रिकॉर्ड निचले स्तर पर रुपया, एक्सपोर्ट-इंपोर्ट से लेकर आपकी जेब तक पर क्या होगा असर? समझिए पूरी तस्वीर

Rupee vs Dollar Impact: डॉलर के मुकाबले रुपया रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गया है। इसका असर कई चीजों की महंगाई तक में दिख सकता है। वहीं, निर्यातकों को सीमित राहत मिल सकती है। तस्वीर समझिए पूरी।

अपडेटेड Jan 25, 2026 पर 4:21 PM
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रुपये की कमजोरी का असर विदेशी में पढ़ाई पर भी पड़ता है।

Rupee vs Dollar Impact: भारतीय रुपया 23 जनवरी को अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 92 के रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गया। रुपये की इस गिरावट का सीधा असर आम आदमी से लेकर कारोबार तक दिखने वाला है।

कच्चा तेल, इलेक्ट्रॉनिक सामान, विदेश में पढ़ाई और विदेशी यात्रा जैसी चीजें महंगी हो सकती हैं। वहीं, निर्यातकों को हर डॉलर पर ज्यादा रुपये मिलने से कुछ राहत मिल सकती है। कुल मिलाकर, कमजोर रुपया महंगाई का दबाव बढ़ा सकता है।

एक साल में कैसी रही रुपये की चाल


इस महीने यानी जनवरी में अब तक रुपया 202 पैसे यानी 2% से ज्यादा टूट चुका है। वहीं पूरे 2025 की बात करें, तो रुपये में करीब 5% की गिरावट दर्ज की गई थी। इसके पीछे दो बड़ी वजहें रही हैं- शेयर बाजार में से विदेशी निवेशकों का लगातार पैसा निकालना और अमेरिकी डॉलर का मजबूत होना।

इंपोर्टर्स पर पड़ेगी सबसे ज्यादा मार

कमजोर होता रुपया सबसे पहले आयात करने वाली कंपनियों को प्रभावित करता है। उन्हें वही सामान खरीदने के लिए ज्यादा रुपये खर्च करने पड़ते हैं। भारत अपनी करीब 85% ईंधन जरूरतें आयात के जरिए पूरी करता है। जैसे कि पेट्रोल, डीजल और जेट फ्यूल। ऐसे में रुपये की गिरावट से तेल का बिल बढ़ना तय है। इसका असर आखिर में महंगाई में इजाफे के तौर पर दिखता है।

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निर्यातकों को कैसे मिलता है फायदा

दूसरी तरफ, कमजोर रुपया निर्यातकों के लिए फायदेमंद रहता है। क्योंकि उन्हें विदेश से पेमेंट डॉलर में मिलता है, जो रुपये में ज्यादा हो जाता है। इससे उनके रेवेन्यू और मार्जिन बेहतर हो सकते हैं।

हालांकि यह फायदा सभी निर्यातकों को बराबर नहीं मिलता। जिन कंपनियों का कारोबार आयातित कच्चे माल, कंपोनेंट्स या टेक्नोलॉजी पर ज्यादा निर्भर है, उनकी लागत भी रुपये की कमजोरी के साथ बढ़ जाती है। ऐसे में अतिरिक्त कमाई का एक हिस्सा ऊंचे इनपुट खर्च में चला जाता है और कुल फायदा सीमित रह सकता है।

किन चीजों के आयात पर पड़ेगा असर

भारत की इंपोर्ट बास्केट में कच्चा तेल, कोयला, प्लास्टिक, केमिकल्स, इलेक्ट्रॉनिक सामान, खाद्य तेल, उर्वरक, मशीनरी, सोना, मोती, कीमती और अर्ध-कीमती पत्थर, आयरन और स्टील शामिल हैं।

