पहला कदम में आज हम जानेंगे किसी भी कंपनी के शेयर को खरीदते वक्त किन बातों का ख्याल रखना जरुरी है।
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अपडेटेड Jul 09, 2016 पर 2:22 PM
सीएनबीसी आवाज़ की फाइनेंशियल लिटरेसी की मुहिम पहला कदम में इन दिनों हम बात कर रहे हैं शेयर बाजार में निवेश की। उम्मीद है हमारे आपको अपने कई सवालों के जवाब मिल गए होंगे। अगर फिर भी आपके जेहन में कुछ सवाल उठ रहे हों तो आप हमें सवाल भेज सकते हैं हमारी वेबसाइट pehla kadam.in पर या फिर आप पहला कदम के फेसबुक पेज पर भी हमें लिख सकते हैं साथ ही हमें एसएमएस के जरिए अपना संदेश पहुंचा सकते हैं। आज हम बात कर रहे हैं कि किसी भी कंपनी के शेयर को खरीदते वक्त कौन - कौन सी, किन बातों का ख्याल रखे और इस पर आपको सलाह देंगे सीएनबीसी-आवाज़ के मार्केट एडिटर अनिल सिंघवी।
कैसे करें स्टॉक एनालिसिस
स्टॉक एनालिसिस के 2 तरीके होते है, एक फंडामेंटल एनालिसिस और दूसरा टेक्निकल एनालिसिस। कंपनी के ट्रैक रिकॉर्ड के आधार पर भविष्य का अनुमान फंडामेंटल एनालिसिस के जरिए होता है। फंडामेंटल एनालिसिस में कंपनी के फाइनेंशियल के आधार पर शेयर के आगे के परफॉर्मेंस का अंदाजा लगाया जाता है। वहीं टेक्निकल एनालिसिस में कंपनी के फाइनेंशियल्स से कोई लेना-देना नहीं होता है। टेक्निकल एनालिसिस में शेयर के परफॉर्मेंस के आधार पर उसकी आगे की चाल का अनुमान लगाया जाता है। टेक्निकल एनालिसिस में शेयर परफॉर्मेंस और उसके वॉल्यूम का एनालिसिस किया जाता है
फंडामेंटल एनालिसिस के तरीके
फंडामेंटल एनालिसिस के भी 2 तरीके होते है पहला टॉप-डाउन अप्रोच और दूसरा बॉटम-अप अप्रोच। टॉप डाउन अप्रोच में देश की इकोनॉमी की हालत देखी जाती है। अलग-अलग सेक्टर की स्थिति का एनालिसिस किया जाता है। खास सेक्टर की अलग-अलग कंपनियों की हालत देखी जाती है और फिर किसी एक कंपनी का चुनाव किया जाता है। इसमें चुनी गई कंपनी का कारोबार और उसके फाइनेंशियल्स का एनालिसिस किया जाता है।
बॉटम-अप एप्रोच में किसी एक कंपनी का चुनाव किया जाता है और उस कंपनी के कारोबार और फाइनेंशियल्स का एनालिसिस किया जाता है। सेक्टर की हालत देखी जाती है और देश की इकोनॉमी का विश्लेषण किया जाता है। आखिर में ग्लोबल इकोनॉमी को देखा जाता है। अगर देश में ही निवेश करना है तो फंडामेंटल एनालिसिस में बॉटम-अप एप्रोच बेहतर होता है। और अगर विदेशी बाजार में निवेश करना है तो टॉप-डाउन एप्रोच ठीक रहता है।
देशी निवेशकों को कंपनियों के परफॉर्मेंस पर ही ध्यान देना चाहिए। कंपनियों के प्रॉफिट, मार्जिन, सेल्स और तिमाही नतीजों के आधार पर अनुमान लगाना चाहिए। कंपनियों के फाइनेंशियल डाटा एक्सचेंज की साइट्स पर मिल जाते हैं।
प्रोजेक्शन क्या है?
कंपनी की बैलेंसशीट, प्रॉफिट और लॉस अकाउंट, कैश-फ्लो के आधार पर आगे के अनुमान को प्रोजेक्शन कहते हैं। प्रोजेक्शन के लिए कैश फ्लो जानना जरूरी है। अगर बैलेंसशीट में कैश फ्लो दिखता है तो उस कंपनी के फंडामेंटल अच्छे माने जा सकते हैं। एक ही सेक्टर कंपनियों के बीच तुलना में उनका साइज जानना जरूरी है। तुलना तिमाही दर तिमाही और साल दर साल होनी चाहिए।
बैलेंस शीट क्या है?
बैलेंस शीट किसी एक खास दिन के लिए तैयार की जाती है। बैलेंस शीट में बायीं ओर लायबिलिटी और दायीं ओर एसेट्स का कॉलम होता है। लायबिलिटी में शेयर कैपिटल, रिजर्व सरप्लस, करेंट लायबिलिटी और लॉन्ग टर्म लायबिलिटी शामिल होते हैं। एसेट्स में फिक्स एसेट, करेंट एसेट, प्रॉफिट और लॉस शामिल होते हैं। बैलेंस शीट से कंपनी की हालत का पता चलता है। प्रॉफिट और लॉस में एक तरफ खर्च और दूसरी ओर इनकम दर्ज होती है। तो कैश फ्लो कंपनी में कैश की आवाजाही की स्थिति बताता है। कैश फ्लो में देखना चाहिए कि कंपनी के देनदार कितने वक्त में पैसा लौटा रहे हैं।
रेशियो कैसे समझें?
