2024 के लोकसभा चुनावों से पहले जहां सरकार अंतरिम बजट का खाका तैयार करने में जुटी है, वहीं इकोनॉमी भी अब रिकवरी की राह पर दिख रही है। राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय के आंकड़ों के मुताबिक, वित्त वर्ष 2023-24 में जीडीपी ग्रोथ 7.3 पर्सेंट रहने का अनुमान है। भारत इस साल भी सबसे तेजी से बढ़ने वाले अर्थव्यवस्था बना रहेगा। हालांकि, अभी भी अर्थव्यवस्था के लिए कई सारी चुनौतियों मौजूद हैं। हम यहां कुछ चुनौतियों के बारे में बता रहे हैं।
बेहतर परफॉर्मेंस के बावजूद अर्थव्यवस्था के मोर्चे पर संतुष्ट होने की जरूरत नहीं है, क्योंकि इससे अगले वित्त वर्ष में हालात गड़बड़ हो सकते हैं। अगर पश्चिम एशिया में स्थितियां खराब होती हैं, तो इसका असर अलग-अलग रूप में पूरी दुनिया पर देखने को मिलेगा। इजराइल-हमास युद्ध में ईरान का सक्रिय होना चिंता की बात है, क्योंकि इससे पश्चिमी देश आक्रामक रुख अपना सकते हैं। तेल की कीमतों में तेजी और ग्लोबल सप्लाई चेन में बाधा पहुंचने के तौर पर इसका आर्थिक असर भी देखने को मिल सकता है।
पिछले साल रूस-यूक्रेन युद्ध के वक्त यह बढ़कर 3.8 पर्सेंट हो गया था, जबकि अब यह घटकर 1 पर्सेंट हो गया है। लाल सागर में हूती विद्रोहियों के हमलों की वजह से ग्लोबल सप्लाई चेन बाधित होने का खतरा मंडराने लगा है। अगर पश्चिम एशिया में लड़ाई लंबी खिंचती है, तो हालात और खराब हो सकते हैं। इससे भारत के एक्सपोर्ट पर बुरा असर पड़ सकता है, जो इस वित्त वर्ष में पहले ही सुस्ती का शिकार है।
बजट और पॉलिसी संबंधी उपाय
आगामी लोकसभा चुनावों की वजह से यह अंतरिम बजट है, जो नई सरकार के गठन तक ही लागू होगा। चुनावी सर्वेक्षणों में एक बार फिर एनडीए के लौटने की प्रबल संभावना जताई जा रही है, लिहाजा वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण बजट में लंबी अवधि के नजरिये से पॉलिसी का ऐलान कर सकती हैं। हालांकि, यह साफ नहीं है कि पिछले वर्षों की तरह ही इस बार भी इंफ्रास्ट्रक्चर में भारी निवेश पर जोर रहेगा या नहीं। इंफ्रास्ट्रक्चर में बड़े पैमाने पर निवेश से ग्रोथ को काफी बढ़ावा मिला है।
हालांकि, रिकवरी की इस प्रक्रिया में एक कमी यह रही कि प्राइवेट इनवेस्टमेंट, केंद्र और राज्य सरकारों के कैपिटल एक्सपेंडिचर के मुकाबले रफ्तार नहीं पकड़ पाया है। सरकार ने निवेशकों को लुभाने के लिए कई तरह के उपायों की घोषणा की है, लेकिन प्राइवेट इनवेस्टमेंट का मामला संतोषजनक नहीं है। लिहाजा, ईज ऑफ डुइंग बिजनेस के मोर्चे पर सरकार को और काम करने की जरूरत है।
भारत को अब भी ऐसे देश के तौर पर देखा जाता है, जहां बिजनेस करना इंडोनेशिया और वियतनाम जैसे इनवेस्टमेंट फ्रेंडली देशों के मुकाबले मुश्किल है। कंजम्प्शन ग्रोथ में सुस्ती की चुनौती से भी निपटने की जरूरत है। राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO) के आंकड़ों के मुताबिक, कंजम्प्शन ग्रोथ फिलहाल 4.4 पर्सेंट है, जो पिछले दशकों में सबसे कम है।
बजट को इकोनॉमी का राजनीतिक दस्तावेज भी माना जाता है। वित्त मंत्री को ऐसी नीतियों पर काम करने की जरूरत है, जिससे न सिर्फ ग्रोथ को और बढ़ावा मिल सके, बल्कि इकोनॉमी को वैश्विक चुनौतियों से भी बचाया जा सके।