रिसेशन (Recession) की चर्चा शुरू हो गई है। अमेरिकी अर्थव्यवस्था (US Economy) के रिसेशन में जाने के अनुमान लगाए जा रहे हैं। इकोनॉमिस्ट्स का कहना है कि अगले साल के अंत तक अर्थव्यवस्था मंदी में जा सकती है। अगर ऐसा होता है तो इसका असर दुनियाभर की अर्थव्यवस्थाओं पर पड़ेगा। इसकी वजह यह है कि अमेरिका दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है।
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से अमेरिका अर्थव्यवस्था करीब एक दर्जन बार मंदी में जा चुकी है। इस दौरान इकोनॉमी में औसतन 2.5 फीसदी गिरावट आई है। बेरोजगारी करीब 3.8 फीसदी बढ़ी है। कंपनियों के मुनाफे में 15 फीसदी गिरावट आई है। मंदी की औसत अवधि 10 महीने रही है।
ज्यादातर एक्सपर्ट्स का कहना है कि अगली मंदी पहले के मुकाबले ज्यादा भयानक हो सकती है। इसकी वजह यह है कि अगली मंदी ज्यादा समय तक बनी रह सकती है। हालांकि, इसका असर पहले आई मंदी के मुकाबले कम होगा।
इकोनॉमिस्ट्स का कहना है कि अर्थव्यवस्था में गिरावट 2007-09 की ग्रेट फाइनेंशियल क्राइसिस के मुकाबले कम रहने के आसार है। लेकिन, मंदी लंबे समय तक बनी रह सकती है। 1990-91 और 2001 में आई मंदी करीब 8 महीने तक रही थी।
नोमुरा सिक्योरिटीज के सीनियर इकोनॉमिस्ट रॉबर्ट डेंट ने कहा, "अच्छी खबर यह है कि आने वाली मंदी ज्यादा खतरनाक नहीं होगी। लेकिन, बुरी खबर यह है कि यह लंबे समय तक बनी रह सकती है।" एक्सपर्ट्स का कहना है कि मंदी कई तरह से असर डालेगी।
अर्थव्यवस्था में कम गिरावट के बावजूद कम से कम लाखों लोगों की नौकरी जा सकती है। पहले से दबाव में चल रहे स्टॉक मार्केट्स में बड़ी गिरावट आ सकती है। इसकी वजह यह है कि कंपनियों का मुनाफा काफी घट जाएगा। इससे अमेरिकी प्रेसिडेंट जो बाइडेन की प्रतिष्ठा को ठेस लगेगी।
प्राइवेट इक्विटी फंडों से जुड़े एनालिस्ट स्कॉट स्पर्लिंग ने कहा कि जब से मैंने काम शुरू किया तब से यह छठी या सातवीं मंदी होगी। खास बात यह है कि अभी से मंदी के संकेत दिखने लगे हैं। इस साल पहली बार लोगों के खर्च में कमी आई। अमेरिका में मैन्युफैक्चरिंग का डेटा जून में दो साल के निचले स्तर पर आ गया।
एक्सपर्ट्स का कहना है कि मंदी कितनी गहरी और लंबी होगी, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि आगे इनफ्लेशन की तस्वीर कैसी रहती है। फेडरल रिजर्व इसे अपने टारगेट तक लाने के लिए कितने सख्त कदम उठाता है।