Explainer: अमेरिकी प्रतिबंध के बीच रूस से ऑयल खरीदने के लिए इंडिया क्या रास्ता अपना सकता है?

रूस पर अमेरिका के प्रतिबंध लगा देने के बाद रूस को ऑयल की कीमत डॉलर में चुकाना मुमकिन नहीं है। ऐसे में इंडिया रुपया-रूबल में डील के रास्ते तलाश रहा है। इसका मतलब है कि इंडिया रूस से ऑयल खरीदने के लिए रुपया का इस्तेमाल करना चाहता है

अपडेटेड Mar 17, 2022 पर 5:58 PM
इंडिया रूस से ऑयल खरीदने के लिए रुपया का इस्तेमाल करना चाहता है। सुनने में यह आसान लगता है, लेकिन इसमें कई व्यवहारिक दिक्कतें हैं।

रूस (Russia) ने इंडिया को बहुत सस्ता रेट पर ऑयल खरीदने का ऑफर दिया है। दरअसल, रूस इंडिया का बहुत पुराना साथी है। इंडिया ने भी यूक्रेन-रूस की लड़ाई (Ukraine-Russia Crisis) में अपना स्टैंड न्यूट्रल रखा है। इंडिया रूस से सस्ता ऑयल खरीदकर अपना इंपोर्ट बिल (India's Import Bill) घटा सकता है। यह ऐसे समय में इंडिया के लिए बहुत मायने रखता है, जब क्रूड की कीमत 100 डॉलर प्रति बैरल है। उधर, अपनी इकोनॉमी को सहारा देने के लिए रूस को भी पैसा चाहिए। सवाल है कि इंडिया रूस से ऑयल खरीदने के लिए क्या रास्ता अपना सकता है?

ज्यादातर ग्लोबल ट्रेड डॉलर में होता है

आज दुनिया में ज्यादातर व्यापार डॉलर में होता है। आप डॉलर की अहमियत का अंदाजा इस बात से लगा सकते हैं कि इंडिया अमेरिका से सिर्फ 5 फीसदी ऑयल खरीदता है, लेकिन 85 फीसदी ऑयल का पेमेंट डॉलर में करता है। इसका मतलब है कि डॉलर में होने वाले सभी ट्रांजेक्शन अमेरिका में किसी बैंक के माध्यम से होते हैं।


इंडिया रुपया में पेमेंट करना चाहता है

यह भी पढ़ें : Sensex 8 सत्र में 5000 अंक चढ़ा, इनवेस्टर्स की वेल्थ 19 लाख करोड़ रुपये बढ़ी

रूस पर अमेरिका के प्रतिबंध लगा देने के बाद रूस को ऑयल की कीमत डॉलर में चुकाना मुमकिन नहीं है। ऐसे में इंडिया रुपया-रूबल में डील के रास्ते तलाश रहा है। इसका मतलब है कि इंडिया रूस से ऑयल खरीदने के लिए रुपया का इस्तेमाल करना चाहता है। सुनने में यह आसान लगता है, लेकिन इसमें कई व्यवहारिक दिक्कतें हैं।

क्या होगा पेमेंट का तरीका?

रुपया-रूबल ट्रेड के लिए इंडिया को रूस के किसी बैंक में अकाउंट खोलना होगा। उसी तरह रूस के किसी बैंक को इंडिया में अकाउंट खोलना होगा। इंडिया को रूस में अपने अकाउंट में पर्याप्त रूबल रखना होगा। यही काम रूस इंडिया में करेगा। असल में यह 1950 के दशक के व्यापार के मॉडल की तरह है। कई सालों तक सोवियत संघ और इंडिया ने इस मॉडल का इस्तेमाल आपसी व्यापार के लिए किया था।

रुपया में पेमेंट करने में क्या है दिक्कत?

अब इस मॉडल की दिक्कत के बारे में जानते हैं। आज ज्यादातर ट्रेड डॉलर में होता है। हर करेंसी की वैल्यू डॉलर में आंकी जाती है। हम आम तौर पर कहते हैं रुपया डॉलर के मुकाबले कमजोर हुआ है। रूबल डॉलर के मुकाबले मजबूत हुआ है। दरअसल दुनिया के कई देशों की करेंसी का एक-दूसरे से सीधा संबंध नहीं है। अंदाजा लगाइए कि अगर दुनिया के 190 देशों की करेंसी के मुकाबले रुपया की वैल्यू निकालनी हो तो हमे क्या करना होगा? ऐसा करना बहुत मुश्किल होगा। डॉलर इसी प्रॉब्लम को सॉल्व करता है।

दरअसल, असली मुश्किल एक्सचेंज रेट का निर्धारण है। जैसे एक रूबल हासिल करने के लिए हमें कितने रुपये खर्च करने होंगे। अगर हम रूस से ऑयल खरीदना चाहते हैं तो हमें इस मुश्किल का हल निकालना होगा। यह खासकर तब और मुश्किल हो गया है, जब डॉलर के मुकाबले रूबल की 30 फीसदी गिर गई है।

दूसरी प्रॉब्लम ट्रेंड इंबैलेंस का है। अगर इंडिया रूस से ज्यादा ऑयल इंपोर्ट करता है तो रूस के पास बहुत ज्यादा रुपया जमा हो जाएगा। वह इस रुपये का क्या करेगा? क्योंकि इंटरनेशनल ट्रेड में रुपया का इस्तेमाल नहीं होता है। उदाहरण के लिए अगर रूस चीन से मशीनरी खरीदना चाहता है तो चीन रुपया में पेमेंट नहीं लेगा। रूस के पास बहुत ज्यादा रुपया जमा होना एक वजह है, जिसके चलते 1950 के दशक का व्यापर मॉडल फेल हो गया था।

अमेरिका की नाराजगी का भी डर

आखिर में, रूस से इंडिया के ऑयल खरीदने से अमेरिकी प्रतिबंध के उल्लंघन का भी डर है। अगर रूस रूबल और रुपया में डील के लिए तैयार हो भी जाता है तो अमेरिका इंडिया को निशान बना सकता है। इसलिए अभी इंडिया और रूस ऑयल की डील के लिए रास्ता तलाशने की कोशिश कर रहे हैं। इसमें थोड़ा समय लग सकता है।

हिंदी में शेयर बाजार स्टॉक मार्केट न्यूज़,  बिजनेस न्यूज़,  पर्सनल फाइनेंस और अन्य देश से जुड़ी खबरें सबसे पहले मनीकंट्रोल हिंदी पर पढ़ें. डेली मार्केट अपडेट के लिए Moneycontrol App  डाउनलोड करें।