TCS ने टाटा समूह की सबसे प्रॉफिटेबल कंपनी का ताज गंवाया, जानिए किसने ली जगह

टाटा स्टील की स्थिति में सिर्फ पांच साल में बड़ा बदलाव आया है। पांच साल पहले कंपनी लॉस उठा रही थी। उस पर कर्ज का बोझ बहुत बढ़ गया था। कमोडिटी की कीमतों में आई गिरावट ने कंपनी की हालत और खस्ती कर दी थी

अपडेटेड Apr 20, 2022 पर 11:08 AM
टीसीएस लंबे समय से टाटा समूह की दुधारू गाय रही है। टाटा समूह के रेवेन्यू में इसकी सबसे ज्यादा हिस्सेदारी रही है। टाटा समूह को पिछले साल टीसीएस से करीब 22,500 करोड़ रुपये मिले थे।

टीसीएस (TCS) से करीब आधा दशक के बाद टाटा समूह की सबसे मूल्यवान कंपनी का ताज छिन गया है। इस समूह की सबसे पुरानी कंपनी टाटा स्टील (Tata Steel) ने TCS की जगह ले ली है। टीसीएस टाटा समूह की सबसे ज्यादा कमाई वाली कंपनी भी रही है।

पिछले वित्त वर्ष की पहली तीन तिमाही में टाटा स्टील ने 31,914 करोड़ रुपये का प्रॉफिट कमाया है। यह टीसीएस के 28,490 करोड़ रुपये के प्रॉफिट के मुकाबले ज्यादा है। इस ट्रेंड के आगे भी जारी रहने की उम्मीद है। टाटा स्टील के बोर्ड की बैठक 3 मई को होने वाली है। इसमें कंपनी के कंसॉलिडेटेड रिजल्ट पर विचार होगा। कंपनी का बोर्ड डिविडेंड का एलान कर सकता है। मीटिंग में शेयर स्पिल्ट पर भी फैसला हो सकता है।

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टाटा स्टील की स्थिति में सिर्फ पांच साल में बड़ा बदलाव आया है। पांच साल पहले कंपनी लॉस उठा रही थी। उस पर कर्ज का बोझ बहुत बढ़ गया था। कमोडिटी की कीमतों में आई गिरावट ने कंपनी की हालत और खस्ती कर दी थी। लेकिन, अब वह टाटा समूह की सबसे मूल्यवान कंपनी बन गई है। इसका श्रेय टाटा स्टील के एमडी टीवी नरेंद्रन को जाता है। उनकी नियुक्ति टाटा संस के पूर्व चेयरमैन साइरस मिस्त्री ने की थी। वह मिस्त्री द्वारा नियुक्त होने वाले एकमात्र एग्जिक्यूटिव हैं, जो अब भी टाटा समूह के साथ हैं।

नरेंद्रन ने न सिर्फ टाटा स्टील के घरेलू कारोबार को मुनाफे में लाया है बल्कि उन्होंने कंपनी के यूरोपीय कारोबार में भी बड़ा सुधार लाया है। खास बात यह है कि टाटा स्टील ऐसे वक्त समूह की ताज बन गई है, जब टाटा ग्रुप का जोर डिजिटल बिजनेस पर है। इससे यह साफ हो गया है कि भले ही प्रॉफिट के लिए कंपनियां वर्चुअल वर्ल्ड पर ज्यादा दांव लगा रही हैं, लेकिन ओल्ड इकोनॉमी कंपनियों की अहमियत खत्म होने वाली नहीं है। इसकी वजह यह है कि अब भी कंज्यूमर को वास्तविक जिंदगी में बुनियादी चीजों की सबसे ज्यादा जरूरत है।

टाटा स्टील ने जो उदाहरण पेश किया है, वह कंपनियों की टॉप लीडरशिप को अपनी स्ट्रैटेजी पर फिर से विचार करने को मजबूर कर सकता है। टाटा समूह के चेयरमैन नटराजन चंद्रशेखर को भी यह बात दिमाग में रखनी होगी। खासकर तब जब वह टाटा समूह के फ्यूचर का रोडमैप तैयार कर रहे हैं। टाटा समूह देश का सबसे बड़ा कॉर्पोरेट हाउस है। इसमें करीब तीन दर्जन सूचीबद्ध कंपनियां शामिल हैं।

टीसीएस लंबे समय से टाटा समूह की दुधारू गाय रही है। टाटा समूह के रेवेन्यू में इसकी सबसे ज्यादा हिस्सेदारी रही है। टाटा समूह को पिछले साल टीसीएस से करीब 22,500 करोड़ रुपये मिले थे। 11,371 करोड़ रुपये डिविडेंड के रूप में मिले थे। बाकी 11,121 करोड़ रुपये टीसीएस के अपने शेयरों को बायबैक करने से मिले थे।

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