नीति आयोग के सदस्य रमेश चंद ने 9 जुलाई को कहा कि अगर वाशिंगटन ने आनुवंशिक रूप से संशोधित संस्करणों को स्वीकार करने के लिए नहीं कहा होता तो भारत मिनी डील के तहत सोयाबीन और मक्का के आयात की अमेरिकी मांग पर सहमत हो जाता। आनुवंशिक रूप से संशोधित फसलों को देश में राजनीतिक रूप से संवेदनशील माना जाता है।
रमेश चंद ने नई दिल्ली में इंडियन चैंबर ऑफ कॉमर्स द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान कहा, "मेरा मानना है कि अगर सोयाबीन और मक्का आनुवंशिक रूप से संशोधित (जीएम) नहीं होते तो भारत संभवतः इस मिनी डील में अमेरिका से इनका आयात करने पर सहमत हो जाता।"
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने 7 जुलाई को कहा था कि भारत के साथ ट्रेड डील को अंतिम रूप दे दिया गया है, जबकि नई दिल्ली लगातार अपने इस रुख पर कायम है कि कृषि और डेयरी सेक्टर में अमेरिका को पहुंच प्रदान करना "लक्ष्मण रेखा" पार करने के समान होगा।
रमेश चंद ने इस कार्यक्रम के दौरान कहा, "मैं व्यक्तिगत रूप से जीएम के खिलाफ नहीं हूं, क्योंकि मैं जानता हूं कि इससे कोई नुकसान नहीं है... लेकिन किसानों का एक बड़ा वर्ग इसके खिलाफ है। इससे बातचीत मुश्किल हो जाती है।"
बता दें कि जीएम फसलें उन फसलों को कहा जाता है जिन्हें कीटों या रोगों के प्रति प्रतिरोधी बनाने या उनके पोषण क्षमता को बढ़ाने के लिए उनमें आनुवंशिक बदलाव किए जाते हैं।
रमेश चंद ने आगे कहा कि अमेरिका भारत का एग्री सेक्टर का सबसे बड़ा बाज़ार है। उन्होंने आगे कहा, "हमारे कृषि निर्यात का लगभग 10 प्रतिशत हिस्सा, जिसका मूल्य 5.5 अरब डॉलर है, अमेरिका को जाता है। झींगा, बासमती चावल और मछली भारत द्वारा अमेरिका को निर्यात किए जाने वाले प्रमुख उत्पाद हैं। इस मिनी डील में, हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि इनकी सुरक्षा हो।"
इस बीच सूत्रों ने बताया है कि अमेरिका-भारत मिनी डील पर बातचीत हो चुकी है और इस सप्ताह कभी भी इसकी घोषणा की जा सकती है। एक सूत्र ने सोमवार को मनीकंट्रोल को बताया कि समझौते के कस्टम वाले हिस्से (दोनों देशों के बीच ट्रेड की जाने वाली वस्तुओं पर टैरिफ दरों) पर बातचीत हो चुकी है। हालांकि, भारत में जीएम फसलों की अनुमति और देश के डेयरी सेक्टर तक अमेरिकी पहुंच जैसे विवादास्पद मुद्दों को संभवतः समझौते से बाहर रखा गया है।
अमेरिका भारत में GM (genetically modified) सोयाबीन और मक्का के आयात की मांग करता रहा है। 2020 में, अमेरिका में उगाए गए 94 फीसदी सोयाबीन और 92 फीसदी मक्का जेनेटिकली मॉडीफाई किए गए थे।
जीएम फसलें भारतीय किसानों के लिए एक संवेदनशील मुद्दा हैं। जब भारत ने 2002 में पहली बार बीटी कपास की खेती को मंज़ूरी दी थी, तो किसानों, खासकर कर्नाटक जैसे बड़े उत्पादक राज्यों के किसानों ने इसका विरोध किया था।
भारतीय किसान जीएम फसलों को लेकर चिंतित हैं क्योंकि इनसे जन स्वास्थ्य और उनकी आय पर प्रभाव पड़ सकते हैं। कंपाउंड फीड मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन (CLFMA)के अध्यक्ष दिव्य कुमार गुलाटी ने कहा, "बीटी कॉटन (भारत की एकमात्र व्यापक रूप से स्वीकृत जीएम फसल) के साथ मिले-जुले अनुभव रहे हैं। कुछ किसानों को इससे लाभ हुआ है। जबकि कुछ किसानों को बढ़ती लागत और कीट प्रतिरोध जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ा।"
गुलाटी ने कहा, "ऐसी चिंताएं हैं कि जीएम बीज (अक्सर पेटेंट वाले) लार्ज एग्री बिजनेस पर निर्भरता बढ़ा सकते हैं। जीएम बीज अक्सर दोबारा इस्तेमाल नहीं किए जा सकते, यानी किसानों को पारंपरिक तरीकों के विपरीत, हर मौसम में नए बीज खरीदने पड़ते हैं। छोटे और सीमांत किसानों को इन बीजों को खरीदने में मुश्किल हो सकती है या अप्रत्याशित परिस्थितियों में फसल खराब होने पर नुकसान उठाना पड़ सकता है।"
इस बीच रमेश चंद ने आगे कहा कि आयात को रोकने का सबसे अच्छा तरीका उत्पादकता में सुधार करना है। "अगर आप उत्पादकता बढ़ाते हैं, तो आपको आयात करने की ज़रूरत ही नहीं पड़ेगी। हमने पिछले कुछ सालों में चावल और गेहूं की उत्पादकता बढ़ाई है, और अब हम इन फसलों के नेट एक्सपोर्टर हैं।"
उन्होंने आगे कहा कि , "हम कपास के भी नेट एक्सपोर्टर थे, लेकिन 2015-16 के बाद कपास में तकनीकी प्रगति रुक गई, जिससे हमें आयातक बनना पड़ा। उत्पादकता बढ़ाकर ही हम आयात को रोक सकते हैं।"
हिंदी में शेयर बाजार, स्टॉक मार्केट न्यूज़, बिजनेस न्यूज़, पर्सनल फाइनेंस और अन्य देश से जुड़ी खबरें सबसे पहले मनीकंट्रोल हिंदी पर पढ़ें. डेली मार्केट अपडेट के लिए Moneycontrol App डाउनलोड करें।