इंडिया के फॉरेन ट्रेड में बीते फाइनेंशियल ईयर में अच्छी ग्रोथ दिखी। एक्सपोर्ट 44.6 फीसदी बढ़ा, जबकि इंपोर्ट 55.3 फीसदी उछला। एक्सपोर्ट बढ़कर 422 अरब डॉलर पहुंच गया। इंपोर्ट का डेटा 613 अरब डॉलर रहा। पहली बार मर्चेंडाइज ट्रेड की कुल वैल्यू 1 लाख करोड़ डॉलर को पार कर गई। खास बात यह है कि सप्लाई चेन में दिक्कत, कनटेनर की कमी और बंदरगाहों पर देरी के बावजूद फॉरेन ट्रेड की ग्रोथ अच्छी रही।
इंपोर्ट की ग्रोथ एक्सपोर्ट के मुकाबले ज्यादा रहने से इंडिया का ट्रेड बैलेंस और बिगड़ गया। ट्रेड डेफिसिट 2012-13 के आंकड़े को पार कर गया।
इंडिया 240 देशों और ज्यूरिडिक्शंस को एक्सपोर्ट करता है, जबकि 229 से इंपोर्ट करता है। लेकिन, इंडिया का सबसे ज्यादा ट्रेड अमरिका और चीन से है। इंडिया के कुल फॉरेन ट्रेड में अमेरिका और चीन की हिस्सेदारी 20 फीसदी से ज्यादा है। पिछले साल अमेरिका दूसरे नंबर पर आ गया था। फिर से वह चीन को पीछे छोड़ पहले नंबर पर आ गया है। लेकिन, अमेरिका और चीन के साथ इंडिया के ट्रेड में सिर्फ 4 अरब डॉलर का फर्क है।
एक साल पहले के मुकाबले अमेरिका से इंडिया का इंपोर्ट और एक्सपोर्ट करीब 50 फीसदी बढ़ा है। चीन को लेकर इंडिया में विरोध के बावजूद इंपोर्ट करीब 45 फीसदी बढ़ा है। चीन को एक्सपोर्ट में कोई बदलाव नहीं आया है।
आस्ट्रेलिया के साथ गुड्स के ट्रेड में सबसे ज्यादा उछाल आया है। पिछले वित्त वर्ष में ऑस्ट्रेलिया से इंपोर्ट और एक्सपोर्ट दोगुना हो गया। ऑयल एक्सपोर्टिंग देशों से इंडिया का आयात तेजी से बढ़ा है। इसमें क्रूड ऑयल की कीमतों में उछाल का बड़ा हाथ है। सऊदरी अरब, कुवैत, ओमान और इराक से इंपोर्ट दोगुना से ज्यादा बढ़ा, जबिक यूएई और कतर से इंपोर्ट करीब 70 फीसदी बढ़ा।
फाइनेंशियल ईयर 2021-22 में इंडिया का ट्रेड डेफिसिट करीब 85.8 फीसदी बढ़कर 190 अरब डॉलर हो गया। सबसे ज्यादा ट्रेड डेफिसिट चीन के साथ रहा। इसके करीब 72.9 अरब डॉलर होने का अनुमान है। यह इंडिया के कुल ट्रेड डेफिसिट का 40 फीसदी है। चीन से इंडिया जिन चीजों का आयात करता है उनमें इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट्स, कंप्यूटर हार्डवेयर, टेलीकॉम इंस्ट्रूमेंट (ज्यादातर मोबाइल फोन), ऑर्गेनिक और दूसरे केमिकल एंव मशीनरी शामिल हैं।
मर्चेंडाइज ट्रेड डेफिसिट में तेज उछाल को देखते हुए 2021-22 में इंडिया के ट्रेड डेफिसिट के बढ़कर 40 अरब डॉलर के तीन साल के सबसे उंचे स्तर पर पहुंच जाने का अनुमान है। कोरोना की शुरुआत वाले साल में इंडिया का करेंट अकाउंट सरप्लस में था, क्योंकि इंपोर्ट काफी घट गया था। इसके अलावा क्रूड ऑयल के प्राइसेज में गिरावट का भी इसमें हाथ था।