चंदन श्रीवास्तव

चंदन श्रीवास्तव
"अद्भुत भारत" का अर्थ समझना हो तो आपको भारत की राजनीति पर गौर करना चाहिए। यहां आपको कठिन कोरोना-काल में स्वास्थ्य-मंत्री अर्थव्यवस्था की बेहतरी के लक्षण समझाते और वित्तमंत्री भारतीय संस्कृति में पान का महत्व बताते मिल जायेंगे !
केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री ने बीते बुधवार को ट्वीट किया कि ईज ऑफ डूइंग बिजनेस के अपने 2020 के रिपोर्ट में विश्वबैंक ने भारत को लगातार तीसरी बार टॉप के 10 इम्प्रूवर में जगह दी है। स्वास्थ्य मंत्री ने अपने ट्वीट में ये भी गिनवाया कि ईज ऑव डूइंग बिजनेस के लिए कितने श्रम-कानूनों को सरल और सीधा बनाया गया है।
स्वास्थ्य-मंत्री के इस ट्वीट के दो दिन बाद वित्तमंत्री ने भंडारकर ओरियंटल रिसर्च इंस्टीट्यूट के एक पोस्ट को री-ट्वीट करने का समय निकाला। इस पोस्ट में लिखा था कि पान (तांबूल) खास भारतीय परंपरा की चीज है। इसका सबसे पुराना उल्लेख 473 ईस्वी के शिलालेख में मिलता है। प्रोफेसर पी. के गोडे ने स्टडीज इन इंडियन कल्चरल हिस्ट्री के पहले खंड में इसके बारे में लिखा है ।
आप चाहें तो इस स्थिति पर हैरान हो लें क्योंकि जिस दिन (2 जून) देश में कोविड-19 से मरने वालों की तादाद 2897 थी और कोविड-19 के नये संक्रमितों की संख्या सवा लाख(1,33,953) के पार पहुंच रही थी, उस दिन केंद्रीय स्वास्थ्य-मंत्री अपने ट्वीट में ईज ऑव डूइंग बिजनेस के मामले में हुई तरक्की पर ध्यान दिला रहे थे।
और, वित्तमंत्री जब पान की पौराणिकता के तथ्य री-ट्वीट कर रही थीं तो ये खबर आ चुकी थी ककि देश के सार्वजनिक क्षेत्र के सबसे बड़े बैंक ने इस साल की वृद्धि-दर का अनुमान 10.4 प्रतिशत से घटाकर 7.9 प्रतिशत कर दिया है। मतलब, पिछले साल की गिरावट (7.3 प्रतिशत) को ध्यान रखें तो इस साल आर्थिक वृद्धि के खाते में हासिल के नाम पर हमारे हाथ शून्य लगने वाला है।
ईज ऑफ डूइंग बिजनेस बनाम व्यापार-जगत का भरोसा
बात बिल्कुल ठीक है कि विश्वबैंक ने ईज ऑफ डूइंग बिजनेस से संबंधित अपनी सत्रहवीं सालाना रिपोर्ट (2020) में भारत को 190 देशों के बीच 63वां स्थान दिया है जबकि साल 2014 में भारत इस रिपोर्ट में बहुत पीछे (142वां स्थान) था। लेकिन देखा ये भी जाना चाहिए कि जिस वक्त भारत में बिजनेस करना लगातार सुविधाजनक होता जा रहा है क्या उस वक्त बिजनेस करने वालों का अर्थव्यवस्था पर भरोसा पुख्ता हो रहा है ?
