भुवन भास्कर

भुवन भास्कर
नेशनल स्टैटिस्टिकल ऑफिस (NSO) का अनुमान है कि 2021-22 के दौरान भारत की अर्थव्यवस्था 9.2% की दर से दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था बन जाएगी। यह देश के लिए अच्छी खबर है, इसके बावजूद कि इस साल की ग्रोथ रेट पिछले साल के अभूतपूर्व 7.3% की नकारात्मक दर के बेस पर आ रही है। इतनी जल्दी ग्रोथ की वापसी दरअसल डॉ. मनमोहन सिंह, कौशिक बसु और रघुराम राजन जैसे ग्लोबल अर्थशास्त्रियों की भविष्यवाणियों के बावजूद हुई है, जिसमें उन्होंने वर्षों तक अर्थव्यवस्था के सुस्त रहने की बात कही थी।
बहरहाल NSO के ये आंकड़े उस समय आए हैं, जब वित्त मंत्री निर्मला सीतारमन अगले वित्त वर्ष के लिए बजट पेश करने की तैयारियों को मुकम्मल करने में लगी हैं। जीडीपी के आंकड़ों के साथ NSO ने यह भी बताया है कि 9.2% की वृद्धि के साथ मार्च 2021 के आखिर में भारत का जीडीपी 2019-20 के जीडीपी के मुकाबले 17% बढ़ जाएगा जो 14% के बजट अनुमान से कहीं ज्यादा है।
हालांकि आंकड़े यह भी दिखा रहे हैं कि सर्विस सेक्टर में उपभोक्ता चिंतित हैं और उनका भरोसा डिगा हुआ है। जाहिर है कोरोना की तीसरी लहर ने अर्थव्यवस्था के सुधार पर अपना असर दिखाना शुरू कर दिया है। इस पृष्ठभूमि में वित्त मंत्री सीतारमन के सामने बजट के लक्ष्य और चुनौतियां और ज्यादा स्पष्ट हो गए हैं।
रिजर्व बैंक ने पूरे साल का ग्रोथ 9.5% प्रोजेक्ट किया था, जिसका मतलब यह है कि यदि कोरोना की तीसरी लहर की भयावहता बढ़ती है, तो जीडीपी ग्रोथ की दर 9.2% से भी नीचे जा सकती है। ऐसे में 1 फरवरी को पेश होने वाला 2022-23 का आम बजट बहुत महत्वपूर्ण हो गया है, क्योंकि इसने सरकार को ठीक उसी वक्त जोखिम को पहचानने और उससे निपटने के लिए अपने को तैयार करने का एक ऐसा मौका दे दिया है, जब यह जोखिम अपने पूरे जोरों पर होगा।
जीडीपी या आम भाषा में कहें तो अर्थव्यवस्था को मोटे तौर पर तीन सेक्टरों में बांटा जा सकता है-सर्विस सेक्टर, इंडस्ट्रियल सेक्टर और एग्रीकल्चर सेक्टर। वित्त वर्ष 2020-21 के मूल्य आधार पर सर्विस सेक्टर या सेवा क्षेत्र का ग्रॉस वैल्यू एडेड (GVA) 96.54 लाख करोड़ रुपये था, जो कि देश के 179.15 लाख करोड़ रुपये GVA का 54% है, जबकि औद्योगिक क्षेत्र इसमें 26% हिस्सा रखता है।
कृषि क्षेत्र की भागीदारी 20% है। यदि 2019-20 का अनुभव देखें, जब कोरोना के कारण आर्थिक गतिविधियां और पर्यटन लगभग ठप पड़ गए थे, तब भी कृषि क्षेत्र ने अपने औसत से बेहतर प्रदर्शन किया था। रही बात सेवा क्षेत्र की, जिसका एक बड़ा हिस्सा पर्यटन से जुड़ा है, तो वहां कोरोना की पृष्ठभूमि में सरकार की भूमिका सीमित ही है।
जब हालात ठीक होंगे, तब यहां हालात सुधरेंगे और कितना सुधरेंगे यह इस बात पर निर्भर करेगा कि उपभोक्ताओं की आमदनी कितनी बढ़ती है और उनका भरोसा कितना बढ़ता है। तीसरा सेक्टर, यानी उद्योगों की ग्रोथ सुनिश्चित करने के लिए भी वित्त मंत्री को आखिर में उपभोक्ताओं को ही सशक्त करने की जरूरत है। कैसे? आइए समझते हैं।
