अप्रैल 2026 में भारत की ओर से रूसी तेल की खरीद 15 प्रतिशत घटकर 4.5 अरब यूरो (5.27 अरब डॉलर) रह गई। भारतीय करेंसी में यह अमाउंट 504.80 अरब रुपये होता है। मार्च महीने में भारत ने 5.3 अरब यूरो (6.26 अरब डॉलर) का रूसी तेल खरीदा था। यह बात हेलसिंकी स्थित थिंक-टैंक सेंटर फॉर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर (CREA) के ताजा आंकड़ों से सामने आई है। रूसी तेल के आयात में यह कमी नायरा एनर्जी की वाडिनार रिफाइनरी की ओर से तेल की कम खरीद के कारण हुई। यह रिफाइनरी 9 अप्रैल से रखरखाव (maintenance) से जुड़े काम के लिए बंद है।
खरीद घटने के बावजूद भारत, रूस से तेल खरीदने वाला दूसरा सबसे बड़ा देश बना रहा। थिंक-टैंक के मुताबिक, "रिफाइनरियों की ओर से रूसी कच्चे तेल की अनलोडिंग में काफी बदलाव आया। वाडिनार रिफाइनरी का आयात लगभग 92 प्रतिशत और जामनगर रिफाइनरी का आयात 38 प्रतिशत कम हो गया। सरकार के मालिकाना हक वाली इंडियन ऑयल की वाडिनार रिफाइनरी का आयात 87 प्रतिशत बढ़ गया।"
थिंक-टैंक ने आगे कहा, "नायरा एनर्जी की वाडिनार रिफाइनरी के रूसी कच्चे तेल के आयात में गिरावट का मुख्य कारण 9 अप्रैल 2026 से शुरू हुआ रखरखाव से जुड़ा शटडाउन था। यह रिफाइनरी पूरी तरह से रूसी कच्चे माल (feedstock) पर ही चलती है।" आंकड़ों से पता चलता है कि सरकारी स्वामित्व वाली मैंगलोर रिफाइनरी एंड पेट्रोकेमिकल्स लिमिटेड (MRPL) की न्यू मैंगलोर स्थित और हिंदुस्तान पेट्रोलियम एंड कॉरपोरेशन लिमिटेड (HPCL) की विशाखापत्तनम स्थित रिफाइनरियों ने नवंबर 2025 के अंत में रूसी तेल का आयात बंद कर दिया था। लेकिन मार्च 2026 में खरीद फिर से शुरू हो गई और अप्रैल में भी जारी रही। इस दौरान विशाखापत्तनम का रूसी तेल आयात मार्च महीने की तुलना में 149 प्रतिशत बढ़ गया।
अभी 16 मई तक है रूसी तेल खरीदने की छूट
रूस से तेल खरीद को लेकर अमेरिका ने 16 मई 2026 तक छूट दी हुई है। एनालिस्ट्स का कहना है कि अगर इस छूट की यह समय सीमा आगे नहीं बढ़ाई गई, तो भारतीय रिफाइनरियों को रूसी तेल से मुंह मोड़ना पड़ सकता है। हालांकि भारत ने कभी भी रूसी तेल खरीदना बंद नहीं किया है, लेकिन अमेरिकी छूट के कारण देशों को रोसनेफ्ट (Rosneft) और लुकोइल (Lukoil) जैसी प्रतिबंधित संस्थाओं से भी तेल खरीदने की अनुमति मिल गई थी।
भारत रूसी जीवाश्म ईंधन का दूसरा सबसे बड़ा खरीदार
CREA के आंकड़ों के अनुसार, अप्रैल महीने में भी भारत रूसी जीवाश्म ईंधन (fossil-fuels) खरीदने वाला दूसरा सबसे बड़ा देश रहा। भारत ने कुल 5 अरब यूरो (5.86 अरब डॉलर) का रूसी हाइड्रोकार्बन आयात किया। भारत की कुल खरीद में कच्चे तेल की हिस्सेदारी 90 प्रतिशत थी, जिसका कुल मूल्य 4.5 अरब यूरो था। इसके बाद कोयले का स्थान रहा, जिसका आयात 29.7 करोड़ यूरो (34.78 करोड़ डॉलर) का था। फिर तेल उत्पादों का स्थान रहा, जिनका आयात 20.9 करोड़ यूरो (24.47 करोड़ डॉलर) का रहा।
अप्रैल 2026 में रूस के यूराल क्रूड की औसत कीमत मार्च महीने के मुकाबले 19 प्रतिशत बढ़कर 112.3 डॉलर प्रति बैरल हो गई। यह कीमत EU और UK की नई प्राइस कैप (44.1 डॉलर प्रति बैरल) से दोगुनी से भी ज्यादा थी। यह नई कैप 1 फरवरी 2026 से लागू हुई थी।