अमेरिका-ईरान डील का भारत को बंपर फायदा! समंदर में फंसे 34 जहाजों की वापसी का रास्ता साफ, खत्म होगी पेट्रोल-डीजल की टेंशन
US Iran Deal-India: 'दिशा' के इस सुरक्षित सफर ने फारस की खाड़ी में फंसे भारत के अन्य 34 जहाजों के लिए भी सुरक्षित वापसी की एक बड़ी उम्मीद जगा दी है। जानिए भारत के कौन से जहाज वहां फंसे है और क्या इस डील के बाद देश में पेट्रोल-डीजल, खाद और LPG गैस की किल्लत पूरी तरह खत्म हो जाएगी?
होर्मुज को पार करते हुए भारत का पहला मर्चेंट जहाज 'दिशा' सोमवार को सुरक्षित बाहर निकल आया है
Strait of Hormuz India Shipping Update: अमेरिका और ईरान के बीच हुए ऐतिहासिक शांति समझौते का असर अब समंदर में दिखने लगा है। अब भारत के लिए मिडिल ईस्ट से एक बड़ी राहत भरी खबर सामने आई है। युद्ध के ऐलान के बाद पिछले लगभग दो महीनों से ठप पड़े दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री रूट 'स्ट्रेट ऑफ होर्मुज' को पार करते हुए भारत का पहला मर्चेंट जहाज 'दिशा' सोमवार को सुरक्षित बाहर निकल आया है।
सरकारी कंपनी शिपिंग कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया (SCI) द्वारा संचालित यह एलएनजी (LNG) टैंकर कतर से भारत के लिए गैस लेकर आ रहा है। 'दिशा' के इस सुरक्षित सफर ने फारस की खाड़ी में फंसे भारत के अन्य 34 जहाजों के लिए भी सुरक्षित वापसी की एक बड़ी उम्मीद जगा दी है। आइए आपको बताते हैं कि भारत के कौन से जहाज वहां फंसे थे और क्या इस डील के बाद देश में पेट्रोल-डीजल, खाद और LPG गैस की किल्लत पूरी तरह खत्म हो जाएगी?
18 जून को भारत पहुंचेगा 'दिशा', 34 अन्य जहाजों को मिला हौसला
शिपिंग मिनिस्ट्री के डायरेक्टर ओपेश कुमार शर्मा ने इस बड़ी कामयाबी की पुष्टि करते हुए बताया, 'एलएनजी कैरियर 'दिशा' अपने साथ 62370 टन LNG कार्गो लेकर आ रहा है'। यह जहाज 18 जून को गुजरात के दाहेज (Dahej) पोर्ट पर एंट्री कर सकता है।
'द टाइम्स ऑफ इंडिया' की रिपोर्ट के मुताबिक, दिशा के सुरक्षित निकलने से खाड़ी में फंसे अन्य 34 भारतीय और विदेशी झंडे वाले जहाजों को भारतीय बंदरगाहों तक सुरक्षित लाने का रास्ता साफ हो गया है।
खाड़ी में फंसे हैं खेती के लिए जरूरी 'खाद' से लदे 16 जहाज
गैस और तेल के अलावा भारत के लिए सबसे बड़ी चिंता खेती से जुड़े जरूरी पोषक तत्वों को लेकर थी। उर्वरक विभाग की संयुक्त सचिव वंदना प्रेयशी ने बताया कि स्ट्रेट ऑफ होर्मुजमें फंसे 16 बेहद महत्वपूर्ण जहाजों में भारत की खेती की जान बसी है:
8 जहाज यूरिया से लदे हैं।
4 जहाज डीएपी लेकर आ रहे हैं।
3 जहाज सल्फर और 1 जहाज अमोनिया से लोड है।
नीति निर्माताओं का मानना है कि अगर खाद से लदे ये 16 जहाज जल्द ही होर्मुज को पार कर भारत आ जाते हैं, तो देश में मिट्टी के पोषक तत्वों और खाद की सप्लाई में आ रही बड़ी किल्लत तुरंत दूर हो जाएगी।
तो क्या भारत में अब तुरंत दूर हो जाएगा एनर्जी संकट?
भले ही समुद्री रास्ता खुल गया है और जहाजों की आवाजाही शुरू हो गई है, लेकिन भारतीय उपभोक्ताओं को पेट्रोल, डीजल और एलपीजी गैस की सप्लाई में तत्काल बड़ी राहत मिलने में थोड़ा समय लग सकता है। इसके पीछे दो बड़े कारण हैं:
कतर के 'रास लफ्फान' प्लांट को भारी नुकसान: युद्ध के दौरान कतर के रास लफ्फान (Ras Laffan) गैस फैसिलिटी को भारी नुकसान पहुंचा है। कतरएनर्जी के इस सरकारी कॉम्प्लेक्स की दो एलएनजी प्रोसेसिंग ट्रेनें क्षतिग्रस्त हो गई हैं, जिससे इसकी क्षमता करीब 17% घट गई है। भारत का कतर के साथ लॉन्ग-टर्म गैस सप्लाई एग्रीमेंट है, इसलिए वहां हुआ नुकसान भारत को प्रभावित कर रहा है।
यूएई का हबशान गैस प्लांट भी प्रभावित: संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के हबशान गैस प्लांट को भी युद्ध में नुकसान पहुंचा था। हालांकि, इसकी 60% क्षमता बहाल कर ली गई है। साल 2026 के अंत तक इसे 80% और 2027 तक पूरी तरह ठीक करने का लक्ष्य है।
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर कितनी निर्भर है भारत की रसोई और गाड़ियां?
यह युद्ध भारत के लिए कितना खतरनाक था, इसे इन आंकड़ों से समझा जा सकता है:
क्रूड ऑयल: युद्ध से पहले भारत अपनी जरूरत का 88% से ज्यादा कच्चा तेल आयात करता था, जिसमें से आधा हिस्सा अकेले पश्चिम एशिया से आता था।
LNG गैस: भारत जो एलएनजी आयात करता है, उसका 60% से ज्यादा हिस्सा इसी 'स्ट्रेट ऑफ होर्मुज' के संकरे रास्ते से होकर गुजरता है।
LPG यानी रसोई गैस: भारत के कुल एलपीजी आयात का 60% पश्चिम एशिया से आता है और उसका भी 90% हिस्सा इसी रणनीतिक जलमार्ग से होकर भारत पहुंचता है।