उत्तर प्रदेश का सबसे बड़ा जिला लखीमपुर खीरी केवल अपनी घनी तराई और बाघों की दहाड़ के लिए ही नहीं पहचाना जाता, बल्कि यहां की थाली में परोसा जाने वाला प्रेम और शुद्धता भी इसे खास बनाती है। जहां बुंदेलखंड में दाल-बाफला का बोलबाला है, वहीं नेपाल की सरहदों से सटे खीरी के इलाकों में खेती की प्रधानता यहां के खान-पान में साफ झलकती है। यहां गन्ने के साथ-साथ केले की पैदावार प्रचुर मात्रा में होती है, यही कारण है कि 'कच्चे केले' से बने व्यंजन यहां के हर शुभ अवसर और दैनिक भोजन का अभिन्न हिस्सा हैं।
यहां की रसोई में कच्चे केले का उपयोग केवल सब्जी के रूप में नहीं, बल्कि एक 'शाही डिश' के तौर पर किया जाता है। लखीमपुर के स्थानीय घरों में बनने वाले 'कच्चे केले के कोफ्ते' अपनी बनावट में इतने रेशमी होते हैं कि मुंह में जाते ही घुल जाते हैं। इसकी खासियत यह है कि इसमें मसालों का उपयोग बहुत ही संतुलित तरीके से किया जाता है, ताकि केले का प्राकृतिक कसैलापन दूर हो जाए और मसालों की खुशबू हावी न हो।
कैसे तैयार होता है यह जादुई स्वाद?
खीरी के अंदाज में कोफ्ते बनाने की प्रक्रिया धैर्य और बारीकी का काम है:
* कोफ्तों का निर्माण: सबसे पहले ताजे कच्चे केलों को हल्का उबाला जाता है। फिर इन्हें मैश करके इसमें भुना हुआ बेसन, बारीक कटी हरी मिर्च, अदरक और अजवाइन मिलाई जाती है। यहां के लोग इसमें एक चुटकी 'हींग' जरूर डालते हैं, जो हाजमे और खुशबू दोनों के लिए अनिवार्य है। इसके छोटे-छोटे गोल कोफ्ते बनाकर सरसों के तेल में सुनहरे होने तक तले जाते हैं।
* तराई वाली रसेदार ग्रेवी: इसकी ग्रेवी (तरी) को बनाने के लिए ताजे पिसे प्याज, अदरक और लहसुन के पेस्ट को धीमी आंच पर तब तक भूना जाता है जब तक कि मसाला किनारों से तेल न छोड़ दे। तराई क्षेत्र में टमाटर और दही का इस्तेमाल ग्रेवी को एक खास 'खटास और गाढ़ापन' देने के लिए किया जाता है।
स्वाद को मुकम्मल बनाती अन्य चीजें
लखीमपुर खीरी में केले के कोफ्तों को अकेले नहीं परोसा जाता। इसके साथ 'बासमती चावल' (जो पास के ही पीलीभीत और खीरी के खेतों से आता है) या 'अजवाइन वाली पूड़ियां' परोसी जाती हैं। साथ में गन्ने के सिरके वाला प्याज और पुदीने की चटनी इस भोजन को पूर्णता प्रदान करती है।
आधुनिकता के बीच परंपरा का मेल
आज के समय में जहाँ फास्ट फूड ने हर जगह अपनी जगह बना ली है, लखीमपुर खीरी के ग्रामीण इलाकों और कस्बों में आज भी पारंपरिक तरीके से चूल्हे पर बनाई गई केले की सब्जी और कोफ्ते अपनी पहचान बनाए हुए हैं। स्थानीय मेलों और दावतों में यह डिश आज भी उतनी ही लोकप्रिय है जितनी दशकों पहले थी।
प्रो टिप: लखीमपुर के स्वाद का असली मजा लेना है, तो भोजन के बाद यहां का मशहूर 'लौंगालता' (एक पारंपरिक मिठाई) खाना न भूलें, जो इस जायके के सफर को एक मीठा अंत देता है।