'फोर बैलेंस सीट चैलेंज' का मतलब उस वित्तीय दबाव से है जिसका सामना इकोनॉमी के चार सेक्टर्स को करना पड़ रहा है। इनमें बैंक, इंफ्रास्ट्रक्चर कंपनियां, नॉन-बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनीज (एनबीएफसी) और रियल एस्टेट कंपनियां शामिल हैं। यह चैलेंज पहले के 'ट्विन बैलेंस शीट प्रॉब्लम' से आया है। फोर बैलेंस शीट चैलेंज देश की इकोनॉमिक स्टैबिलिटी और ग्रोथ के लिए काफी अहम है। ट्विन बैलेंसशीट प्रॉब्लम की चर्चा अरविंद सुब्रमण्यन ने 2016-17 के इकोनॉमिक सर्वे में की थी। सुब्रमण्यन सरकार के चीफ इकोनॉमिक एडवाइजर रह चुके हैं।
कैसे हुई फोर बैलेंसशीट चैलेंज की शुरुआत?
ट्विन बैलेंसशीट चैलेंज का मतलब उस दबाव से था जिसका सामना ज्यादा कर्ज लेने वाली कंपनियां और डूबे कर्ज से बेहाल सरकारी बैंक (PSU Banks) कर रहे थे। 2000 के दशक के मध्य में जब इकोनॉमी की सेहत अच्छी थी तब सरकारी बैंकों ने कंपनियों खासकर इंफ्रास्ट्रक्चर कंपनियों को हाथ खोलकर कर्ज दिए थे। लेकिन, प्रोजेक्ट को मंजूरी में देर और फाइनेंसिंग कॉस्ट बढ़ने से इन कंपनियों के लिए कर्ज चुकाना मुश्किल हो गया। इससे इन कंपनियों और इन बैंकों की बैलेंसशीट पर दबाव बढ़ गया।
सुब्रमण्यन और जोश फेलमैन ने 2019 में 'इंडिया ग्रेट स्लोडाउन' नाम से एक रिपोर्ट पेश की। इसमें ट्विन बैलेंसशीट प्रॉब्लम की जगह फोर बैलेंसशीट चैलेंज का उल्लेख किया गया। इसमें ये नए इश्यू शामिल किए गए:
बैंक: नॉन-परफॉर्मिंग एसेट्स (NPAs) के मामले में दबाव।
इंफ्रास्ट्रक्चर कंपनियां: प्रोजेक्ट्स में देर और बहुत ज्यादा कर्ज से मुश्किल में।
एनबीएफसी: IL&FS के दिवालिया होने से पूरे एनबीएफसी सेक्टर पर असर।
रियल एस्टेट कंपनियां: घटती मांग और कर्ज चुकाने की वजह से मुश्किल में।
वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने इन चुनौतियों के बावजूद दावा किया था कि इंडिया को ट्विट बैलेंसशीट एडवान्टेज का फायदा मिल रहा है। इससे यह संकेत मिला कि सरकार इन मसलों से कारगर तरीके से निपटने की कोशिश कर रही है। सरकार ने बैंकों की पूंजी बढ़ाने के लिए कदम उठाए हैं। एनबीएफसी के लिए रेगुलेशन सख्त बनाया गया है। रियल एस्टेट सेक्टर में डिमांड बढ़ाने की कोशिश की गई है।
फोर बैलेंसशीट चैलेंज का सामना करने के लिए कई उपाय किए गए हैं:
बैंकों को नई पूंजी: सरकार ने बैंकों की बैलेंसशीट मजबूत करने और लोन देने की क्षमता बढ़ाने के लिए सरकारी बैंकों को नई पूंजी उपलब्ध कराई है।
एनबीएफसी के लिए रिफॉर्म्स: बेहतर रिस्क मैनेजमेंट के लिए रेगुलेटरी फ्रेमवर्क को मजबूत बनाया गया है। साथ ही एनबीएफसी सेक्टर में पारदर्शिता के उपाय किए गए हैं।
रियल एस्टेट रिफॉर्म्स: रियल एस्टेट सेक्टर में डिमांड बढ़ाने के लिए पॉलिसीज लागू की गई हैं। मुश्किल में फंसे डेवलपर्स को राहत उपलब्ध कराने के उपाय किए गए है।
फोर बैलेंसशीट चैलेंज एक जटिल मसला है। इससे इकोनॉमी के कई सेक्टर्स के आपस में जुड़े होने का पता चलता है। इन मसलों के समाधान के लिए ठोस कदम उठाए गए हैं। लेकिन, फाइनेंशियल स्टैबिलिटी और सस्टेनेबल ग्रोथ के लिए कोशिश जारी रखने की जरूरत है।