डी के जोशी
डी के जोशी
Union Budget 2023: अगला यूनियन बजट ऐसे वक्त आ रहा है, जब इंडिया की जीडीपी ग्रोथ अच्छी है। टैक्स कलेक्शन बढ़ रहा है और फिस्कल डेफिसिट के भी बजट टारगेट के करीब रहने का अनुमान है। इसलिए यूनियन बजट 2023 के लिए आर्थिक बुनियादी स्थितियां ज्यादा चैलेंजिंग नहीं हैं। कोविड-19 का असर इकोनॉमी पर पड़ता नहीं दिख रहा है। ग्रोथ का दायरा व्यापक हो रहा है। इसमें सर्विसेज की हिस्सेदारी बढ़ रही है। इंटरेस्ट रेट बढ़ने का असर आगे जीडीपी ग्रोथ पर दिखाई देगा। हमे अगले फाइनेंशियल ईयर में रियल जीडीपी ग्रोथ 6 फीसदी रहने का अनुमान है। इस फाइनेंशियल ईयर में इसके 7 फीसदी रहने का अनुमान है। इस फाइनेंशियल ईयर में नॉमिनल जीडीपी ग्रोथ 10.5-11 रहने की उम्मीद है, जबकि पहले इसका अनुमान 15 फीसदी था।
नॉमिनल ग्रोथ घटने का मतलब है कि टैक्स रेवेन्यू की ग्रोथ कम होगी। इससे सरकार के लिए खर्च करने की गुंजाइश कम हो जाएगी, क्योंकि सरकार को फिस्कल डेफिसिट कम करने के लिए अपने खर्च को नियंत्रित करने के उपायों पर फोकस करना होगा। इन चुनौतियों के बीच मुझे यूनियन बजट 2023-24 के लिए निम्नलिखित प्राथमिकताएं नजर आ रही हैं:
फिस्कल डेफिसिट पर नियंत्रण
कोरोना की महामारी की वजह से फिस्कल डेफिसिट का टारगेट बहुत बढ़ गया है। इसमें कमी लाने की जरूरत है। इसे धीरे-धीरे घटाकर फाइनेंशियल ईयर 2025-26 तक 4.5 फीसदी पर लाना जरूरी है। इलेक्शंस से पहले के साल में फिस्कल कंसॉलिडेशन पर फोकस करने से सरकार की विश्वसनीयता बढ़ेगी। इससे RBI की तरफ से इनफ्लेशन को कंट्रोल में करने के लिए उठाए गए उपायों को भी सपोर्ट मिलेगा।
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फिस्कल डेफिसिट को घटाते वक्त सरकार को सब्सिडी पर होने वाले अपने काफी ज्यादा खर्च को कैपिटल स्पेंडिंग के लिए इस्तेमाल करने की कोशिश करनी होगी। क्रूड, फर्टिलाइजर और घरेलू फूड प्राइसेज की कीमतों में नरमी से सरकार के लिए यह काम करना आसान हो जाएगा।
पब्लिक इनवेस्टमेंट पर जोर
पिछले दो साल में सरकार की फिस्कल पॉलिसी की एक खास बात यह रही है कि सरकार ने इंफ्रास्ट्रक्चर बनाने पर खर्च बढ़ाया है। इस पर खर्च बढ़ाने का असर इकोनॉमी पर कई तरह से दिखा है। प्राइवेट सेक्टर के लिए निवेश बढ़ाना जरूरी है। कंपनियों की अच्छी बैलेंसशीट और कैश रिजर्व को देखते हुए ऐसा करना आसान है। हालांकि, आर्थिक अनिश्चितताओं की वजह से तेजी से ग्रोथ करने की संभावनाओं को लेकर आशंका है।
