अभी इंडिया में रिश्तेदार के देहांत पर उसके उत्तराधिकारी के नाम प्रॉपर्टी ट्रांसफर होती है तो उस पर कोई टैक्स नहीं लगता है। कई देशों में प्रॉपर्टी इस इस ट्रांसफर पर टैक्स लगता है। इसे इनहेरिटेंस टैक्स कहा जाता है। सवाल है कि क्या इंडिया में इनहेरिटेंस टैक्स लगाने की जरूरत है? इस मसले पर अलग-अलग लोगों की अलग-अलग राय है, जो आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक मसलों पर आधारित है।
इंडिया में इनहेरिटेंस टैक्स लगता था
इंडिया में एस्टेट ड्यूटी एक्ट, 1953 के तहत व्यक्ति के देहांत के बाद उसकी प्रॉपर्टी के ट्रांसफर पर टैक्स (Inheritance Tax) लगता था। इसे 1985 में खत्म कर दिया गया था। इसकी वजह यह थी कि जितना पैसा इस टैक्स से सरकार को मिलता था, उससे ज्यादा पैसा उस टैक्स को कलेक्ट करने पर खर्च हो जाता था। दूसरा, टैक्स अथॉरिटीज के पास मृत व्यक्ति की प्रॉपर्टी की वैल्यू तय करने का स्किल नहीं था। साथ ही टैक्स की रिकवरी भी समय पर नहीं हो पाती थी।
क्या यह दोबारा लागू हो सकता है?
टैक्स रेवेन्यू बढ़ाने और समाज में आर्थिक समानता के लिए वेल्थ रीडिस्ट्रिब्यूशन के मकसद से इंडिया में इनहेरिटेंस टैक्स या इस तरह की लेवी फिर से लगाई जा सकती है। लेकिन, इससे जुड़ी दूसरी समस्याओं को भी ध्यान में रखना होगा।
इनहेरिटेंस टैक्स के पक्ष और विपक्ष में दलील
इनहेरिटेंस टैक्स का समर्थन करने वाले लोगों की सबसे बड़ी दलील यह है कि आज इंडिया में समाज में जिस तरह की आर्थिक अमानता है, उसे देखते हुए यह टैक्स दोबारा शुरू किया जाना चाहिए। इनहेरिटेंस टैक्स का विरोध करने वाले लोगों की दलील है कि इस टैक्स का इनवेस्टमेंट और वेल्थ क्रिएशन पर खराब असर पड़ेगा। इससे इंडिया में बिजनेस एंटरप्राइज की ग्रोथ और उद्यमशीलता भी प्रभावित होगी।
इसके विरोध में दूसरी दलील डबल टैक्सेशन की है। यह दलील देने वाले लोगों का कहना है कि व्यक्ति इनकम पर टैक्स चुकाने के बाद ही इसका इस्तेमाल एसेट्स खरीदने के लिए करता है। इसलिए ऐसे एसेट्स पर टैक्स लगाने का मतलब एक तरह से डबल टैक्स लगाने जैसा है। इसके विरोध में यह दलील दी जाती है कि जिस व्यक्ति को उत्तराधिकार में संपत्ति मिलती है अगर उसके लिहाज से देखा जाए तो उसने इस वेल्थ पर कोई टैक्स नहीं चुकाया होता है।
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अमेरिका, जर्मनी, फ्रांस और यूनाइटेड किंग्डम सहित कुछ देशों में इनहेरिटेंस टैक्स लगता है। हालांकि, इनमें से कई देशों में इसकी एग्जेम्प्शन लिमिट तय है। इसका मतलब है कि एक सीमा से ज्यादा वेल्थ पर ही यह टैक्स लगता है। इससे सिर्फ ज्यादा अमीर लोग ही इस टैक्स के दायरे में आते हैं। इंडिया में एग्जेम्प्शन लिमिट के साथ इनहेरिटेंस टैक्स लगाया जा सकता है। लेकिन, आशंका है कि अमीर लोग इस टैक्स से बचने के लिए ट्रस्ट जैसे जटिल स्ट्रक्चर बना सकते हैं।