Union Budget 2023: मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देने में सरकार की PLI स्कीम की मददगार साबित हुई है। इससे पहले कॉर्पोरेट टैक्स में कमी करने के सरकार के फैसले का भी काफी अच्छा असर पड़ा है। 2019 में सरकार ने एक के बाद एक कई उपायों का ऐलान किया था। कंपनियों को कम टैक्स रीजीम में स्विच करने का ऑप्शन दिया गया था। मैन्युफैक्चरिंग करने वाली नई कंपनियों को सिर्फ 15 फीसदी कॉर्पोरेट टैक्स का विकल्प मिला था।
ऊपर के चार्ट से पता चलता है कि फाइनेंशियल ईयर 2019-20 में इफेक्टिव टैक्स रेट मे तेज गिरावट आई थी। इसमें कंपनियों के कम टैक्स रीजीम में स्विच करने का भी हाथ था। कुल इनकम में 62 फीसदी हिस्सेदारी रखने वाली 16 फीसदी कंपनियों ने 22 फीसदी के कम टैक्स रेट वाली रीजीम में शिफ्ट किया था। हालांकि, पिछली तिमाही के आंकड़े बताते हैं कि कोरोना की महामारी का असर कंपनियों के बिजनेस पर पड़ा। कई कंपनियों को अपने लॉसेज राइट-ऑफ करना पड़ा।
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दरअसल, पिछले साल के बजट डॉक्युमेंट्स में फाइनेंशियल ईयर 2020-21 के डेटा शामिल नहीं थे, क्योंकि कंपनियों को रिटर्न फाइल करने के लिए अतिरिक्त समय मिला था। फाइनेंशियल ईयर 2019-20 में हमें टैक्स और PBT रेशियो में उछाल दिखता है। लेकिन, इसकी वजह कोरोना की महामारी का असर है। कई कंपनियों को राइट-ऑफ करना पड़ा और अंतिम तिमाही में लॉस उठाना पड़ा।
फाइनेंशियल ईयर 2020-21 और फाइनेंशियल ईयर 2021022 के टैक्स और पीबीटी रेशियो में फाइनेंशियल ईयर 2018-19 के मुकाबले साफ तौर पर गिरावट का पता चलता है। भारतीय कंपनियों जो लंबे समय तक ज्यादा टैक्स वाली व्यवस्था की शिकायत करती रही हैं, अब ऐसा नहीं कर सकतीं। इधर, सरकार की उम्मीद यह रही है कि कंपनियां इंडिया में ज्यादा इनवेस्ट करेंगी। लेकिन, कोरोना की वजह से ऐसा नहीं हो सका। अब इंटरेस्ट रेट में बढ़ोतरी ने रिस्क बढ़ा दिया है।
कंपनियां की टैक्स में कमी करने की मांग कभी खत्म होने वाली नहीं है। लेकिन, सरकार इस मामले में ज्यादा कुछ नहीं कर सकती। टैक्स में राहत मिलने से कंपनियों को फायदा हुआ है। लेकिन, सरकार की शिकायत रही है कि इसके बदले कंपनियां निवेश नहीं बढ़ा रही हैं। ऐसे में सरकार यह कह सकती है कि अगर कंपनियां निवेश बढ़ाने को तैयार नहीं हैं तो सरकार टैक्स रेट्स बढ़ा सकती है। आखिरकार, जरूरत पड़ने पर सरकार के पास टैक्स रेट्स में बदलाव करने का अधिकार है।