपूर्ण पक्ष है। अगर नेहरू गांधी के घोषित उत्तराधिकारी थे तो मोदी ने भी गांधी की विरासत को आत्मसात करने की कोशिश की है। उन्होंने गांधी के भारत छोड़ो आंदोलन की 75वीं वर्षगांठ के साथ राष्ट्रीय नवजागरण अभियान का आह्वान भी किया।

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आखिर में जैसे क्रिकेट इतिहास की सर्वश्रेष्ठ टीमों की तुलना समय काल परिस्थियों को भूलकर करना कई बार बचकाना हो सकता है(जैसे डॉन ब्रैडमैन या सचिन तेंदुलकर), वैसे ही हर नेता का मूल्यांकन उनके अपने दौर की चुनौतियों और उपलब्धियों के आधार पर होना चाहिए। 2014 में जब मोदी राष्ट्रीय राजनीति में उभरे तब किसी भी नेता के लिए अपने दम पर 272 सीटों का बहुमत हासिल करना लगभग असंभव माना जाता था। उनसे पहले तीन दशकों तक कोई ऐसा नहीं कर पाया था। एक दशक से अधिक समय बाद भी मोदी देश के सबसे प्रभावशाली राजनीतिक नेता बने हुए हैं और संभवतः आज उनकी राजनीतिक पूंजी पहले से भी अधिक मजबूत है। यह खुद में इस बात का प्रमाण है कि उन्होंने भारतीय राजनीति की दिशा बदल दी है।

पीएम मोदी ने भारत की राजनीति की व्याकरण-भाषा, उसके ढांचे और स्वभाव को हमेशा के लिए बदल दिया है और अपनी पार्टी को 'नई भाजपा' में तब्दील दिया है। इसका प्रभाव उनके व्यक्तिगत राजनीतिक जीवन से भी आगे तक जा सकता है।

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नेहरू ने स्वतंत्रता संग्राम की नैतिक शक्ति और नए राष्ट्रवाद के सहारे एक ऐसे लोकतांत्रिक राष्ट्र की नींव रखी, जो 1975 में इंदिरा गांधी के आपातकाल लगाने तक लोकतांत्रिक बनी रही। भले ही शुरुआती वर्षों में वह व्यवहारिक रूप से एक-दलीय व्यवस्था वाली ही क्यों न रही हो।

दूसरी ओर मोदी की 'नई भाजपा' ऐसे दौर में उभरी है जब भारतीय मतदाता कहीं अधिक व्यापक, जागरूक है। उसने सोशल मीडिया और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की निगरानी वाले युग में खुद को स्थापित किया है। इस चुनावी शक्ति ने हमारी भारतीय राजनीति को पहले ही बदल कर नया रूप दे दिया है। लेकिन यह भी संभव है कि पीएम मोदी द्वारा शुरू किए गए 'भारत के युग' के सामाजिक और सांस्कृतिक प्रेरक तत्व भारत की सभ्यतागत संरचना को उससे भी कहीं अधिक गहराई से बदल रहे हों।

(नलिन मेहता मनीकंट्रोल के मैनेजिंग एडिटर और नेटवर्क18 में चीफ एआई ऑफिसर-एडिटोरियल ऑपरेशंस हैं। नलिन 'द न्यू बीजेपी: मोदी एंड द मेकिंग ऑफ द वर्ल्ड्स लार्जेस्ट पॉलिटिकल पार्टी' किताब के लेखक हैं।)

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