Kargil War: कारगिल में भारतीय सेना ने दागे थे 2,50,000 से ज्यादा गोले और बम, तोपों ने बदल दिया था जंग का पूरा रुख

Kargil Vijay Diwas 2024: थल सेना के पैदल जवानों ने जो जांबाजी दिखाई, उसकी को तो कोई तुलना है ही नहीं, लेकिन भारतीय तोपों ने जो कमाल किया, उसने इस पूरे युद्ध को रुख ही पलट दिया। पाकिस्तानियों ने LoC के पार घुसपैठ की और ऐसे ऊंचे प्वाइंट पर कब्जा जमा लिया, जहां से श्रीनगर-लेह नेशनल हाईव 1A पर सीधे निशाना लगाया जा सकता था

अपडेटेड Jul 26, 2024 पर 12:24 PM
Kargil War: कारगिल में भारतीय सेना ने दागे थे 2,50,000 से ज्यादा गोले और बम (FILE PHOTO)

कारगिल युद्ध में भारत की शानदार जीत को आज 25 साल पूरे हो गए हैं। पाकिस्तान के साथ भारत 1947, 1965 और 1971 में भी जंग लड़ चुका है, लेकिन 1999 में लड़ा गया कारगिल का युद्ध अपने आप में बेहद खास, दुनिया के कुछ सबसे मुश्किल वॉर में से एक रहा है। ये लड़ाई दुनिया के सबसे ऊंचे युद्धक्षेत्रों में लड़ी गई। क्योंकि पाकिस्तानी इतनी ऊंचाई पर बैठे थे कि वो वहां से अगर एक पत्थर भी फेंक कर मारें, तो वो गोली की रफ्तार से आकर नीचे लगे।

डिफेंस एक्सपर्ट की भाषा में अगर कहें, तो जब दुश्मन ऊंचाई पर बैठा हो, तो लड़ाई का रेश्यू 6:1 होता है, मतलब कि वो हमारे 6 मार सकते हैं और हम उनका एक, लेकिन कारिगल में ये 10:1 यानि वो हमारे 10 मार सकते थे और बदल में हम उनका एक..

भारतीय तोपों ने बदल दिया जंग का पूरा रुख


ऐसे में थल सेना के पैदल जवानों ने जो जांबाजी दिखाई, उसकी को तो कोई तुलना है ही नहीं, लेकिन भारतीय तोपों ने जो कमाल किया, उसने इस पूरे युद्ध को रुख ही पलट दिया।

पाकिस्तानियों ने LoC के पार घुसपैठ की और ऐसे ऊंचे प्वाइंट पर कब्जा जमा लिया, जहां से श्रीनगर-लेह नेशनल हाईव 1A पर सीधे निशाना लगाया जा सकता था। ये हाईवे लेह और वहां तैनात सैनिकों के लिए लाइफ लाइन था। पाकिस्तानी सेना मकसद इसी लिंक को काट देना था।

घुसपैठ कर रहे पाकिस्तानियों को खदेड़ने की कई कोशिशें की गईं, लेकिन सफलता हासिल नहीं हुई और नुकसान भी काफी हुआ।

तैनात की गईं 20 से ज्यादा आर्टिलरी रेजिमेंट

इसके बाद फैसला हुआ कि अब आर्टिलरी यानी तोप का इस्तेमाल किया जाए, क्योंकि पाकिस्तानी पहले से ही तोपों का इस्तेमाल कर रहे थे।

ऐसी मुश्किल परिस्थितियों में, इतनी ऊंचाई और खतरनाक वनवे वाली रास्तों को पार करते हुए, भारतीय सेना ने 10 जून 1999 तक 105 mm गन, 155 mm बोफोर्स, 120 mm मोर्टार और ग्रैड BM21 की 20 से ज्यादा आर्टिलरी रेजिमेंटों तैनात किया।

इन्हें कारगिल युद्ध (Kargil War) के दौरान अलग-अलग सेक्टरों में दुश्मन की सीधी निगरानी और बेहद कठिन इलाके में गोलीबारी के बीच तैनात किया गया था। डमी गन पोजीशन तैयार की गईं। गोला-बारूद का स्टॉक लगातार बढ़ता गया और फिर... पाकिस्तानियों को ढेर कर दिया गया।

भारत ने ढाई लाख से ज्यादा गोले और बम दागे

एक आंकड़े के मुताबिक, कारगिल संघर्ष के दौरान भारत की आर्टिलरी ने 2,50,000 से ज्यादा गोले, बम और रॉकेट दागे। इनमें से ज्यादार लगभग 10-15 दिनों की लड़ाई के दौरान फायर किए गए।

इतना ही नहीं प्रतिदिन 300 तोप, मोर्टार और MBRL से लगभग 5,000 गोले, मोर्टार बम और रॉकेट दागे जाते थे। अकेले टाइगर हिल पर कब्जा करने के लिए 9,000 गोले दागे गए थे।

दूसरे विश्व युद्ध के बाद पहली बार इतनी गोलाबारी

जिस वक्त युद्ध अपने चरम पर था, तो औसतन हर एक तोप की बैटरी ने लगातार 17 दिनों तक प्रति मिनट एक राउंड से ज्यादा गोलीबारी की। बताया जाता है कि दूसरे विश्व युद्ध के बाद पहली बार किसी जंग में इतनी भीषण गोलाबारी देखने को मिली।

'कारगिल टू द कूप' की लेखिका नसीम जहरा अपनी किताब में लिखती हैं, "पाकिस्तानियों ने खुद को एक मुश्किल सैन्य माहौल में पाया। जिन पाकिस्तानी पोस्ट पर न तो भारतीय वायुस सेना की लड़ाकू विमान और न ही भारतीय सैनिक हमला कर पा रहे थे, अब उन पर लगातार तोप से हमले हो रहे थे। भारत की बोफोर्स तोपों ने उनका काम तमाम कर दिया था।"

बोफोर्स की अधिकतम रेंज 30 KM थी। उसने घुसपैठियों के कब्जे वाले फॉरवर्ड पॉजिशिन को उड़ाने के अलावा, दुश्मन की गन की पॉजिशन, बेस कैंप और गोला-बारूद के स्टॉक और वॉर हेडक्वार्टर तक को निशाना बनाया। इतनी जबरदस्त फायर पावर के सामने पाकिस्तान टिक नहीं पाया और दुम दबाकर वापस भाग निकला।

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