Budget 2022: किसी भी अर्थव्यवस्था में धन जुटाने के लिए बजट बनाया जाता है। बजट के जरिए हर जगह कितने पैसे खर्च किए जाएंगे, इसका जिक्र किया जाता है। ताकि वित्तीय हालत बेहतर तरीके से चलाई जा सके।
Budget 2022: किसी भी अर्थव्यवस्था में धन जुटाने के लिए बजट बनाया जाता है। बजट के जरिए हर जगह कितने पैसे खर्च किए जाएंगे, इसका जिक्र किया जाता है। ताकि वित्तीय हालत बेहतर तरीके से चलाई जा सके।
सरकार के एक साल की पूरी आय और खर्च के लेखा-जोखा को बजट कहते हैं। सरकार के समस्त वितीय संसाधनों को सार्वजनिक वित्त कहते हैं। सार्वजनिक वित्त के तहत केन्द्र सरकार की समस्त आय और व्यय के मदों को सम्मिलित किया जाता है। इसी सार्वजनिक वित्त के बजटीय प्रबंधन क्रो सार्वजनिक बजट यानी आम बजट कहते हैं।
यानी जिस तरह आप हर महीने अपने घर के लिए बजट बनाते हैं कि कितनी आमदनी होगी, कितने पैसे खर्च होंगे और अंत में कितनी बचत होगी? ठीक उसी तरह केंद्र और राज्य की सरकारें भी देश और राज्य की आमदनी और खर्च का हिसाब-किताब रखने के लिए बजट बनाते हैं।
भारतीय संविधान के आर्टिकल 112 में बजट निर्माण के विषय में बताया गया है। लोकसभा में केंद्र सरकार के वित्तमंत्री के द्वारा बजट पेश किया जाता है, इस बजट को केंद्रीय बजट के नाम से जाना जाता है| राज्य सरकार में बजट राज्य वित्त मंत्री के द्वारा पेश किया जाता है, यह केवल उसी राज्य के लिए निर्धारित किया जाता है।
आम बजट को कई श्रेणियों में बांटा जाता है। लेकिन खास तौर से 3 तरह का कहोता है। संतुलित बजट (Balanced Budget), सरप्लस बजट (Surplus Budget) और डेफिसिट बजट (Deficit Budget), ये तीन का होता है। इसे हम और कई श्रेणियों में बांट सकते हैं। जैसे अंतरिम बजट (Interim Budget) और पूर्ण बजट (Full Budget) में भी इसे विभाजित कर सकते हैं।
संतुलित बजट
यह एक आदर्श बजट है, जिसे व्यवहार में लाना अत्यंत कठिन है, सन्तुलित बजट में विभिन्न क्षेत्रों का समान अनुपात में आबंटन किया जाता है तथा इसमें व्यय एवं प्राप्ति का अन्तराल सीमित होता है, जिसके परिणामस्वरूप बजट के अनुमानित घाटे एवं वास्तविक घाटे में भी अन्तर नहीं होता है।
मतलब जब किसी एक वित्त वर्ष में सरकार की कुल अनुमानित आमदनी और कुल अनुमानित खर्च के आंकड़े बराबर होते हैं तो उसे संतुलित या बैलेंस्ड बजट कहते हैं। लेकिन इस तरह का बजट आर्थिक मंदी के समय में कारगर साबित नहीं होता है। इससे बेरोजगारी और इकोनॉमिक ग्रोथ की समस्या नहीं सुलझ पाती है। साथ ही कल्याणकारी योजनाओं पर सरकार अधिक खर्च नहीं कर पाती है।
सरप्लस बजट
किसी एक वित्त वर्ष में अगर सरकार की आमदनी उसके खर्च से अधिक होती है तो उसे सरप्लस बजट कहते हैं। इसका मतलब यह होता है कि सरकार को टैक्स और इंटरेस्ट आदि से जितनी राशि प्राप्त होती है, सरकार लोगों पर उससे कम खर्च करती है। यानी सरकार जनकल्याण के काम पर जितनी रकम खर्च करेगी, उससे अधिक रकम टैक्स से जुटा लेगी। इस तरह का बजट महंगाई नियंत्रित करने के लिए बनाया जाता है और इससे प्रोडक्ट्स के डिमांड को घटाने में मदद मिलती है। सरप्लस बजट देश की आर्थिक संपन्नता को दर्शाता है।
डेफिसिट बजट
अगर सरकार का अनुमानित खर्च उसकी कमाई से अधिक रहता है तो इसे डेफिसिट बजट कहा जाता है। इसका मतलब यह है कि सरकार की टैक्स और अन्य स्रोतों से जितनी आमदनी होगी, सरकार कल्याणकारी योजनाओं पर उससे अधिक खर्च करने की तैयारी कर रही है। भारत जैसे विकासशील देश में इस तरह का बजट ग्रोथ को बढ़ाने में मददगार साबित होता है। डेफिसिट बजट से मांग बढ़ाने और आर्थिक विकास में तेजी लाने में मदद मिलती है। लेकिन इसमें सरकार वित्तीय संस्थाओं और वर्ल्ड बैंक और आईएमएफ जैसे वैश्विक संगठनों के उधार लेकर अपने खर्च को पूरा करती है। लेकिन इसका नुकसान यह है कि उधारी की वजह से सरकार पर आर्थिक बोझ बढ़ जाता है।
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