टाइगर ग्लोबल मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर टैक्स डिपार्टमेंट ने स्पष्टीकरण पेश किया, कहा-सभी विवाद को टैक्स टेररिज्म नहीं माना जा सकता

सुप्रीम कोर्ट ने 15 जनवरी को कहा था कि अमेरिकी इनवेस्टमेंट फर्म (टाइगर ग्लोबल) को फ्लिपकार्ट में हिस्सेदारी बेचने से जो कैपिटल गेंस हुआ, उस पर इंडिया के कानून के तहत टैक्स लगेगा। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले को पलट दिया

अपडेटेड Jan 17, 2026 पर 4:05 PM
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टाइगर ग्लोबल ने 2011 और 2015 के बीच फ्लिपकार्ट में निवेश किया था।

टैक्स डिपार्टमेंट के सूत्रों ने कहा है कि टैक्स कानूनों का अलग-अलग मतलब निकालने से होने वाले सभी विवादों को 'टैक्स टेररिज्म' नहीं माना जाना चाहिए। टाइगर ग्लोबल मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद की चिंता पर यह बात कही गई है। सेंट्रल बोर्ड ऑफ डायरेक्ट टैक्सेज (सीबीडीटी) के अधिकारियों ने नाम जाहिर नहीं करने की शर्त पर बताया कि कानून के क्षेत्र में लॉ का अलग-अलग मतलब निकालने से कई तरह के मतभेद पैदा होते हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले को पलटा

सुप्रीम कोर्ट ने 15 जनवरी को कहा था कि अमेरिकी इनवेस्टमेंट फर्म (टाइगर ग्लोबल) को फ्लिपकार्ट में हिस्सेदारी बेचने से जो कैपिटल गेंस हुआ, उस पर इंडिया के कानून के तहत टैक्स लगेगा। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले को पलट दिया। दिल्ली हाईकोर्ट ने 2024 में इस मामले में टाइगर ग्लोबल की दलील को सही माना था कि ट्रांजेक्शन पर उसे टैक्स चुकाने की जरूरत नहीं है।


टाइगर ग्लोबल ने 2011-2015 के बीच फ्लिपकार्ट में निवेश किया था

टाइगर ग्लोबल ने 2011 और 2015 के बीच फ्लिपकार्ट में निवेश किया था। उसने मॉरीशस स्थिति अपनी कई सब्सिडियरी के जरिए यह निवेश किया था। वॉलमार्ट के फ्लिपकार्ट में 16 अरब डॉलर में नियंत्रणयोग्य हिस्सेदारी खरीदने के बाद टाइगर ग्लोबल ने 2018 में फ्लिपकार्ट में अपनी हिस्सेदारी बेच दी थी।

टाइगर ग्लोबल की दलील थी कि उसे टैक्स चुकाने की जरूरत नहीं

टाइगर ग्लोबल की दलील थी इस ट्रांजेक्शन को कैपिटल गेंस टैक्स से छूट हासिल है, क्योंकि फ्लिपकार्ट में यह निवेश 1 अप्रैल, 2017 से पहले हुआ था, जब इंडिया और मॉरीशस के बीच डबल टैक्सेशन अवाॉयडेंस एग्रीमेंट (DTAA) के तहत इंडिया में कैपिटल गेंस पर टैक्स नहीं लगता था। इसके लिए एग्रीमेंट में कुछ शर्तें थीं।

डील की वैल्यू की वजह से ज्यादा था टैक्स का अमाउंट

सूत्रों ने यह भी स्पष्ट किया कि टैक्स का अमाउंट इसलिए ज्यादा है, क्योंकि ट्राजेक्शंस की वैल्यू ज्यादा है। टैक्स अमाउंट ज्यादा होने की वजह टैक्स डिपार्टमेंट का एग्रेसिव एक्शन नहीं है। सीबीडीटी के अधिकारियों ने कहा कि बड़े ट्राजेक्शंस में टैक्स अमाउंट का ज्यादा स्वाभाविक है। ऐसे मामलों में पेंडिंग डिमांड्स और विदहेल्ड रिफंड्स को डिपार्टमेंट का मनमाना एक्शन नहीं माना जाना चाहिए।

टैक्स डिपार्टमेंट ने रिफंड के क्लेम को रोक लिया था

इस मामले में चल रही प्रोसिडिंग्स को देखते हुए इनकम टैक्स डिपार्टमेंट ने 967.52 करोड़ रुपये के रिफंड के क्लेम को रोक लिया। इस मामले में एसेसमेंट प्रोसेस कानूनी विवाद के निपटारे से जुड़ा था। असल विवाद डीटीएए को लेकर था। अधिकारियों ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले में जस्टिस जेबी पारदीवाला ने इस बात पर जोर दिया है कि किसी देश को अपने टैक्स बेस की सुरक्षा करने की जरूरत है।

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सुप्रीम कोर्ट ने देश की आर्थिक और वित्तीय संप्रभुता को सही माना

उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले में एक आधुनिक देश की आर्थिक और वित्तीय संप्रभुता को स्वीकार किया गया है। साथ ही पब्लिक रेवेन्यू की सुरक्षा में देश की दिलचस्पी को भी सही माना गया है। अधिकारियों ने यह भी स्पष्ट किया कि उनकी तरफ से किसी तरह की देर नहीं है, क्योंकि यह मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचने से पहले कई मंचों से गुजरा है।

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