राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को सत्ता में अपनी वापसी का भरोसा है। अगर वह जीत जाते हैं तो चौथी बार राज्य के मुख्यमंत्री बनेंगे। पहली बार 1993 में राज्य के शासन की बागडोर अपने हाथ में लेने वाले गहलोत को राजस्थान मुख्यमंत्री की कुर्सी से इतनी मोहब्बत है कि वह कांग्रेस में बड़ी भूमिका तक को खारिज कर चुके हैं। पिछले साल कांग्रेस अध्यक्ष के चुनाव से पहले पूर्व पार्टी अध्यक्ष की इच्छा पार्टी की बागडोर गहलोत को सौंपने की थी। लेकिन, गहलोत ने पार्टी अध्यक्ष का चुनाव लड़ने का प्रस्ताव ही खारिज कर दिया। तब मायूस सोनिया को मल्लिकार्जुन खड़गे को पार्टी अध्यक्ष पद का उम्मीदवार बनाने का फैसला करना पड़ा।
सवाल है कि आखिर राजस्थान की मुख्यमंत्री की कुर्सी से इतनी मोहब्बत का राज क्या है? इस सवाल का जवाब देना मुश्किल है। लेकिन, राज्य की जनता को गहलोत से कितना मोहब्बत है, इसका पता 3 दिसंबर को चल जाएगा। राज्स्थान में 25 नवंबर को विधानसभी की सभी 200 सीटों पर वोटिंग होगी। वोटों गी गिनती 3 दिसंबर को होगी।
गहलोत ने 16 अक्टूबर को कहा कि राज्य की जनता कांग्रेस को फिर से सत्ता में लाने को तैयार हैं। उन्होंने कहा कि इसकी वजह यह है कि लोग अच्छा शासन चाहते हैं। उन्होंने कहा कि उन्हें मौजूदा कार्यकाल में कोरोना की महामारी जैसी बड़ी चुनौती का सामना करना पड़ा। उनकी सरकार को गिराने की कई बार कोशिश हुई। लेकिन, उन पर किसी तरह का असर नहीं पड़ा। उन्होंने राज्य की जनता को अच्छा शासन दिया। उन्होंने अपनी सरकार को गिराने का आरोप भाजपा पर लगाया। उनका इशारा 2020 में सचिन पायलट की बगावत की तरफ था। उनका कहना है कि पायलट को बगावत करने के लिए भाजपा ने ही मनाया था।
राजस्थान के मुख्यमंत्री अब तक सचिन पायलट की बगावत को भूल नहीं पाए हैं। राजनीतिक पंडितों का कहना है कि पायलट का विद्रोह इतना मुखर था कि उसे याद कर आज भी गहलोत की रात की नींद उड़ जाती है। राजस्थान की राजनीति का दो दशक से ज्यादा अनुभव रखने वाले एक व्यक्ति ने बताया कि गहलोत को सीएम की कुर्सी इतनी प्यारी है कि भाजपा तो दूर वह कांग्रेस तक के किसी नेता को इसके करीब फटकना नहीं देना चाहते हैं।
सचिन पायलट के हाथों में जाने से इस कुर्सी को बचाए रखने में उन्हें कितनी जुगत लगानी पड़ी है, राज्य की जनता भलीभाती जानती है। राजनीति के कुछ जानकारों का तो यहां तक कहना है कि जब तक पायलट का मन खुद इस कुर्सी से नहीं भर जाता, इसके सचिन पायल के पास जाने का सवाल नहीं नहीं उठता। बात जब सीएम की कुर्सी की हो तो पायलट किसी की नहीं सुनते हैं। इसमें सोनिया और राहुल गांधी भी शामिल हैं।