पब्लिक डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम (PDS) के तहत करीब 80 करोड़ लोगों को मिलने वाला मुफ्त गेहूं और चावल नए कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स (CPI) बास्केट में शामिल नहीं किया जाएगा। CPI के बेस ईयर को अपडेट करने के लिए बने 22 सदस्यों वाले टेक्निकल एडवाइजरी पैनल ने अंतरराष्ट्रीय मानकों को ध्यान में रखते हुए यही फैसला लिया है। पैनल का मानना है कि, जिन खाद्य वस्तुओं की बाजार में कीमत नहीं चुकाई जाती, उन्हें महंगाई मापने वाले इंडेक्स में शामिल करना ग्लोबल ट्रेंड के अनुरूप नहीं है, इसलिए मौजूदा व्यवस्था को ही जारी रखा जाएगा।
फ्री में मिलने वाले आइटम नहीं हैं शामिल
टाइम्स ऑफ इंडिया ने एक अधिकारी के हवाले से बताया कि, “अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नियम यही है कि जिन खाद्य पदार्थों, सामान या सेवाओं की कोई कीमत नहीं ली जाती, उन्हें इसमें शामिल नहीं किया जाता। इसलिए यह तय किया गया कि हमें वैश्विक नियमों से अलग नहीं जाना चाहिए। दूसरे देशों में मुफ्त मिलने वाली चीजें उपभोग बास्केट का सिर्फ 5–10% हिस्सा होती हैं, जबकि भारत में बहुत बड़ी आबादी को ये आइटम मुफ्त दिए जाते हैं।” मौजूदा CPI सीरीज़ में केवल सब्सिडी वाले खाद्य पदार्थ ही बास्केट में शामिल हैं। पूरी तरह मुफ्त मिलने वाले आइटम इसमें शामिल नहीं किए गए हैं और नई सीरीज में भी उन्हें जोड़ने का कोई प्रस्ताव नहीं है। हमें जो सुझाव मिले हैं, उनसे यह संकेत मिला कि अगर मुफ़्त आइटम शामिल किए गए, तो महंगाई के आंकड़ों पर निगेटिव असर पड़ सकता है, क्योंकि ऐसे मामलों में महंगाई कम दिखाई देने की आशंका रहती है।”
बता दें कि मुफ्त की चीजों को महंगाई के आंकड़ों से बाहर रखने पर आईएमएफ, विश्व बैंक और मंत्रालय के विशेषज्ञों ने भी मंथन किया है। इन सभी का मानना है कि पीडीएस में बांटी जानी वाली चीजें परिवारों के उपभोग पर बड़ा असर डालती हैं, लेकिन इनसे महंगाई में कोई योगदान नहीं होता। इसे शामिल किए बिना अगर महंगाई का आंकड़ा निकाला जाएगा तो वह ज्यादा दिखेगा, लेकिन इन चीजों को भी शामिल करके आंकड़े निकालें तो इसमें निश्चित रूप से गिरावट दिखेगी।
लंबे समय बाद लिया गया ये फैसला
यह फैसला हाल के वर्षों में नई CPI सीरीज में मुफ्त मिलने वाले खाद्य पदार्थों को शामिल करने को लेकर हुई लंबी चर्चा के बाद लिया गया है। इस मुद्दे पर सांख्यिकी मंत्रालय में लगातार विचार-विमर्श चलता रहा था और मंत्रालय की ओर से पहले दो चर्चा-पत्र भी जारी किए गए थे। सभी पहलुओं पर राय लेने और असर का आकलन करने के बाद ही अब इस पर अंतिम निर्णय किया गया है।
बता दें कि, जनवरी 2023 में केंद्र सरकार द्वारा प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना लागू किए जाने के बाद यह चर्चा तेज हो गई कि क्या मुफ्त अनाज को CPI सीरीज़ में शामिल किया जाना चाहिए। इस योजना के तहत देश की लगभग 75 प्रतिशत ग्रामीण और 50 प्रतिशत शहरी आबादी को बिना कीमत के अनाज दिया जाता है। इतने बड़े स्तर पर मुफ़्त खाद्य सामग्री मिलने के कारण महंगाई के आंकड़ों पर इसके असर को लेकर सवाल उठने लगे, जिसके बाद यह मुद्दा नीति स्तर पर गंभीर बहस का विषय बन गया।
बता दें कि खुदरा महंगाई के आंकड़े तय करने के लिए कई फैक्टर पर नजर रखी जाती है। इसमें खाने-पीने की चीजों के अलावा ईंधन, बिजली, मकान बनाने की लागत, परिवहन और माल ढुलाई जैसी जरूरी चीजों को शामिल किया जाता है। इन चीजों की कीमतों में बदलाव आने के साथ ही खुदरा महंगाई के आंकड़े भी बदलते हैं। इन आंकड़ों के आधार पर रिजर्व बैंक अपनी मौद्रिक नीतियां तय करता है और कर्ज की ब्याज दरों में बदलाव करता है।