भुवन भास्कर
भुवन भास्कर
भारत में मानसून का सबसे सीधा संबंध किसी से है तो वह है कृषि और क्योंकि 2.7 लाख करोड़ रुपये की कृषि अर्थव्यवस्था से पूरी ग्रामीण मांग शृंखला प्रभावित होती है, इसलिए यहां किसानों से लेकर उद्योग तक, सब मौसम विभाग के अनुमानों का बेसब्री से इंतजार करते हैं। हर एक बारिश के साथ कमोडिटी वायदा बाजार में भाव उतरते-चढ़ते हैं और मौसम विभाग के हर अनुमान पर शेयर बाजार कलाबाजियां खाता है।
बहरहाल, अब क्योंकि जुलाई का पहला हफ्ता शुरू हो चुका है, तो अनुमानों की जगह अब मानसून की प्रगति रिपोर्ट ने ले ली है। यह रिपोर्ट बता रही है कि मानसून में जून की शुरुआत में जो सुस्ती दिख रही थी, वह अब धीरे-धीरे दूर होने लगी है और इसके साथ खरीफ की बुवाई में भी गति आने लगी है। पिछले हफ्ते शुक्रवार को मौसम विभाग ने जो ताजा मानसून अपडेट जारी किया है, उसके मुताबिक जुलाई महीने में बारिश लंबी अवधि के औसत (LTA) से 94% से लेकर 106% तक रह सकती है। जुलाई कृषि के लिहाज से सबसे संवेदनशील महीना होता है क्योंकि धान जैसी प्रमुख खरीफ फसल की बुवाई का ज्यादातर हिस्सा इस महीने खत्म हो जाता है।
कई लोकल फसलें भी जुलाई में ही लगाई जाती हैं। जैसे, राजस्थान में यदि बारिश अच्छी हो जाए, तो किसान मोठ और दूसरी खरीफ फसलों का रुख कर लेते हैं, जबकि यदि बारिश न हो तो ग्वार की बुवाई बढ़ जाती है। जून तक की परिस्थिति यह रही है कि मध्य भारत में कमजोर मानसून के कारण कुल मिलाकर अब तक LTA से 8% कम बारिश हुई है। सिर्फ मध्य भारत में LTA से 54% कम बारिश हुई है, जिससे इस क्षेत्र में मुख्य रूप से होने वाली कपास, सोयाबीन और गन्ने की बुवाई प्रभावित हुई है।
खरीफ में धान के अलावा सोयाबीन, मक्का, ज्वार, बाजरा, मूंगफली, कपास, ग्वार, रागी जैसी फसलों की खेती होती है। इनमें पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, पंजाब, आंध्र प्रदेश, बिहार, छत्तीसगढ़, उड़ीसा और असम धान के प्रमुख उत्पादक राज्य हैं, जबकि सोयाबीन मुख्य रूप से मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान, कर्नाटक और तेलंगाना में होता है। आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, राजस्थान, महाराष्ट्र, बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और हिमाचल प्रदेश मक्का के उत्पादन के लिहाज से मुख्य राज्य हैं।
जुलाई के पहले दिन हालांकि दक्षिण-पश्चिम मानसून पूरे देश में पहुंच गया, लेकिन मध्य भारत के कई राज्यों में मानसून के लड़खड़ाने से खरीफ की बुवाई में 5.33% की कमी दर्ज की गई है। पिछले साल 1 जुलाई तक जहां खरीफ की बुवाई कुल 294.42 लाख हेक्टेयर में हो चुकी थी, इस साल 1 जुलाई तक यह 15.70 लाख टन कम रही है।
हालांकि अनेकों विशेषज्ञ हैं, जिनका मानना है कि जिस तेजी से जलवायु परिवर्तन का असर हर साल बढ़ते हुए रूप में दिखने लगा है, उसे देखते हुए अब LTA के 90% तक को सामान्य मानसून मान लिया जाना चाहिए। भारतीय खाद्य एवं कृषि परिषद (ICFA) के चेयरमैन एम जे खान ने कहा, “मानसून की कमी को सामान्य मानते हुए अब हमें इन्हीं परिस्थितियों के मुताबिक खेती का सिस्टम विकसित करने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। हमारे यहां अब भी मौसम की सटीक जानकारी देने वाली कोई व्यवस्था नहीं है। अब इसी दिशा में तेजी से काम किए जाने की आवश्यकता है क्योंकि औसत से कम मानसून अब सामान्य स्थिति हो गई है।”
