Budget 2023: इनकम टैक्स रेट नहीं घटेंगे, फिस्कल डेफिसिट टारगेट 5.8% रह सकता है, एलारा कैपिटल की गरिमा कपूर की राय

Union Budget 2023: कई एक्सपर्ट्स का मानना है कि सरकार के लिए पूंजीगत खर्च की मौजूदा रफ्तार को अगले फाइनेंशियल ईयर में जारी रखना मुश्किल होगा। लेकिन, गरिमा कपूर ने फिस्कल डेफिसिट के साथ कैपिटल एक्सपेंडिचर पर सरकार का फोकस जारी रहने का अनुमान जताया है

अपडेटेड Dec 23, 2022 पर 11:17 AM
गरिमा कपूर ने कहा कि सरकार कस्टम ड्यूटी में बदलाव कर सकती है। मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देने के लिए वह कच्चे माल के आयात पर ड्यूटी घटा सकती है।

Union Budget 2023: वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण अगले यूनियन बजट में फिस्कल डेफिसिट (Fiscal Deficit) के लिए 5.7-5.8 फीसदी का टारगेट तय कर सकती हैं। सरकार का फोकस अगले फाइनेंशियल ईयर में भी कैपिटल एक्सपेंडिचर पर रहने की उम्मीद है। एलारा कैपिटल की इकोनॉमिस्ट गरिमा कपूर ने यह अनुमान जताया है। मनीकंट्रोल से बातचीत में उन्होंने बजट से लेकर अपनी उम्मीदों के बारे में खुलकर चर्चा की। उन्होंने इकोनॉमिक रिकवरी को जारी रखने के उपायों के बारे में भी बताया। उन्होंने कहा कि सरकार अगले फाइनेंशियल ईयर में पूंजीगत खर्च के टारगेट को 20 फीसदी तक बढ़ा सकती है। फाइनेंस मिनिस्टर निर्मला सीतारमण (Nirmala Sitharaman) 1 फरवरी, 2023 को यूनियन बजट (Union Budget) पेश करेंगी। यह बजट ऐसे वक्त आ रहा है, जब ग्लोबल इकोनॉमी पर मंदी का खतरा बढ़ रहा है। इधर, इंडियन इकोनॉमी की सेहत अपेक्षाकृत अच्छी है।

कैपिटल एक्सपेंडिचर पर फोकस जारी रहेगा

कपूर ने कहा कि सरकार कैपिटल एक्सपेंडिचर बढ़ाने के साथ ही फिस्कल कंसॉलिडेशन पर फोकस बढ़ाएगी। हमें फाइनेंस मिनिस्टर के अगले यूनियन बजट में इनकम टैक्स रेट्स में किसी तरह की कमी की उम्मीद नहीं करनी चाहिए। हमें टैक्स डिडक्शन और एग्जेम्प्शन की लिमिट बढ़ाने जाने की उम्मीद भी नहीं लगानी चाहिए। हालांकि, उम्मीद है कि सरकार कस्टम ड्यूटी में बदलाव कर सकती है। मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देने के लिए वह कच्चे माल के आयात पर ड्यूटी घटा सकती है। खासकर ऐसे उत्पादों पर ड्यूटी में कमी की जा सकती है, जिनका इस्तेमाल इंडिया में वैल्यू एडिशन के लिए होता है। कंज्यूमर इलेक्ट्रॉनिक्स इसका उदाहरण है।


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इंडियन इकोनॉमी की सेहत दूसरे देशों की इकोनॉमी से अच्छी

उन्होंने कहा कि इंडियन इकोनॉमी की ग्रोथ अच्छी बनी हुई है। इसमें सर्विसेज सेक्टर में अच्छी डिमांड का बड़ा हाथ है। मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर के शुरुआती संकेत यह बताते हैं कि इसे थोड़ी दिक्कत का सामना करना पड़ सकता है। इसकी वजह यह है कि ग्लोबल इकोनॉमी मुश्किल में दिख रही है। इस वजह से विदेशी बाजार में कई चीजों की डिमांड घट सकती है। इधर, इंडिया में बैंकों की बैलेंसशीट में सुधार आया है। कंपनियों का डेट-इक्विटी रेशियो बेहतर हुआ है। कैपेसिटी यूटिलाइजेशन भी बढ़ा है। RBI की रिपोर्ट के मुताबिक, कोरोना से पहले दिसंबर 2019 में कैपेसिटी यूटिलाइजेशन 68.6 फीसदी था, जो मार्च 2022 में बढ़कर 75.3 फीसदी हो गया।

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फिस्कल कंसॉलिडेशन की अनदेखी नहीं करेगी सरकार

अगले फाइनेंशियल ईयर में फिस्कल कंसॉलिडेशन के बारे में कपूर ने कहा कि वित्त वर्ष 2025-26 तक फिस्कल डेफिसिट के 4.5 फीसदी टारगेट को देखते हुए लगता है कि सरकार फिस्कल कंसॉलिडेशन की अनदेखी नहीं करेगी। कोरोना की महामारी के बाद इनफ्लेशन में तेज वृद्धि को देखते हुए यह स्पष्ट हो गया है कि मजबूत इकोनॉमी वाले देशों की दिक्कत ज्यादा नहीं बढ़ी है। इस कैलेंडर ईयर में दूसरे उभरते बाजारों के मुकाबले इंडियन मार्केट के परफॉर्मेंस से भी इसका संकेत मिलता है। इस साल MSCI EM 22 फीसदी गिरा है, जबकि लोकल करेंसी (रुपये) में इंडियन मार्केट 6 फीसदी बढ़ा है। डॉलर में यह 6 फीसदी गिरा है।

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