रेशियो किसी भी कंपनी की तुलना करने का एक तरीका है। रेशियो कई तरह के होते हैं।
1. ऑपरेटिंग-प्रॉफिट रेशियो - कंपनी के बेसिक कामकाज की स्थिति को ऑपरेटिंग प्रॉफिट से समझ सकते हैं। ऑपरेटिंग प्रॉफिट को सेल्स से डिवाइड करने पर ऑपरेटिंग प्रॉफिट रेशियो निकलता है। ट्रेडिंग वाली कंपनियों का ऑपरेटिंग - प्रॉफिट रेशियो कम होता है। मैन्यूफेक्चरिंग कंपनियों का ऑपरेटिंग-प्रॉफिट रेशियो ज्यादा होता है। ज्यादा ऑपरेटिंग-प्रॉफिट रेशियो कंपनी की अपने कारोबार पर पकड़ को दिखाता है।
2. नेट-प्रॉफिट रेशियो- प्रॉफिट-लॉस अकाउंट में नेट- प्रॉफिट को सेल्स से डिवाइड करके ये रेशियो निकलता है। टैक्स, ब्याज और डेप्रिसिएशन को घटाकर नेट-प्रॉफिट आता है।
3. डेट-टू-इक्विटी रेशियो- डेट को इक्विटी से डिवाइड करने पर ये रेशियो निकलता है। ज्यादा डेट-इक्विटी रेशियो खराब माना जाता है।
4. इंट्रेस्ट सर्विस कवरेज रेशियो- ब्याज की रकम मुकाबले कमाई को इंटरेस्ट सर्विस कवरेज रेश्यो कहते हैं। कर्ज पर ब्याज चुकाने की क्षमता कितनी है, ये इंटरेस्ट सर्विस रेश्यो बताता है। जितना कवरेज रेश्यो ज्यादा होगा, कंपनी उतनी अच्छी होगी।
ईपीएस का मतलब?
ईपीएस, अर्निंग पर शेयर यानि प्रति शेयर आय को कहते हैं। किसी कंपनी के नेट प्रॉफिट को उसके शेयरों की संख्या से डिवाइड करके ईपीएस निकाला जाता है। ईपीएस से किसी कंपनी की प्रति शेयर कमाई का पता चलता है
पी/ई रेश्यो किसे कहते हैं?
शेयर के बाजार भाव के मुकाबले प्रति शेयर आय को पी/ई रेश्यो कहा जाता है। हर शेयर का पी/ई रेश्यो अलग अलग होता है। ज्यादा पी/ई रेश्यो वाले शेयर पर बाजार का भरोसा ज्यादा होता है। कमोडिटी वाली कंपनियों का पी/ई रेश्यो कम होता है। आईटी और हाई ग्रोथ वाली कंपनियों के शेयर का पी/ई रेश्यो ज्यादा होता है। ज्यादा पी/ई रेश्यो वाले शेयर महंगे होते हैं। कम पी/ई रेश्यो वाले शेयर सस्ते होते हैं
प्राइस टू बुक वैल्यू
पिछले परफॉर्मेंस के आधार पर कंपनी की मौजूदा वैल्यू, बुक वैल्यू कहलाती है। बुक वैल्यू में पुराने एसेट्स भी शामिल होते हैं। कई निवेशक बुक वैल्यू के आधार पर ही शेयर खरीदते हैं। बैंकिंग शेयरों का भाव अक्सर बुक वैल्यू से तय होता है। शेयर की मार्केट प्राइस को बुक वैल्यू से डिवाइड करके प्राइस टू बुक वैल्यू निकलती है
डिविडेंड यील्ड
आम निवेशक की कमाई शेयर के दाम बढ़ने और डिविडेंड से होती है। डिविडेंड कंपनी के परफॉर्मेंस को दिखाता है। डिविडेंड को शेयर के बाजार भाव से डिवाइड करके डिविडेंड यील्ड निकलता है। नियमित तौर पर 4-5 फीसदी सालाना डिविडेंड देने वाली कंपनी अच्छी मानी जाती है।
बुक बिल्डिंग प्रोसेस क्या है?
किसी भी कंपनी की लिस्टिंग या डीलिस्टिंग बुक बिल्डिंग प्रोसेस से ही होती है। शेयर लिस्टिंग के वक्त उसका एक प्राइस बैंड तय होता है। बुक बिल्डिंग प्रोसेस में लोग अलग अलग प्राइस पर शेयर एप्लीकेशन लगाते हैं। डीलिस्टिंग के वक्त भी शेयर टेंडर करने की एक प्राइस तय की जाती है
पेड-अप कैपिटल किसे कहते हैं?
शेयरों के जरिए जो पैसा कंपनी के पास जमा होता है उसे पेड-अप कैपिटल कहा जाता है।