ना, ईज ऑफ डुइंग बिजनेस के इंडेक्स पर भारत चाहे जितनी ऊंची छलांग लगा रहा हो, बिजनेस कान्फिडेन्स के इंडेक्स पर अभी वह गोते खा रहा है। भारतीय वाणिज्य एवं उद्योग महासंघ के हाल के बिजनेस कॉन्फिडेंस सर्वे के तथ्य बताते हैं कि महामारी की दूसरी लहर को झेल रहे इस देश में भारतीय कंपनियों का कारोबार का आत्मविश्वास डगमगा रहा है।
पिछली तीन तिमाहियों की तुलना में अभी बिजनेस कान्फिडेंस सबसे कम है। मतलब, पिछले साल के लॉकडाऊन के वक्त की तुलना करें तो अभी कारोबारियों में उत्साह और आगे के वक्त के लिए उम्मीद का स्तर बस चंद अंक बेहतर है। पिछले साल के सख्त लॉकडाऊन के वक्त बिजनेस कॉन्फिडेन्स इंडेक्स गिरकर 42.9 के अंक पर आ गया था, अभी आंकड़ा 51.5 का है।
एक तरफ कारोबारियों का उत्साह फीका पड़ता जा रहा है तो दूसरी तरफ उपभोक्ताओं का आत्मविश्वास भी डावांडोल है। बीते शुक्रवार को रिजर्व बैंक का ताजातरीन कंज्यूमर कॉन्फिडेंस सर्वे आया। इस सर्वे के तथ्य बताते हैं कि उपभोक्ता अर्थव्यवस्था की मौजूदा हालत और आर्थिक मोर्चे पर अपनी अगली उम्मीदों को लेकर अनिश्चय के भंवर में हैं।
सर्वे में बाजार की मौजूदा हालत को लेकर उपभोक्ताओं की मनोदशा बताने वाला करेन्ट सिचुएशन इंडेक्स (सीएसआई 48.5) और आगे के समय को लेकर पाली गई उम्मीदों की सूचना देने वाला फ्यूचर एक्सपेक्टेशन इंडेक्स( एफईआई 96.4) अब तक (यानि 2012 से) के न्यूनतम अंक पर हैं।
डावांडोल कॉन्फिडेंसः कुछ झलकियां
कंपनियों के कारोबारी उत्साह और कंज्यूमर्स की उम्मीदों पर पानी फिरने के जो तथ्य भारतीय वाणिज्य एवं उद्योग महासंघ (फिक्की) तथा रिजर्व बैंक के सर्वे से निकलकर सामने आ रहे हैं, उसकी पुष्टी पिछले 60 दिन की खरीद-बिक्री के समाचारों से भी होती है।
रिटेल एसोसिएशन ऑव इंडिया के हवाले से छपे एक समाचार में दर्ज है कि ग्रोसरी, फुटवियर और ब्यूटी प्रॉडक्टस् जैसी वस्तुओं की बिक्री अप्रैल माह में 49 प्रतिशत तक गिरी है। मई माह के आंकड़े अभी प्रकाशित नहीं हुए हैं लेकिन एसोसिएशन के अधिकारियों को आशंका है कि मई माह में भी ऐसी फुटकर बिक्री का बाजार और भी मंदा निकलेगा।
मार्च की तुलना में अप्रैल महीने में मोटरसाइकिल और कार की बिक्री में भी 30 प्रतिशत की गिरावट आयी और समाचारों में आशंका जतायी गई है कि मई माह में इस सेग्मेंट में बिक्री की गिरावट 60 प्रतिशत की रहेगी क्योंकि मारुति सुजुकी और हीरो मोटर कार्प सरीखे ऑटोमेकर्स को बढ़ते कोरोना संक्रमण के बीच मई माह में उत्पादन रोकना पड़ा।
कोरोना की पहली लहर के मंद पड़ने के बाद कार की बिक्री में कुछ तेजी दिखी थी लेकिन ये तेजी कम दिनों की रही, कोविड-19 की दूसरी लहर में जैसे ही संक्रमितों और मृतकों का आंकड़ा ऊंचा उठने लगा, खरीदारों का मनोभाव बदला और कार की बिक्री मे फिर से गिरावट आने लगी।
खरीद-बिक्री की दुनिया में हताशा के एक उदाहरण के रुप में गोल्ड-फाइनेन्स की कंपनी मनप्पुरम फायनेंस का उदाहरण लिया जा सकता है। कंपनी ने जनवरी-मार्च की तिमाही में 55 मिलियन डॉलर के सोने का ऑक्शन किया जबकि इसके पहले की तीन तिमाहियों में कंपनी ने कुल ऑक्शन 1.1 मिलियन डॉलर का किया था।
सोने के इस बढ़े हुए ऑक्शन के पीछे परिवारों की दुर्दशा की कहानी छिपी हुई है। रेहन पर रखा सोना लोग समय पर कीमत देकर वापस नहीं ले सके और कंपनी को इस सोने की बोली लगानी पड़ी, जो इस बात की सूचना है कि मध्यवर्गीय भारतीय परिवार एक लंबे समय के आर्थिक संकट में फंस चुके हैं।
मध्यवर्गीय परिवारों के गहरे आर्थिक संकट में फंसे होने की नजीर के तौर पर चेक बाउंस की बढ़ी हुई घटनाओं को भी देखा जा सकता है। लोन की किश्त चुकता करने या फिर क्रेडिट कार्ड बिल के सेटलमेंट के लिए अगर किसी व्यक्ति के अकाउंट में पर्याप्त धनराशि ना हो तो चेक बाउंस की घटनाएं सामने आयेंगी ही।
