तमिलनाडु में अभिनेता से नेता बने विजय के सरकार बनाने की राह का आखिरी बड़ा अड़ंगा शनिवार को खत्म हो गया। VCK (विदुथलाई चिरुथैगल काची) ने टीवीके को बिना किसी शर्त समर्थन देने का ऐलान कर दिया। वीसीके के पास 2 विधायक हैं और उनके समर्थन के बाद विजय अब सरकार बनाने के लिए जरूरी संख्या के करीब पहुंच गए हैं।
दरअसल तमिलनाडु में सरकार बनाने के लिए 118 विधायकों का समर्थन जरूरी होता है। लेकिन पिछले तीन दिनों में राज्यपाल से हुई तीन मुलाकातों में भी विजय यह साबित नहीं कर पाए थे कि उनके पास बहुमत का आंकड़ा है।
वीसीके और आईयूएमएल के समर्थन के बाद अब Vijay के पास कुल 120 विधायकों का समर्थन हो गया है। इसके साथ ही तमिलनाडु में सरकार बनाने का रास्ता लगभग साफ हो गया है।
दो साल पुरानी विजय की पार्टी टीवीके ने इस चुनाव में बड़ा उलटफेर करते हुए DMK और एआईएडीएमके जैसी बड़ी द्रविड़ पार्टियों को पीछे छोड़ दिया और 108 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी। हालांकि विजय ने दो सीटों से चुनाव जीता है, इसलिए एक सीट छोड़ने के बाद टीवीके की असली ताकत 107 विधायकों की मानी जाएगी।
सरकार बनाने के लिए 118 विधायकों का समर्थन जरूरी था। अब टीवीके को कांग्रेस, लेफ्ट, वीसीके और आईयूएमएल का साथ मिल गया है।
कांग्रेस सबसे पहले टीवीके के समर्थन में आई थी। कांग्रेस ने इस चुनाव के बाद डीएमके से अपना दो दशक पुराना गठबंधन तोड़ दिया था। शुक्रवार को लेफ्ट पार्टियों ने भी समर्थन दे दिया।
हालांकि शुक्रवार रात तक सस्पेंस बना रहा क्योंकि वीसीके का समर्थन पत्र राज्यपाल तक नहीं पहुंचा था। खबरों के मुताबिक वीसीके प्रमुख थोल थिरुमावलवन नाराज थे, क्योंकि विजय ने उनसे सीधे मिलने की बजाय व्हाट्सऐप मैसेज के जरिए समर्थन मांगा था।
IUML ने भी शुरुआत में कहा था कि वह डीएमके के साथ है। लेकिन शनिवार सुबह टीवीके नेताओं ने वीसीके और आईयूएमएल नेताओं से मुलाकात की, जिसके बाद दोनों पार्टियों ने समर्थन देने का फैसला किया।
वीसीके ने बिना शर्त समर्थन दिया है, लेकिन पार्टी नेता वन्नी अरासु ने कहा कि सरकार में शामिल होने पर फैसला बाद में होगा। उन्होंने यह भी कहा कि वीसीके चाहती है कि विजय जिस सीट को छोड़ेंगे, वहां से थोल तिरुमावलवन चुनाव लड़ें और बाद में उपमुख्यमंत्री बनें।
सरकार बनाने के लिए विजय को पिछले तीन दिनों में लगातार तीन बार राज्यपाल Rajendra Vishwanath Arlekar से मिलना पड़ा। लेकिन हर बार बहुमत का आंकड़ा पूरा न होने की वजह से उन्हें इंतजार करना पड़ा।
इस बीच विपक्ष ने राज्यपाल पर भी सवाल उठाए और आरोप लगाया कि भाजपा के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार के दबाव में प्रक्रिया को धीमा किया जा रहा है। हालांकि राजभवन ने इन आरोपों से इनकार किया।
कई संवैधानिक विशेषज्ञों का कहना था कि राज्यपाल की संवैधानिक जिम्मेदारी थी कि सबसे बड़ी पार्टी होने के नाते पहले विजय को सरकार बनाने का मौका दिया जाए।