दिल्ली का असली बॉस कौन? अधिकारियों की ट्रांसफर-पोस्टिंग के ऑर्डर पर SC ने सुनाया अहम फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने प्रशासनिक सेवाओं पर नियंत्रण के लिए दिल्ली सरकार के पक्ष में फैसला सुनाया है। शीर्ष अदालत ने माना कि नौकरशाहों पर दिल्ली सरकार का ही नियंत्रण होना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने कहा कि पुलिस, पब्लिक आर्डर और लैंड संबंधित शक्तियां केंद्र के पास होगी

अपडेटेड May 11, 2023 पर 12:46 PM
Delhi govt vs LG issue: राष्ट्रीय राजधानी में सिविल सेवकों के तबादलों और पोस्टिंग पर प्रशासनिक नियंत्रण को लेकर केंद्र और दिल्ली सरकार के बीच विवाद था

Delhi govt vs LG issue: सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने राष्ट्रीय राजधानी में प्रशासनिक सेवाओं पर नियंत्रण को लेकर केंद्र और दिल्ली सरकार के बीच जारी विवाद पर अपना अहम फैसला सुना दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने प्रशासनिक सेवाओं पर नियंत्रण के लिए दिल्ली सरकार के पक्ष में फैसला सुनाया है। शीर्ष अदालत ने माना है कि नौकरशाहों पर दिल्ली सरकार का ही नियंत्रण होना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने कहा कि पुलिस, पब्लिक आर्डर और लैंड संबंधित शक्तियां केंद्र के पास होगी। शीर्ष अदालत ने दिल्ली सरकार को लैंड, कानून-व्यवस्था और पुलिस के क्षेत्रों को छोड़कर अन्य सेवाओं और IAS अधिकारियों पर नियंत्रण रखने का आदेश दिया है।

दिल्ली में अधिकारियों के ट्रांसफर-पोस्टिंग के अधिकार को लेकर विवाद पर सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को दिल्ली सरकार के पक्ष में फैसला सुनाते हुए कहा कि अफसरों की पोस्टिंग और ट्रांसफर का अधिकार दिल्ली सरकार के पास होगा। कोर्ट ने कहा कि एलजी कोई भी फैसला लेने से पहले दिल्ली सरकार से सलाह जरूर लें।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सेवाओं पर नियंत्रण सार्वजनिक व्यवस्था, पुलिस और भूमि से संबंधित प्रविष्टियों तक नहीं होगा। दिल्ली सरकार अन्य राज्यों की तरह प्रतिनिधि रूप का प्रतिनिधित्व करती है और संघ की शक्ति का कोई और विस्तार संवैधानिक योजना के विपरीत होगा।


सर्वोच्च न्यायालय का मानना है कि यदि प्रशासनिक सेवाओं को विधायी और कार्यकारी डोमेन से बाहर रखा जाता है, तो मंत्रियों को उन सिविल सेवकों को नियंत्रित करने से बाहर रखा जाएगा जिन्हें कार्यकारी निर्णयों को लागू करना है।

सर्वोच्च न्यायालय ने कहा है कि राज्यों के पास भी शक्ति है लेकिन राज्य की कार्यकारी शक्ति संघ के मौजूदा कानून के अधीन है। यह सुनिश्चित करना होगा कि राज्यों का शासन संघ द्वारा अपने हाथ में न ले लिया जाए।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि राज्यों के पास भी शक्ति है लेकिन राज्य की कार्यकारी शक्ति संघ के मौजूदा कानून के अधीन है। यह सुनिश्चित करना होगा कि राज्यों का शासन संघ द्वारा अपने हाथ में न ले लिया जाए। फैसला सुनाने से पहले सीजेआई कहा कि ये फैसला सभी जजों की सहमित से लिया गया है।

चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) डी.वाई. चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पांच जजों की पीठ द्वारा यह फैसला सुनाया गया। CJI के अलावा पीठ के सदस्यों में जस्टिस एम.आर. शाह, जस्टिस कृष्ण मुरारी, जस्टिस हिमा कोहली और जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा भी शामिल हैं।

ये भी पढ़ें- African Swine Fever: क्या है अफ्रीकन स्वाइन फीवर वायरस, जिससे इंडोनेशिया से लेकर सिंगापुर तक मचा है कोहराम?

पीठ ने केंद्र और दिल्ली सरकार की ओर से क्रमश: सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता और वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंघवी की पांच दिन दलीलें सुनने के बाद 18 जनवरी को अपना आदेश सुरक्षित रख लिया था।

संविधान पीठ का गठन, दिल्ली में प्रशासनिक सेवाओं पर केंद्र और दिल्ली सरकार की विधायी एवं कार्यकारी शक्तियों के दायरे से जुड़े कानूनी मुद्दे की सुनवाई के लिए किया गया था। पिछले साल 6 मई को शीर्ष अदालत ने इस मुद्दे को पांच जजों की संविधान पीठ के पास भेज दिया था।

हिंदी में शेयर बाजार स्टॉक मार्केट न्यूज़,  बिजनेस न्यूज़,  पर्सनल फाइनेंस और अन्य देश से जुड़ी खबरें सबसे पहले मनीकंट्रोल हिंदी पर पढ़ें. डेली मार्केट अपडेट के लिए Moneycontrol App  डाउनलोड करें।