Budget 2023: फाइनेंस मिनिस्टर निर्मला सीतारमण (Nirmala Sitharaman) अगले यूनियन बजट में इनसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड (IBC) में बदलाव का ऐलान कर सकती हैं। पिछले कुछ सालों में बैंकरप्सी प्रोसिडिंग्स में कई खामियों का पता चला है। इंडस्ट्री का मानना है कि इन्हें दूर करना जरूरी है। इससे बैंकरप्सी प्रोसिजर को जल्द पूरा करने में मदद मिलेगी। इस मामले में कंपनी मामलों के मंत्रालय ने कई पक्षों से बातचीत की है। IBC 2016 में लागू हुआ था। इससे मुश्किल में फंसी कंपनियों के लिक्विडेशन में मदद मिली है। लेकिन, इस प्रक्रिया में बहुत ज्यादा समय लग रहा है। कुछ दूसरी खामियां भी सामने आई हैं।
नियमों में कई बार बदलाव से भी दूर नहीं हुई समस्या
यह देखा गया है कि मुश्किल में फंसी कंपनी के बैंकरप्सी रिजॉल्यूशन प्रोसेस को पूरा करने के लिए जिन प्रोफेशनल्स की नियुक्ति की जाती है, वे आम तौर पर इंडस्ट्री के एक्सपर्ट्स नहीं होते। इसलिए सरकार इनसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड में बड़े बदलाव के बारे में सोच रही है। हालांकि, इस प्रोसेस को सुगम बनाने के लिए इनसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी बोर्ड कई नियमों में बदलाव कर चुका है। इसके बावजूद प्रॉब्लम बनी हुई है।
बजट सत्र में पेश हो सकता है संशोधन विधेयक
माना जा रहा है कि सरकार IBC में बदलाव के लिए संसद के बजट सत्र में एक बिल पेश कर सकती है। इस साल 31 अक्टूबर को बैंकरप्सी रिजॉल्यूशन के 12,871 मामले लंबित थे। मामलों के निपटारे में लगने वाला औसत समय बढ़ा है। फाइनेंशियल ईयर 2017-18 में मामले के निपटारे में औसत 230 दिन लगते थे। यह फाइनेंशियल ईयर 2022-23 की पहली छमाही में बढ़कर 679 दिन हो गया है।
प्रोसेस को दो हिस्सों में बांटा जा सकता है
सरकार इनसॉल्वेंसी प्रोसेस को दो हिस्सों में बांटने के बारे में सोच रही है। नेशनल कंपनी लॉ ट्राइब्यूनल (NCLT) में मामले दाखिल होने के बाद पहला चरण शुरू हो जाएगा। इसमें कंपनी के संभावित खरीदारों की तलाश करने और अधिग्रहण करने वाली कंपनी को मैनजमेंट के ट्रांसफर पर फोकस होगा। कंपनी को कर्ज देने वाले बैंकों के बीच रिजॉल्यूशन प्रोसीड्स के डिस्ट्रिब्यूश का काम दूसरे चरण में होगा।
बैंकों को जल्द राहत देने की हो सकती है कोशिश
संशोधित बिल में अनडिसप्यूटेड प्रोसीड्स के अंतरिम बंटवारे का प्रावधान भी शामिल किया जा सकता है। बाकी प्रोसीड्स का बंटवारा तब जब रिजॉल्यूशन की प्रक्रिया पूरी हो जाएगी। इससे बैंकों को अपने फंसे पैसे का कुछ हिस्सा जल्द मिल जाएगा। जानकारों का कहना है कि आईबीसी के मामलों में निपटारा मुश्किल होने की एक वजह कुछ मामलों में कोर्ट और ट्राइब्यूनल के फैसले भी हैं। कई बार कुछ फैसले आपस में टकराव पैदा करते हैं। उदाहरण के लिए कमेटी ऑफ क्रेडिटर्स (CoC) के रोल की व्याख्या अलग-अलग तरह से की गई है। इससे उलझन की स्थिति पैदा हुई है।