Vacancies: देश में 'पढ़ेगा इंडिया तो बढ़ेगा इंडिया' अभियान के बीच चौंकाने वाले आंकड़े सामने आए हैं। देश के सभी 45 केंद्रीय विश्वविद्यालयों समेत उच्च शिक्षण संस्थानों में शिक्षकों के कुल 11000 से भी ज्यादा पद खाली हैं। जिन उच्च शिक्षण संस्थानों में शिक्षकों के पद खाली हैं। उनमें IIT और IIM जैसे प्रसिद्ध और बेहतरीन शिक्षा संस्थान भी शामिल हैं। केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेद्र प्रधान (Dharmendra Pradhan) ने लोकसभा में बताया कि इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (Indian Institutes of Technology – IIT) में 4502 पद और इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट (Indian Institutes of Management – IIM) में फैकल्टी के 493 पद खाली हैं।
केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने एक लिखिति प्रश्न में जवाब दिया है। तमिलनाडु के सांसद डी रविकुमार (D Ravikumar) ने प्रश्न पूछा था। प्रधान ने बताया कि देश के केंद्रीय विश्वविद्यालयों (central universities) में 33 फीसदी से ज्यादा शिक्षकों के पद खाली हैं।
केंद्रीय विश्वविद्यालयों में 6180 पद खाली
प्रधान ने लोकसभा में जवाब देते हुए कहा कि शिक्षा मंत्रालय के दायरे में आने वाले 45 केंद्रीय विश्वविद्यालयों में नियमित मोड में स्वीकृत 18956 खाली पदों में से 12776 पदों पर शिक्षकों की तैनाती की गई है। इस दौरान उन्होंने कहा कि 1 दिसंबर तक अभी भी कुल 6180 पद खाली पड़े हैं। केंद्रीय विश्वविद्यालयों में प्रोफेसर पद के लिए 1529, एसोसिएट प्रोफेसर के लिए 2304 और असिस्टेंट प्रोफेसर के लिए 2347 पद खाली है। उन्होंने कहा कि उच्च शैक्षणिक संस्थानों में टीचर की कमी कारण शिक्षा की गुणवत्ता पर असर पड़ रहा है।
धर्मेंद्र प्रधान ने आगे कहा कि शिक्षा मंत्रालय ने सभी उच्च शिक्षा संस्थानों में खाली पदों को मिशन मोड में भरने के निर्देश दिए है। इस प्रक्रिया की निगरानी के लिए मंत्रालय ने एक मंथली मॉनिटरिंग मैकेनिज्म (monthly monitoring mechanism) भी बनाया है। उन्होंने शिक्षकों की भर्ती के लिए इन सभी उच्च शिक्षा संस्थानों को पत्र लिखा है।
शिक्षा मंत्रालय के मुताबिक कई स्तर और संस्थानों में खाली पदों में 961 पद SC, 578 ST और 1,657 OBC के लिए रजर्व रखा गया है। EWS के 643 और PWD कैटेगरी के 301 पद खाली पड़े हैं। जानकारों का कहना है कि केंद्रीय विश्वविद्यालयों में बीते कई दशकों से शिक्षकों की कमी बनी हुई है। विश्व विद्यालयों में शिक्षकों की यह कमी साल दर साल बढ़ती ही जा रही है।