RBI Report: बैंकों के सेविंग्स अकाउंट में अब कम पैसे डाल रहे भारतीय, यह दूसरा विकल्प अधिक आ रहा पसंद

RBI Report: लंबे समय से भारतीयों का पैसा बैंक में बचत खाते में सुरक्षित रहा है लेकिन अब उनका मन इससे भरता हुआ दिख रहा है। इसकी वजह ये है कि बैंकों में जितना पैसा जमा है, उसमें सेविंग्स अकाउंट की हिस्सेदारी कम हुई है। जानिए कि सेविंग्स अकांउट नहीं तो कहां पैसा जमा हो रहा आम लोगों का और इस बदलते रुझान की वजह क्या है

अपडेटेड Jun 03, 2026 पर 1:20 PM

RBI Report: केंद्रीय बैंक आरबीआई इस वित्त वर्ष 2027 की दूसरी मौद्रिक नीतियों का ऐलान करने वाला है। रेपो रेट को लेकर आरबीआई ने क्या फैसला लिया है, यह शुक्रवार को सामने आ जाएगा लेकिन उससे पहले आरबीआई की एक रिपोर्ट ने आम लोगों के बदलते रुझान की तस्वीर पेश की है। इस रिपोर्ट के मुताबिक पिछले 5 वर्षों में भारतीयों का भरोसा बचत खाते से कम हुआ है। लोग अब अपना पैसा सेविंग्स अकाउंट से निकालकर धड़ाधड़ फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) जैसे टर्म डिपॉजिट्स में डाल रहे हैं। मार्च 2022 में बैंकों में कुल जमा में सेविंग्स अकाउंट की हिस्सेदारी 34.6% थी, जो मार्च 2026 में घटकर सिर्फ 28.7% रह गई तो दूसरी तरफ टर्म डिपॉजिट्स की हिस्सेदारी इस दौरान 55.2% से बढ़कर 61.6% पर पहुंच गई। यह खुलासा आरबीआई की 'एनुअल बेसिक स्टेटिस्टिकल रिटर्न ऑन डिपॉजिट्स' रिपोर्ट हुआ है।

सेविंग्स अकाउंट में क्यों घट रही दिलचस्पी?

सेविंग्स अकाउंट में जमा पैसों पर ब्याज लगातार घट रहा है तो एफडी पर बैंक आकर्षक ब्याज दे रहे हैं। इसे ऐसे समझ सकते हैं कि पब्लिक सेक्टर में देश के सबसे बड़े बैंक SBI में सेविंग्स अकाउंट में जमा पैसों महज 2.5% की दर से ब्याज मिल रहा है। इसमें दस साल में करीब 6-7% से तेज गिरावट आई है। वहीं दूसरी तरफ SBI में एक साल की एफडी पर 6.25% और दो साल की एफडी पर 6.45% की दर से ब्याज मिल रहा है। ऐसी ही स्थिति HDFC Bank जैसे प्राइवेट बैंकों में भी है। जब सेविंग्स अकाउंट में डिपॉजिट रेट रिटेल इंफ्लेशन से कम हो तो सेविंग्स पर रियल रिटर्न निगेटिव हो जाता है, जिसकी वजह से आज आकर्षण फीका हो जाता है। अप्रैल महीने में रिटेल इंफ्लेशन 3.48% पर था। वैसे आरबीआई का टारगेट रेंज 2-6% है।


ये हैं आंकड़े

मार्च 2022 से मार्च 2026 के बीच बैंको में जमा पैसों में सेविंग्स डिपॉजिट्स की हिस्सेदारी 34.6% से तेजी से गिरकर 28.7% पर आ गई तो दूसरी तरफ इस दौरान टर्म डिपॉजिट्स की हिस्सेदारी 55.2% से बढ़कर 61.6 पर पहुंच गई। हालांकि खास बात ये है कि अभी भी बैंकों में अधिकतर पैसा आम लोगों का ही है और हाउसहोल्ड सेक्टर की बैंक के कुल डिपॉजिट्स में 59.3% हिस्सेदारी है। एक और अहम बात ये है कि नॉन-फाइनेंशियल सेक्टर की डिपॉजिट्स में हिस्सेदारी मार्च 2026 तिमाही के आखिर में सालाना आधार पर 17.7% से बढ़कर 18.5% पर पहुंच गई तो फाइनेंशियल कॉर्पोरेशन की हिस्सेदारी बढ़कर 6.8% से 7.8% पर पहुंच गई।

टर्म डिपॉजिट्स को लेकर आरबीआई की रिपोर्ट में एक खास बात ये सामने आई कि बड़े डिपॉजिट्स का दबदबा बना हुआ है। ₹1 करोड़ या इससे अधिक की जमा का कुल टर्म डिपॉजिट्स में हिस्सा 46.3% रहा और इसमें भी ₹5 करोड़ या इससे अधिक की जमा का हिस्सा 34.8% रहा। वहीं ₹5 लाख या इससे कम की जमा का कुल टर्म डिपॉजिट्स में हिस्सा 17.8% रहा।

टर्म डिपॉजिट्स के टेन्योर को लेकर रुझान में बदलाव दिखा है और 1 से 3 साल की मेच्योरिटी वाले टर्म डिपॉजिट्स की हिस्सेदारी कुल टर्म डिपॉजिट्स में मार्च 2022 में 50.4% से घटकर मार्च 2026 में 69.8% पर आ गई। वहीं दूसरी तरफ एक साल से कम के टर्म डिपॉजिट्स की हिस्सेदारी इस दौरान 16.7% से तेजी से घटकर 8.8% रह गई।

Repo Rate से क्या है कनेक्शन?

आरबीआई जब रेपो रेट बढ़ाता है तो इस बात की संभावना बढ़ जाती है कि बैंक डिपॉजिट्स पर ब्याज दरें बढ़ा सकता है। इसके अलावा अगर महंगाई बढ़ने की रफ्तार कम होती है और रेपो रेट अगर कम नहीं होता है तो बैंकों में डिपॉजिट्स पर अधिक ब्याज मिलता रहेगा यानी कि रियल रिटर्न मजबूत होगा।

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