केंद्रीय कृषि एव किसान कल्याण मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक सबसे ज्यादा कमी धान की रोपाई में देखी गई है। पिछले साल जहां अब तक 59.56 लाख हेक्टेयर में धान की रोपाई हो चुकी थी, इस साल यह सिर्फ 43.45 लाख हेक्टेयर तक पहुंची है जो कि 27% की कमी है। मोटे अनाजों की बुवाई में करीब 7% की कमी दर्ज की गई है।
पिछले साल इस समय तक 50.36 लाख हेक्टेयर में बुवाई हुई थी, जबकि इस साल यह आंकड़ा सिर्फ 46.34 लाख हेक्टेयर तक पहुंच पाया है। हालांकि मोटे अनाज की दो सबसे प्रमुख खरीफ फसलों, ज्वार और बाजरा के बुवाई पैटर्न में भारी अंतर देखा गया है। ज्वार की बुवाई जहां पिछले साल के 2.75 के मुकाबले 35.10% घट कर इस साल अब तक सिर्फ 1.78 लाख हेक्टेयर रही है, वहीं बाजरा का रकबा 10.23 से 46.72% बढ़कर 15.01 लाख हेक्टेयर पर पहुंच गया है।
कुछ यही रुझान दालों में भी देखने को मिल रहा है जहां कुल रकबा 2021 के मुकाबले 7% बढ़कर 28.06 लाख हेक्टेयर तक पहुंच गया है, लेकिन अरहर, कुलथी और उड़द की बुवाई में काफी कमी आई है। कुल 10.76 लाख हेक्टेयर के साथ मूंग के बुवाई रकबे में 31.81% की और अन्य दालों के रकबे में 71.52% की बढ़त रही है। गन्ने के रकबे में 1 प्रतिश की मामूली कमी आई है और यह 53.41 से घटकर 52.92 लाख हेक्टेयर रहा है।
कृषि मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक 3 जून तक धान की बुवाई का रकब 23.53% ज्यादा था और दालों की बुवाई का क्षेत्र भी 25% बढ़ गया था। लेकिन 24 जून आते-आते खरीफ की बुवाई का रकबा साल दर साल 24% कम रह गया
ज्यादातर खरीफ फसलों की बुवाई में हालांकि कमी दर्ज की गई है, लेकिन विशेषज्ञों की नजर जुलाई में मानसून की चाल पर लगी है, क्योंकि इसी एक महीने से भारत में खरीफ की फसलों का भाग्य तय होगा। यदि जून के आरंभिक दिनों के आंकड़े देखा जाए, तो बुवाई बहुत अच्छी रही थी, लेकिन जून तीसरे हफ्ते तक मानसून में कमी गहराने के साथ ही बुवाई के आंकड़े भी पूरी तरह गड़बड़ा गए थे।
कृषि मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक 3 जून तक धान की बुवाई का रकब 23.53% ज्यादा था और दालों की बुवाई का क्षेत्र भी 25% बढ़ गया था। लेकिन 24 जून आते-आते खरीफ की बुवाई का रकबा साल दर साल 24% कम रह गया।
इसमें धान का रकबा तो 45.6% कम हो गया था, जबकि मोटे अनाज की बुवाई पिछले साल की इसी अवधि की तुलना में 38.7% कम रही थी। यही हाल दलहन, तिलहन और कपास का भी था। लेकिन जून के आखिरी हफ्ते में जिस तरह मानसून में तेजी आई, उसके बाद लगभग सारी फसलों में जमकर बुवाई हुई और खरीफ की बुवाई ने भी काफी हद तक भरपाई कर ली।
विशेषज्ञों का मानना है कि जुलाई के मानसून से ही यह तय होगा कि खरीफ की कुल बुवाई इस साल कैसी रहने वाली है। पिछले कुछ दिनों में जिस तरह मानसून ने तेजी पकड़ी है, उससे इस बात की पूरी संभावना है कि जो कमी फिलहाल रकबे में देखी जा रही है, वह भी आने वाले महीनों में पूरी हो जाएगी।
(लेखक कृषि मामलों के जानकार हैं)
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