डिजिटल लोन कलेक्शन के कामकाज में लगी फिनटेक कंपनी क्रेडिटास सॉल्यूशन के आंकड़े बताते हैं कि लोन पेमेंट के मद में मई माह में चेक बाउंस की घटनाएं पिछले साल की मई की तुलना में दोगुना बढ़कर 21 प्रतिशत हो गई। क्रेडिट कार्ड के बिल सेटलमेंट के मद में चेक बाउंस की घटनाएं पिछले साल की मई (10 प्रतिशत) की तुलना में इस साल की मई में बड़े पैमाने(18 प्रतिशत) पर बढ़ी हैं।
कमजोर पड़ता मांग-पक्ष
उपभोक्ताओं और कंपनियों के डावांडोल आत्मविश्वास के पीछे एक बड़ी कहानी छिपी है। हमारी अर्थव्यवस्था में मांग पक्ष लगातार कमजोर पड़ रहा है क्योंकि लोगों के हाथ में पर्याप्त रकम नहीं बची और जो रकम बची है, उसे वे आगे के दुर्दिन की आशंका में मुट्ठी भींचकर रखना चाहते हैं।
पिछले साल कोरोनाबंदी की मार से अर्थव्यवस्था को उबारने के लिए सरकार ने 266 बिलियन डॉलर के पैकेज की घोषणा की थी। लेकिन इसमें ज्यादातर हिस्सा बैंकों को मिला। उम्मीद पाली गई कि इससे कंपनी क्रेटिड को बढ़ावा मिलेगा। पैकेज का दशमांश भी लोक-कल्याण की योजनाओं पर खर्च ना हुआ।
विकसित देशों में नौकरी गंवा चुके लोगों को जीवन-यापन के लिए जरुरी सहायता राशि दी गई, जॉब सपोर्ट के स्कीम चले लेकिन भारत में मनरेगा सरीखी योजना में भी बढ़ी हुई मांग के अनुरुप रकम ना दी जा सकी। अभी के वक्त में बेरोजगारी एक बार फिर से बढ़वार पर है और इसका असर मांग पर दिख रहा है।
समाचारों में सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकॉनॉमी(सीएमआइई) के नये आंकड़ों के हवाले से कहा गया है कि कोविड-19 की दूसरी लहर में कम से कम 1 करोड़ लोगों को नौकरी गंवानी पड़ी है। बीते अप्रैल में बेरोजगारी दर 8 प्रतिशत थी लेकिन मई माह के आखिर में रिकार्ड बढ़त के साथ 12 प्रतिशत पर पहुंच गई।
जो लोग करोना की पहली लहर में जीविका गंवा चुके थे रोजी-रोजगार के मोर्चे पर उनमें से सभी की अभी वापसी नहीं हो पायी थी। इसी बीच कोरोना की दूसरी लहर आयी और अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग समय पर घोषित लॉकडाऊन के बीच बेरोजगारी का फंदा फिर से कसने लगा। सीएमआइआई का आकलन है कि देश के 97 प्रतिशत परिवारों की आमदनी में पिछले साल की कोरोनाबंदी से अबतक लगातार कमी आयी है।
सीएमआइई के आकलन की पुष्टी सी-वोटर्स के हाल के एक सर्वे से भी होती है। इस सर्वे के मुताबिक भारत में बड़ी संख्या में लोगों के जीवन-स्तर में गिरावट आयी है और ज्यादातर लोगों को लगता है कि अगले 12 माह में उनकी स्थिति सुधरने के आसार नहीं है।
काश, स्वास्थ्य मंत्री को ये याद होता कि कोरोबार के मामले में बढ़ता हुआ सुभीता (ईज ऑव डूइंग बिजनेस) अभी जीवन जीने के मामले में ईज ऑफ लीविंग) पैदा नहीं कर पा रहा। काश! वित्तमंत्री ये स्वीकार कर पातीं कि भारतीय संस्कृति में पान बेशक पुराना है लेकिन वह ऐश्वर्य की सूचना देता है, सर्व-भोग से संतुष्टी का प्रतीक रहा है पान लेकिन अभी भारतीय अर्थव्यवस्था से ऐश्वर्य और भारतीय उपभोक्ता-जगत से संतुष्टी का भाव लगातार विदा हो रहा है।
(लेखक सामाजिक-सांस्कृतिक स्कॉलर हैं)
सोशल मीडिया अपडेट्स के लिए हमें Facebook (https://www.facebook.com/moneycontrolhindi/) और Twitter (https://twitter.com/MoneycontrolH) पर फॉलो करें।
हिंदी में शेयर बाजार, स्टॉक मार्केट न्यूज़, बिजनेस न्यूज़, पर्सनल फाइनेंस और अन्य देश से जुड़ी खबरें सबसे पहले मनीकंट्रोल हिंदी पर पढ़ें. डेली मार्केट अपडेट के लिए Moneycontrol App डाउनलोड करें।