1991 में नरसिंह राव सरकार की ओर से शुरू किए गए ऐतिहासिक आर्थिक सुधारों के बाद ढाई दशकों तक औद्योगिक सुधारों के दूसरे दौर का इंतजार होता रहा। आखिर में नरेंद्र मोदी सरकार ने पिछले 5 वर्षों में इस दिशा में कई महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। औद्योगिक सुधार 2.0 का एक बड़ा हिस्सा GST के रूप में पहले ही लागू हो चुका है। दूसरा हिस्सा, श्रम सुधार के अगले वित्त वर्ष से लागू होने की पूरी संभावना है। श्रम सुधारों को लागू होने के लिए सिर्फ आखिरी कानून औपचारिकता यानी अधिसूचना जारी होना बचा हुआ है।
सरकार ने 2021 में ही अप्रैल से इसे लागू करने की योजना बनाई थी, लेकिन क्योंकि यह विषय संविधान की समवर्ती सूची में है, तो राज्यों को भी इस कानून के लिए अधिसूचना जारी करनी होगी। केंद्र चाहता है कि सभी राज्य एक साथ इसे जारी करें ताकि पूरे देश में यह एक साथ लागू हो सके। इसीलिए चालू साल में यह लागू नहीं हो सका है, लेकिन सरकार के सूत्र बता रहे हैं कि लगभग सभी राज्य अब कानून के मसौदे और अधिसूचना तैयार कर चुके हैं। इसलिए यह अहम सुधार अप्रैल 2022 से लागू हो जाएंगे, ऐसा लगता है। यह अपने आप में उद्योग जगत के लिए एक महत्वपूर्ण ग्रोथ ट्रिगर होगा।
लेकिन श्रम सुधारों का अन्य प्रभाव उपभोक्ताओं पर यह होगा कि उनकी टेक-होम सैलरी कम हो जाएगी। पहले से डांवाडोल आत्मविश्वास के साथ हाथ में आने वाली कम सैलरी उपभोक्ताओं के बटुए को और कसेगी और पहले से ही खपत के मोर्चे पर सख्त माहौल और बिगड़ेगा। यह उद्योगों के लिए अच्छी खबर नहीं है। ऐसे में वित्त मंत्री को इनकम टैक्स में कुछ राहत देने का विचार करना चाहिए। पिछले कुछ वर्षों से आम सैलरी भोगी करदाता को मोदी सरकार की ओर से कोई खास राहत नहीं मिली है। सरकार ने प्रत्यक्ष कर ढांचे को सिर्फ और सिर्फ जटिल बनाया है।
यहां तक कि बहुप्रतीक्षित डायरेक्ट टैक्स कोड (DTC) में भी सरकार ने ओल्ड रिजीम और न्यू रिजीम का खेल कर उसमें करदाताओं को और उलझाया ही है। ऐसे समय में जब अप्रत्यक्ष कराधान (GST) से सरकार की आय में अनपेक्षित वृद्धि दिख रही है और पेट्रोल-डीजल पर लगाए टैक्स से भी उसे विंडफॉल मुनाफा हुआ है, यह सही समय है जब आयकर दाताओं को कुछ ठोस छूट दिया जाए।
उद्योग जगत को निजी निवेश के लिए प्रोत्साहित करने के लिए सरकार को कंपनियों के साथ उपभोक्ताओं के लिहाज से भी इंसेंटिव देना होगा। भारत में निजी निवेश अर्थव्यवस्था में वृद्धि के लिहाज से दशकों पुरानी समस्या हो चुकी है। साल 2007-08 के बाद से अब निजी निवेश कभी उस स्तर को नहीं छू पाया है। लेकिन इसका दूसरा पहलू यह है कि निजी निवेश, जिसका मतलब यह होता है कि कंपनियां अपना पैसा लगाकर अपनी गतिविधियों का विस्तार करें, के लिहाज से अभी से बेहतर समय शायद कभी था भी नहीं।
कोटक इंस्टिट्यूशनल इक्विटीज की एक रिपोर्ट के मुताबिक चालू साल में कॉरपोरेट आय में 34% की वृद्धि होने की संभावना है और अगले साल भी यह 15% रहेगी। यानी कंपनियों के पास पूर्व के मुकाबले कहीं ज्यादा फंड है। बैंक भी हालिया कैपिटल इंफ्यूजन, बैड बैंक और विलय गतिविधियों के बाद कर्ज देने के लिहाज से बेहतर स्थिति में हैं। जरूरत है तो बस कंपनियों में यह भरोसा जगाने की कि उनके निवेश पर रिटर्न वापस आएगा। और यह भरोसा सिर्फ और सिर्फ उपभोक्ताओं में विश्वास जगा कर ही पैदा किया जा सकता है।
(लेखक कृषि और आर्थिक मामलों के जानकार हैं)
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