इस प्रॉब्लम का एक समाधान प्राइवेट इनवेस्टमेंट को तब तक इनसेंटिव प्रदान करना होगा सकता है, जब तक अनिश्चितता की स्थिति खत्म नहीं हो जाती। सरकार की PLI स्कीम इसी तरह की एक पहल है। इसे अहम माने जाने वाले सेक्टर में प्राइवेट इनवेस्टमेंट बढ़ाने में मदद मिली है। इनमें इलेक्ट्रॉनिक्स, फार्मास्युटिकल्स और सोलर एनर्जी शामिल हैं। इसलिए बजट में कंपनियों को निवेश बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित करने के उपाय होने चाहिए।
जलवायु परिवर्तन पर फोकस बढ़ाना होगा
जलवायु परिवर्तन का असर कई तरह से दिखने लगा है। इनमें तापमान में वृद्धि और सूखा, तूफान, लू और बाढ़ जैसी आपदाएं शामिल हैं। इंटरगवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेंट चेंज (IPCC) 2022 की रिपोर्ट में कहा गया है कि इंडिया उन देशों में शामिल है, जिन्हें जलवायु परिवर्तन से सबसे ज्यादा नुकसान हो सकता है। इसलिए इस प्रॉब्लम पर फोकस बढ़ाने की जरूरत है। इसके लिए दो बड़ी पहल की जा सकती हैं।
पहला फूड सिक्योरिटी है। इसकी वजह यह है कि क्लाइमेट चेंज का असर सबसे पहले फूड प्रोडक्शन और उनके प्राइसेज पर पड़ता है। हम गेहूं की कीमतों का उदाहरण ले सकते हैं। मार्च में लू जैसी स्थितियों की वजह से फसल पर असर पड़ा। इस वजह से इसका उत्पादन घट गया। उत्पादन घटने से इसकी कीमतें बढ़ गईं।
फूड इकोनॉमी पर पड़ने वाले असर को कम करने के लिए बजट में कदम उठाए जा सकते हैं। ऐसी फसलों की खेती को प्रोत्साहित करने के लिए बजट आवंटन बढ़ाया जा सकता है, जिनका उत्पादन प्रतिकूल मौसम में भी अच्छा बना रहता है। स्टोरेज के लिए वेयरहाउसिंग, फूड प्रोसेसिंग और कीमतों में होने वाले उतार-चढ़ाव से निपटने के लिए कदम उठाए जा सकते हैं।
दूसरा है ग्रीन ट्रांजिशन। इंडिया की ग्रोथ में सर्विस सेक्टर का बड़ा हाथ रहा है। लेकिन, मैन्युफैक्चरिंग और इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट पर फोकस बढ़ाने से सर्विसेज को लेकर हमारे अप्रोच में बदलाव आया है। मजबूत बैलेंसशीट वाली बड़ी कंपनियां इस मसले से निपटने में सक्षम हैं। छोटी कंपनियों के पास इसके लिए पर्याप्त संसाधन नहीं हैं। इंडिया में करीब 6.5 करोड़ सूक्ष्म, छोटी और मध्यम इकाइयां हैं। कार्बन फुटप्रिंट में इनकी बड़ी हिस्सेदारी है। इसलिए लोअर कार्बन फुटप्रिंट के लिए इन उद्यमों को मदद बढ़ाने की जरूरत है। यह ग्रीन ट्रांजिशन के लिए जरूरी है। MSME के लिए ग्रीन फाइनेंसिंग की सुविधा बढ़ाई जा सकती है।
अंत में, हर बजट में संतुलन बनाने की कोशिश होती है। लेकिन, अगला बजट चुनौतीपूर्ण स्थितियों में आ रहा है जब अगले साल इलेक्शंस हैं। इसलिए यह बजट बनाने वाली टीम का एक बड़ा इम्तहान होगा।
(डीके जोशी क्रिसिल की चीफ इकोनॉमिस्ट हैं। इस लेख में व्यक्त विचार उनके व्यक्तिगत हैं। ये इस पब्लिकेशन के विचार को व्यक्त नहीं करते हैं।)
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