क्या भारत में भी ऑस्ट्रेलिया की तरह बच्चों के लिए बैन होगा सोशल मीडिया?
आर्थिक सर्वे 2026 पेश होने के बाद से ये सवाल भी उठने लगा है कि क्या भारत में भी ऑस्ट्रेलिया जैसी पाबंदी लागू हो सकती है? बता दें कि ऑस्ट्रेलिया ने 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया ऐप्स पर प्रतिबंध लगाया है। ऐसे में आर्थिक सर्वे के संकेतों को देखते हुए यह चर्चा तेज हो गई है कि आगे क्या कदम उठाए जा सकते हैं
क्या भारत भी ऑस्ट्रेलिया की तरह बच्चों के लिए सोशल मीडिया किया जाएगा बैन (IMAGE- AI)
गुरुवार (29 जनवरी) को आर्थिक सर्वे 2025-26 संसद में पेश किया गया। इसमें भारत की आर्थिक प्रगति के साथ-साथ उन चुनौतियों का भी जिक्र किया गया, जो देश के एक बड़े आर्थिक महाशक्ति बनने के रास्ते में आ सकती हैं। हालांकि, इस बार आर्थिक सर्वे में एक अहम और चिंताजनक मुद्दे पर भी ध्यान दिलाया गया। रिपोर्ट में डिजिटल लत और स्क्रीन से जुड़ी मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं को लेकर चेतावनी दी गई है, खासतौर पर बच्चों और किशोरों के बीच।
आर्थिक सर्वे ने डिजिटल लत को गंभीर चिंता बताया है। इसमें कहा गया है कि मोबाइल फोन, सोशल मीडिया, ऑनलाइन गेमिंग और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स का जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल अब लोगों की सेहत, पढ़ाई के नतीजों और भविष्य की फाइनेंशियल प्रोडक्शन पर साफ असर डालने लगा है।
आर्थिक सर्वे ने सिर्फ डिजिटल लत के खतरों की ओर इशारा ही नहीं किया, बल्कि सरकार से यह भी कहा कि बच्चों के लिए सोशल मीडिया इस्तेमाल पर उम्र के हिसाब से सीमाएं तय की जाएं और उन पर केंद्रित डिजिटल विज्ञापनों को नियंत्रित किया जाए।
इससे यह सवाल भी उठने लगा है कि क्या भारत में भी ऑस्ट्रेलिया जैसी पाबंदी लागू हो सकती है? बता दें कि ऑस्ट्रेलिया ने 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया ऐप्स पर प्रतिबंध लगाया है। ऐसे में आर्थिक सर्वे के संकेतों को देखते हुए यह चर्चा तेज हो गई है कि आगे क्या कदम उठाए जा सकते हैं।
आर्थिक सर्वे और डिजिटल लत
गुरुवार को संसद में पेश रिपोर्ट में कहा गया है, “जिस तरह अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड (UPF) का बढ़ता सेवन और मोटापा यह दिखाता है कि आधुनिक जीवनशैली सेहत को कैसे प्रभावित कर रही है, उसी तरह डिजिटल लत का बढ़ना आज के समाज में एक गंभीर व्यवहारिक खतरे को उजागर करता है।”
रिपोर्ट में आगे कहा गया कि जहां मोटापा और कुपोषण युवाओं की शारीरिक सेहत को नुकसान पहुंचाते हैं, वहीं डिजिटल लत बच्चों और किशोरों के मानसिक, बौद्धिक और सामाजिक विकास को कमजोर करती है।
आर्थिक सर्वे के अनुसार, स्मार्टफोन और डिजिटल डिवाइस का जरूरत से ज्यादा और लगातार इस्तेमाल आर्थिक व सामाजिक नुकसान भी पहुंचाता है। इसमें पढ़ाई के घंटे कम होना, काम की प्रोडक्टिविटी में गिरावट, स्वास्थ्य सेवाओं पर बढ़ता बोझ, और ऑनलाइन जोखिम भरे व्यवहार से होने वाले वित्तीय नुकसान जैसी समस्याएं शामिल हैं।
कुल मिलाकर, रिपोर्ट साफ संकेत देती है कि डिजिटल लत अब सिर्फ व्यक्तिगत समस्या नहीं रही, बल्कि यह समाज और अर्थव्यवस्था के लिए भी एक बड़ी चुनौती बनती जा रही है।
आर्थिक सर्वे में आगे डिजिटल लत के खतरों को और विस्तार से बताया गया है। रिपोर्ट के अनुसार, डिजिटल लत का पढ़ाई और कामकाज पर नकारात्मक असर पड़ता है। मोबाइल और स्क्रीन के ज्यादा इस्तेमाल से ध्यान भटकता है, नींद पूरी नहीं हो पाती (‘स्लीप डेट’) और एकाग्रता कम हो जाती है, जिससे शैक्षणिक प्रदर्शन और प्रोडक्टिविटी प्रभावित होती है।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि डिजिटल लत से सामाजिक रिश्ते कमजोर होते हैं। दोस्तों से जुड़ाव कम होता है, समुदाय में भागीदारी घटती है और लोगों की ऑफलाइन सामाजिक व व्यवहारिक स्किल्स धीरे-धीरे कम होने लगती हैं।
आर्थिक नुकसान की बात करें, तो ऑनलाइन खरीदारी, गेमिंग और साइबर फ्रॉड से होने वाले सीधे नुकसान के अलावा, डिजिटल लत से रोजगार पाने की क्षमता, काम करने की दक्षता और जीवनभर की कमाई भी प्रभावित हो सकती है।
रिपोर्ट के मुताबिक, डिजिटल डिवाइस का जरूरत से ज्यादा और जबरन इस्तेमाल चिंता, तनाव, डिप्रेशन और नींद की समस्याओं से जुड़ा है। खासतौर पर छात्रों में, जहां पढ़ाई का दबाव, साइबर बुलिंग और हाई-स्टिमुलस प्लेटफॉर्म्स का असर ज्यादा देखा जाता है।
अध्ययनों का हवाला देते हुए आर्थिक सर्वेक्षण ने बताया कि युवाओं में डिजिटल लत के गंभीर स्वास्थ्य प्रभाव सामने आ रहे हैं। रिपोर्ट के अनुसार, सोशल मीडिया की लत का सीधा संबंध चिंता, डिप्रेशन, कम आत्मविश्वास, और साइबर बुलिंग से होने वाले मानसिक तनाव से पाया गया है।