चूंकि आयातकों को भुगतान के लिए डॉलर खरीदने पड़ते हैं, इसलिए कमजोर रुपया इन सभी चीजों को महंगा बना देता है। तेल के अलावा मोबाइल फोन के कंपोनेंट्स, कुछ ऑटोमोबाइल्स और घरेलू इलेक्ट्रॉनिक अप्लायंसेज की कीमतों में भी बढ़ोतरी देखने को मिल सकती है।

विदेश में पढ़ाई और यात्रा होगी महंगी

रुपये की कमजोरी का असर विदेशी में पढ़ाई पर भी पड़ता है। विदेश की यूनिवर्सिटीज को फीस डॉलर में देनी होती है, ऐसे में हर डॉलर के बदले ज्यादा रुपये चुकाने पड़ते हैं। इसी तरह विदेश यात्रा भी महंगी हो जाती है, क्योंकि बाहर खर्च करने के लिए डॉलर खरीदने में ज्यादा पैसे लगते हैं।

हालांकि. जो NRI भारत पैसा भेजते हैं, उन्हें कमजोर रुपये का फायदा मिलता है। डॉलर को रुपये में बदलने पर उन्हें पहले के मुकाबले ज्यादा रकम मिलती है।

 Bank of Baroda बैंक ऑफ बड़ौदा का एजुकेशन लोन 8.70% से शुरू होता है। 50 लाख रुपये के 15 साल के लोन पर EMI लगभग 49,825 रुपये है। बैंक छात्रों को व्यापक कवर और आसान रीपेमेंट टर्म्स ऑफर करता है।

कौन से सेक्टर को ज्यादा फायदा, कौन पीछे

जिन सेक्टर्स में आयात पर निर्भरता कम होती है, जैसे टेक्सटाइल्स, उन्हें कमजोर रुपये का सीधा और ज्यादा फायदा मिल सकता है। क्योंकि उनकी लागत ज्यादा नहीं बढ़ती और डॉलर में होने वाली कमाई से मार्जिन बेहतर होता है।

इसके उलट इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे सेक्टर्स में रुपये की कमजोरी का फायदा सीमित रह जाता है। इसमें कच्चा माल और कंपोनेंट्स बड़े पैमाने पर आयात किए जाते हैं। इससे बढ़ी इनपुट कॉस्ट मुनाफे का बड़ा हिस्सा खा जाती है।

क्या बताते हैं लेटेस्ट ट्रेड आंकड़े

दिसंबर 2025 में भारत का आयात 8.7% बढ़कर 63.55 अरब डॉलर रहा। इसी महीने ट्रेड डेफिसिट 25.04 अरब डॉलर तक पहुंच गया, जो नवंबर 2025 में 24.53 अरब डॉलर और दिसंबर 2024 में 22 अरब डॉलर था।

डॉलर में तय होने वाले कच्चे तेल के आयात दिसंबर 2025 में करीब 6% बढ़कर 14.4 अरब डॉलर रहे। वहीं चांदी का आयात लगभग 80% उछलकर 758 मिलियन डॉलर तक पहुंच गया। इसके उलट सोने का आयात 12% घटकर 4.13 अरब डॉलर रहा।

एक्सपर्ट क्या कहते हैं

थिंक टैंक Global Trade Research Initiative (GTRI) का कहना है कि लंबे समय में आर्थिक स्थिरता के लिए भारत को ग्रोथ और महंगाई के बीच संतुलन बनाना होगा। इसके साथ ही रुपये के प्रबंधन और ट्रेड स्ट्रैटेजी पर भी नए सिरे से सोचने की जरूरत है।

वहीं Federation of Indian Export Organisations (FIEO) के मुताबिक, कमजोर रुपया भारतीय उत्पादों को ग्लोबल मार्केट में ज्यादा प्रतिस्पर्धी बनाता है। हालांकि जिन सेक्टर्स में आयात पर निर्भरता ज्यादा है, वहां बढ़ी हुई इनपुट लागत के चलते करेंसी का फायदा काफी हद तक खत्म हो सकता है। जैसे कि जेम्स एंड ज्वेलरी और इलेक्ट्रॉनिक्स।

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