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Budget 2024: क्या है इंडियन इकोनॉमी का फोर बैलेंसशीट चैलेंज?

पिछले कुछ सालों में इंडियन इकोनॉमी को कुछ बड़े मसलों का सामना करना पड़ा है। इन्हें इकोनॉमी का फोर बैलेंसशीट चैलेंज नाम दिया गया। इनमें बैंक, इंफ्रास्ट्रक्चर कंपनियां, नॉन-बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनीज (एनबीएफसी) और रियल एस्टेट कंपनियां शामिल हैं

MoneyControl Newsअपडेटेड Jul 02, 2024 पर 11:34 AM
Budget 2024: क्या है इंडियन इकोनॉमी का फोर बैलेंसशीट चैलेंज?
फोर बैलेंस शीट चैलेंज देश की इकोनॉमिक स्टैबिलिटी और ग्रोथ के लिए काफी अहम है।

'फोर बैलेंस सीट चैलेंज' का मतलब उस वित्तीय दबाव से है जिसका सामना इकोनॉमी के चार सेक्टर्स को करना पड़ रहा है। इनमें बैंक, इंफ्रास्ट्रक्चर कंपनियां, नॉन-बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनीज (एनबीएफसी) और रियल एस्टेट कंपनियां शामिल हैं। यह चैलेंज पहले के 'ट्विन बैलेंस शीट प्रॉब्लम' से आया है। फोर बैलेंस शीट चैलेंज देश की इकोनॉमिक स्टैबिलिटी और ग्रोथ के लिए काफी अहम है। ट्विन बैलेंसशीट प्रॉब्लम की चर्चा अरविंद सुब्रमण्यन ने 2016-17 के इकोनॉमिक सर्वे में की थी। सुब्रमण्यन सरकार के चीफ इकोनॉमिक एडवाइजर रह चुके हैं।

कैसे हुई फोर बैलेंसशीट चैलेंज की शुरुआत?

ट्विन बैलेंसशीट चैलेंज का मतलब उस दबाव से था जिसका सामना ज्यादा कर्ज लेने वाली कंपनियां और डूबे कर्ज से बेहाल सरकारी बैंक (PSU Banks) कर रहे थे। 2000 के दशक के मध्य में जब इकोनॉमी की सेहत अच्छी थी तब सरकारी बैंकों ने कंपनियों खासकर इंफ्रास्ट्रक्चर कंपनियों को हाथ खोलकर कर्ज दिए थे। लेकिन, प्रोजेक्ट को मंजूरी में देर और फाइनेंसिंग कॉस्ट बढ़ने से इन कंपनियों के लिए कर्ज चुकाना मुश्किल हो गया। इससे इन कंपनियों और इन बैंकों की बैलेंसशीट पर दबाव बढ़ गया।

सुब्रमण्यन और जोश फेलमैन ने 2019 में 'इंडिया ग्रेट स्लोडाउन' नाम से एक रिपोर्ट पेश की। इसमें ट्विन बैलेंसशीट प्रॉब्लम की जगह फोर बैलेंसशीट चैलेंज का उल्लेख किया गया। इसमें ये नए इश्यू शामिल किए गए:

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