Union Budget 2023: फाइनेंस मिनिस्टर निर्मला सीतारमण (Nirmala Sitharaman) को कुछ सेक्टर के लिए मदद के उपाय करने के साथ ही फिस्कल कंसॉलिडेशन पर फोकस बढ़ाने की जरूरत है। National Institute of Public Finance and Policy (NIPFP) की सीनियर फेलो राधिका पांडे ने यह बात कही है। NIPFP एक स्वायत रिसर्च इंस्टीट्यूट है, जो फाइनेंस मिनिस्ट्री के तहत आता है। पांडे ने कहा कि सरकार को बजट में उन सेक्टर की मदद के लिए उपाय करने की जरूरत है, जो मुश्किल का सामना कर रहे हैं। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण 1 फरवरी, 2023 को यूनियन बजट (Budget 2023) पेश करेंगी। यह बजट ऐसे वक्त आ रहा है, जब सरकार को इकोनॉमिक ग्रोथ को बढ़ावा देने वाले उपाय करने के साथ ही अपनी वित्तीय स्थिति को मजबूत करने का दबाव है। कोरोना की महामारी के दौरान इकोनॉमी को सहारा देने के लिए सरकार ने अपना खर्च बढ़ाया था। इससे इसका फिस्कल डेफिसिट काफी बढ़ गया है।
मीडियम टर्म में फिस्कल डेफिसिट 4.5 फीसदी पर लाने की जरूरत
पांडे ने कहा कि सरकार के सामने कुछ सेक्टर्स की मदद करने, कैपिटल एक्सपेंडिचर बढ़ाने और फिस्कल कंसॉलिडेशन पर फोकस करने की चुनौती है। सरकार को फिस्कल डेफिसिट घटाने की जरूरत है। उसे फाइनेंशियल ईयर 2025-26 तक फिस्कल डेफिसिट को जीडीपी के 4.5 फीसदी पर लाने की जरूरत है। ग्लोबल इकोनॉमी मुश्किल में दिख रही है। ऐसे में मीडियम टर्म में इंडिया की 6-7 फीसदी की इकोनॉमिक ग्रोथ अच्छी कही जाएगी।
कई देशों पर मंडरा रहा मंदी का खतरा
उन्होंने कहा कि बजट में ऐसे सेक्टर पर फोकस करने की जरूरत है, जिन्हें सरकार की मदद की जरूरत है। 2023 एक मुश्किल साल होने जा रहा है। हमने विकसित देशों के साथ ही इंडिया में मौद्रिक नीति में सख्ती देखी है। इसका असर अगले साल से दिखना शुरू होगा। इसके चलते डिमांड में सुस्ती देखने को मिल सकती है। साथ ही मंदी जैसी स्थिति भी बन सकती है। इंटरनेशनल मॉनेटरी फंड (IMF) कह चुका है कि दुनिया की एक-तिहाई इकोनॉमी मंदी में जा सकती हैं।
सरकार को पूंजीगत खर्च पर फोकस बनाए रखना होगा
उन्होंने कहा कि हमारी प्राथमिकत कैपिटल एक्सपेंडिचर बढ़ाना होगा। चीफ इकोनॉमिक एडवाइजर कह चुके हैं कि प्राइवेट सेक्टर को इनवेस्टमेंट का प्राइम इंजन बनना होगा। लेकिन, अभी स्थिति अनिश्चित बनी हुई है। भले ही इकोनॉमिक रिकवरी के संकेत दिख रहे हैं, लेकिन यह कहना मुश्किल हैं कि रिकवरी कितने समय तक जारी रहने वाली है। इसकी वजह यह है कि इनफ्लेशन अब भी प्रॉब्लम बना हुआ है। मौद्रिक सख्ती भी जारी रहने का अनुमान है। ग्रोथ भी सुस्त पड़ने की आशंका है। ऐसे में सरकार के लिए पूंजीगत खर्च बढ़ाने की जरूरत है।