
Sudha Murty Interview: सुधा मूर्ति इन्फोसिस के को-फाउंडर एनआर नारायण मूर्ति (NR Narayana Murthy) की पत्नी और भारत की लीडिंग फिलैंथ्रोपिस्ट हैं। वह 30 से ज्यादा किताबें लिख चुकी हैं।
71 वर्षीय मूर्ति इन्फोसिस फाउंडेशन (भारत की दूसरी बड़ी सॉफ्टवेयर कंपनी इन्फोसिस की फिलैंथ्रोपिक आर्म) से रिटायर होने जा रही हैं। उन्होंने 1996 में स्थापना के बाद से लगातार 25 साल इसका नेतृत्व किया। वह अपनी फैमिली के मूर्ति फाउंडेशन के लिए आगे भी काम जारी रखने की उम्मीद कर रही हैं। मनीकंट्रोल को दिए एक इंटरव्यू में सुधा मूर्ति ने अपनी भावी योजनाओं सहित कई मुद्दों पर बात की। मुख्य अंश...
1996 में 32 लाख रुपये के साथ इन्फोसिस फाउंडेशन की शुरुआत हुई। 25 साल बाद यह रकम बढ़कर 400 करोड़ रुपये से ज्यादा हो गई है। क्या आप फाउंडेशन के प्रभाव और वर्षों के अपने सफर के बारे में कुछ बता सकती हैं?
इन्फोसिस ने शुरुआत में हमें 32 लाख रुपये दिए। मुझे लगा कि इतनी बड़ी रकम का क्या करूंगी। आज, 400 करोड़ रुपये भी बड़ी रकम नहीं है, क्योंकि कई कोविड, कुपोषण, भूख शिक्षा आदि कई मुद्दे सामने हैं। कई समस्याएं हैं, आपको उनमें से कुछ चुननी हैं जिन पर आप काम कर सकते हैं।
आप वही चुनते हैं जो आपके दिल के करीब हो, क्योंकि परोपकार एक प्रकार से दया और जुनून है। इसलिए, हम कुपोषण और भूख चुनते हैं, हम शिक्षा चुनते हैं, हम मेडिकल हैल्प चुनते हैं, फिर हम भारत के कला और शिल्प को चुनते हैं।
मैंने अपने देश के बारे में भी काफी कुछ जाना है, क्योंकि मेरा देश बॉलीवुड नहीं है। यह सॉफ्टवेयर नहीं है। यहां सामने गरीब से गरीब लोगों की मुश्किलें हैं। जब तक हमारे देश के बच्चों को दो जोड़ी कपड़े, दिन में तीन वक्त का खाना और अच्छा पेयजल व शौचालय सुविधाएं, कक्षा 12 तक की शिक्षा के साथ अच्छी कम्युनिकेशन व वोकेशनल स्किल नहीं मिलें, हमार देश विकास नहीं करेगा।
आपने अपनी किताब थ्री थाउजैंड स्टिचेस (Three Thousand Stitches) में आपने अपने पिता द्वारा दी गई सीख का उल्लेख किया है : यदि आप किसी और को बदलना चाहते हैं तो आपको पहले खुद को बदलने की जरूरत है। जब आपने सोशल वर्क शुरू किया तो आपने खुद में क्या बदलाव किया?मैं जींस और टीशर्ट पहनती थी और मेरे छोटे बाल थे। इसलिए, मैं जब भी किसी कम्युनिटी में जाती तो वे हमेशा मुझे अलग समझते। मुझे लगा कि जब मैं उनकी जैसी दिखूंगी, उनके साथ खाऊंगी तो खासी सरलता आएगी। इसलिए, आपके लिए उनके साथ खाना शेयर करना, फिर उनसे उनकी बोली में बात करना अहम है। उनकी समस्याओं को ध्यान से सुनें। कई बार आपके पास समाधान नहीं होता, आप सिर्फ उनकी बात ध्यान से सुनते हैं।
फिर मैंने साड़ी पहनना शुरू कर दिया, बाल बांध लिए। और उनसे कहा मैं एक स्कूल टीचर हूं। फिर संवाद शुरू हो गया। फिर मुझे महसूस हुआ कि वह जीवन से क्या चाहते हैं। मैंने उनकी मुश्किलों और उनकी हताशा की वजह जानी। यह कम्प्यूटर नहीं है, जहां आपने बटन दबाया और रिजल्ट सामने आ गया। वे सब इंसान हैं, उनको सुनें और फिर समाधान पर बात करें।
तीसरा बात जो मुझे महसूस हुई कि जीवन में खासी मुश्किलें हैं। आपको हमेशा भगवान का शुक्रगुजार होना चाहिए : ‘शुक्रिया भगवान, आपने मुझे इतना कुछ दिया। चलिए आपके बच्चों की सेवा करते हैं।’
आपको क्या लगता है, आपकी जगह किसे लेनी चाहिए और उसको आप क्या मैसेज देना चाहेंगी?
अपने उत्तराधिकारी से मैं कहना चाहती हूं : दयालु बनिए, अच्छे बनिए, वक्त के साथ अच्छे प्रोजेक्ट विकसित करते रहिए। और फिर उसका अपना तरीका होगा। क्योंकि फाउंडेशन की अगुआई करने वाले हर व्यक्ति का जीवन के प्रति अलग दृष्टिकोण होता है।
क्या आगे आप मूर्ति फाउंडेशन पर ध्यान देने जा रही हैं?
बिल्कुल, मैं उसे जारी रखूंगी- मेरे लिए कोई सीमा और कोई शर्त नहीं है। इसके अलावा मैं अपनी आर्कियोलॉजिकल स्टडीज को जारी रखूंगी। मुझे इससे बहुत लगाव है। इसलिए कोविड के कम होते ही, मैं धोलावीरा जाना चाहती हूं, जो मेरी पुरानी इच्छा है। मैं धोलावीरा, ऊनाकोटि, राखीगढ़ी और कई अन्य प्रोजेक्ट देखना चाहती हूं। मैं फिलैंथ्रोपी के साथ यह भी करना चाहती हूं।
क्या आपके अपने फाउंडेशन का जोर भी कुपोषण, स्वास्थ्य, शिक्षा पर रहेगा, जिन पर इन्फोसिस फाउंडेशन का जोर रहा था? या अन्य क्षेत्र भी हैं जिन पर महामारी के बाद आप तुरंत ध्यान देना चाहती हैं?
यह इस बात पर निर्भर करता है कि किसकी ज्यादा जरूरत है। निश्चित रूप से यह हेल्थकेयर भी हो सकता है। मैं एक डॉक्टर की बेटी और एक डॉक्टर की बहिन हूं। इसलिए, स्वास्थ्य, कुपोषण हमेशा ही मेरे लिए अहम रहे हैं, मैं इन पर काम करूंगी।
क्या आप मूर्ति फाउंडेशन के कॉर्पस के बारे में कुछ बता सकती हैं? क्या आपने इस पर फैसला लिया है और क्या आपके बच्चे भी इसे जुड़ेंगे?
नहीं, मैंने अभी तक इस पर फैसला नहीं लिया है। वास्तव में, रोहन (बेटा रोहन मूर्ति) कुछ हद तक इससे जुड़ सकता है। लेकिन, मैं उसे हमेशा ही बताया है कि कुछ क्षेत्रों पर मैं काम करना चाहती हूं।
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